धरोहरों को नष्ट करते नादान

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी मंगलवार, 29 जनवरी 2013 1 टिप्पणियाँ

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रामगढ से लौटते हुए
कॉलेज के दिनों से ही प्रकृति का सामिप्य एवं सानिध्य पाने, प्राचीन धरोहरों को देखने और उसकी निर्माण तकनीक को समझने की जिज्ञासा मुझे शहर-शहर, प्रदेश-प्रदेश भटकाती रही। कहीं चमगादड़ों का बसेरा बनी प्राचीन ईमारतें, कहीं गुफ़ाएं, कंदराएं, कहीं उमड़ता-घुमड़ता ठाठें मारता समुद्र, कही घनघोर वन आकर्षित करते रहे। मेरा तन और मन दोनों प्रकृति के समीप ही रहना चाहता है। जब भी समय मिलता है, प्रकृति का सामीप्य पाने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहता। संसार विशाल है, यातायात तथा संचार के आधुनिक साधनों ने इसे बहुत छोटा बना दिया। एक क्लिक पर हम हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर लेते हैं, एक क्लिक पर मंगल एवं चंद्रमा की सैर पर पहुंच जाते हैं। पर ये आधुनिक साधन है जिनसे हम सिर्फ़ उतना ही देख पाते हैं जितनी कैमरे की आँख देखती है। मनुष्य की आँखे कैमरे के अतिरिक्त भी बहुत कुछ और उससे अलग देखती हैं। कैमरे की आँख में पूरा विषय नहीं समाता। किसी भी दृश्य को आँखों से देखने के बाद उसे सहेजने के लिए निर्माता (ईश्वर) कोई साधन नहीं बनाया। अगर बनाया होता तो कैमरे का अविष्कार ही नहीं होता। इसलिए इन्हे अपनी आँखों से ही देखने की मेरी कोशिश रही है।

अयोध्या में सरयु के किनारे फ़ैली हुई थैलियां
मनुष्य की एक प्रवृति यह भी है कि वह अपने घर का आँगन साफ़ रखना चाहता है पर अपने आँगन का कचरा दूसरे के आँगन में फ़ेकना भी चाहता है। घुमंतु होने के कारण मैने पर्यटन स्थलों पर देखा है कि लोगों को पर्यावरण की तनिक भी समझ नहीं है। वे अपने साथ लाया हुआ कचरा उपयोग के पश्चात जहाँ जाते हैं वहीं फ़ैला देते हैं, छोड़ आते हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ हों या पानी की बोतले, यह कचरा कभी भी खत्म नहीं होता। इससे पर्यावरण को हानि पहुंचती है। लोग नदियों के उद्गम, समुद्र के किनारे, नदियों के किनारे बसे हुए धार्मिक स्थलो पर प्लास्टिक का कचरा छोड़ आते हैं। चारों तरफ़ हवा में प्लास्टिक की थैलियाँ ही थैलियाँ उड़ते रहती है। पानी की बोतलें पड़ी रहती है। कचरे को साफ़ करने वाले हाथ सीमित होते और फ़ैलाने वाले लाखों। इन्हे देखकर पर्यावरण एवं प्रकृति प्रेमी सिर्फ़ सिर ही पीट सकता है, दु:खी हो सकता है इसके अलावा कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि समझने, समझाने वा्ले कम है, बर्बाद करने वाले लाखों। प्रदूषण से पवित्र गंगा का जल भी प्रदूषित हो चुका है। अब तो गंगा जल का आचमन करने में संक्रमित होने का डर बना रहता है। प्रदूषण का स्तर इतना अधिक बढ गया है, जल-थल-वायु प्रदुषण से मुक्त नहीं है। यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रदूषण ही फ़ैला हुआ है।

वृक्ष के वक्ष पर गोदना 
प्रकृति का श्रंगार वन हैं, हरियाली है, जब मनुष्य शहरी जीवन से ऊब जाता है तो वनों की ओर भागता है, लेकिन वहाँ भी प्रदुषण फ़ैलाने में यहां भी नहीं चूकता, कहीं पेड़ों के तने को खोद कर अपना नाम लिखेगा तो कहीं प्लास्टिक का कचरा फ़ैलाकर वनस्पति को हानि पहुंचाएगा। प्लास्टिक के कचरे में खाने का सामान होने पर लोभवश पशु उसे थैली सहित ही खा लेते हैं जो पशुओं के अमाशय में जमा होकर उनकी मृत्यु का कारक बनता हैं। वनों की अंधाधुन्ध कटाई के साथ बढते हुए शहर और गाँव के कारण वनों में मनुष्य हस्तक्षेप बढते जा रहा है। पशु, पक्षी, अपने प्राकृतिक निवास में असुरक्षित हो गए हैं। पर्यावरण असंतुलन होने के कारण उन्हे भोजन-पानी नहीं मिल पाता और वे शहर,गाँव की ओर आकर ग्रामीणों द्वारा मारे जाकर अकारण ही काल का ग्रास बन जाते हैं। अगर यही स्थिति रही तो कुछ वर्षों में धूप से सिर छिपाने के लिए भी जगह नहीं मिलेगी एवं पीने के लिए पानी नहीं। मनुष्य अपने हाथों ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है। जिस सभ्यता पर उसे गर्व है, उसे अपने हाथों ही खत्म कर रहा है। वह दिन दूर नहीं जब यह सभ्यता भी समाप्त होकर किसी बड़े टीले के नीचे हजारों साल बाद किसी पुराशास्त्री को उत्खनन में प्राप्त होगी और वे इसका काल निर्धारण कर कयास लगाएगें कि इस सभ्यता का विनाश कैसे हुआ?

प्राचीन नाट्य शाला सीता बेंगरा रामगढ सरगुजा
जहाँ कहीं भी पुरातात्विक धरोहरे हैं वहाँ पर मैने देखा है कि कुछ बेवकूफ़ किस्म के पर्यटक दीवारों पर अपने नाम गोद देते हैं। अपने नाम के साथ किसी लड़की का नाम जोड़ कर लिखना  नहीं भूलते, और हद तो तब हो जाती है जब वे दीवालों पर तीर से बिंधा हुआ दिल का चिन्ह बनाते हैं। इस कुकृत्य (इसे कुकृत्य ही कहुंगा) पीछे इनकी मंशा पत्थर पर अपना नाम गोद कर अमर हो जाने की रहती है। जैसे हीर-रांझा, सीरी-फ़रहाद, सस्सी-पुन्नु, लैला-मजनुं, सोहनी-महिवाल, लोरिक-चंदा आदि की प्रेम कहानियाँ अमर हो गई, उसी तरह इतिहास में ये भी याद रखे जाएं। परन्तु इन्हे पता नहीं कि वे जिस पुरातात्विक धरोहर के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं वह उनकी गलती के कारण आने वाली पीढी के लिए असुरक्षित हो गयी है। जिस दिन से उन्होने उसके साथ छेड़खानी की, उसी दिन से पुरातात्विक धरोहर के नष्ट होने की उल्टी गिनती शुरु हो गयी। मैने कई जगह देखा कि उत्त्खनन से प्राप्त मूर्तियों पर लोग धार्मिक भावना से सिंदूर पोत देते हैं, रोली लगा देते हैं। अक्षत या फ़ल फ़ूल चढाते हैं, इससे सड़न होकर बैक्टीरिया पैदा होते हैं जिससे कालांतर में प्राचीन मूर्तियों का क्षरण होता है। इनकी सुरक्षा को लेकर लोग संबंधित विभागों पर चढाई करते हैं, लेकिन ध्यान में यह भी होना चाहिए कि देश का नागरिक होने के कारण पर्यावरण, एवं पुरातात्विक धरोहरों की सुरक्षा की महती जिम्मेदारी उनकी भी है।  

सीता बेंगरा रामगढ में मंच का निर्माण कर प्राकृतिक सौदर्य का खात्मा
जिन किलों और महलों के द्वार पर खड़े होने की हिम्मत किसी ऐरे-गैरे इंसान की नहीं होती थी वह मजे से पर्यटक बनकर जाता है और अपनी दुर्बुद्धि का चिन्ह वहाँ छोड़ आता है। अभी मैने रामगढ में ही देखा, गुफ़ा तक पहुचने के लिए सीढियाँ बना दी गयी हैं। गुफ़ा के सामने मंच बना दिया है। जिससे गुफ़ा की प्राकृतिक पहचान खो गयी है। पर्यटक सीढियों से चढ कर सीधे ही गुफ़ा में प्रवेश कर जाते हैं। जहाँ बेशकीमती भित्ति चित्र है, उनका भी क्षरण हो रहा है। नाट्यशाला के सामने चट्टानों पर लोगों ने अपने नाम गोद दिए हैं। जो दूर से ही दिखाई देते हैं। बलुआ पत्थर से निर्मित चट्टानों का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है। महेशपुर में बड़े देऊर मंदिर में शिव की प्रतिमा के समक्ष किसी ने संगमरमर का नंदी स्थापित कर दिया है। वहाँ पूजा पाठ शुरु है। ग्रामीण चौकीदारों का कहना नहीं मानते, उनसे लड़ने पर उतारु हो जाते हैं। मामला धार्मिक आस्था पर जाकर खत्म हो जाता है। मेरी राय में पुरातात्विक धरोहरों तक पहुचने के लिए जब से सड़क का निर्माण हुआ है, तब से पर्यटकों की पहुंच आसान हुई है। इससे धरोहरों को हानि अधिक पहुंची है। पुरातात्विक धरोहरों को बचाने के लिए आम नागरिक को भी इनके प्रति संवेदनशील एवं जागरुक होकर अपना योगदान करना पड़ेगा।  

सिरपुर: चेतावनी के बाद भी कोई नहीं चेतता
दुनिया बहुत बड़ी है, अनेक सभ्यताओं ने यहां जन्म लिया, फ़ली-फ़ूली और फ़ना हो गयी। कोई नहीं बता सकता यह संसार कितनी बार बसा और कितनी बार उजड़ा। संसार के बसने का कारण प्रकृति और ईश्वर है तो विनाश का कारण मनुष्य ही है। अपनी कुबुद्धि से मनुष्य ने इस सुंदर संसार का विनाश ही किया है। इसने पूर्ववर्ती गलतियों से कोई सीख नहीं ली और आज भी नहीं ले रहा है। धरती को उजाड़ने एवं विनाश करने के सारे संसाधन जुटा लिए हैं, परन्तु इसे सुरक्षित रखने की दृष्टि से मनुष्य सभ्य नहीं हुआ है। अगर मनुष्य का बस चलता तो पुरातात्विक महत्व की कोई भी धरोहर इससे बच नहीं पाती, चाहे मोहन जोदडो, हड़प्पा कालीन सभ्यता हो, चाहे मिस्र के पिरामिड हो, चाहे प्रागैतिहासिस काल की प्राचीन खगोल वेधशाला स्टोनहेंज हों, वर्तमान में मनुष्य के समक्ष अपने पूर्वजों के निर्माण एवं उनकी सभ्यता पर गौरव करने के लिए कुछ नहीं बचा होता। इन सबका विनाश अगर प्रकृति ने किया है तो इनका संरक्षण भी प्रकृति ने अपने गर्भ में किया है। कहीं मिट्टी के टीलों में दबी हुई पुराधरोहरें मिली तो कहीं समुद्र की तलहटी में सुरक्षित। परन्तु जैसे ही उत्खनन या अन्य प्रकार से प्रकाश में आईं, इनके विनाश का आगाज़ हो गया और यह अनवरत जारी है। धरोहरों को बचाने की दिशा में समाज को भी जागरुक होना पड़ेगा। तभी हमारी गौरवशाली विरासत बच पाएगी, तभी हम अपनी आने वाली पीढी को सौंप पाएगें।

सरगुजा भ्रमण को यहीं विराम देते हैं, अब मिलेगें हम शीघ्र ही मनसर (महाराष्ट्र) में राजा प्रवरसेन एवं महारानी प्रभावती से तथा रामटेक का भी भ्रमण करेगें।

पोस्ट अपडेट: 18/5/12 के सांध्य दैनिक छत्तीसगढ में पोस्ट का प्रकाशन, (पढने के लिए न्यूज क्लिप पर क्लिक करें।)

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रामगढ में लगे सरकारी स्टाल
रामगढ छत्तीसगढ के एतिहासिक स्थलों में सबसे प्राचीन है, यह अम्बिकापुर से 50 किलोमीटर दूरी पर समुद्र तल से 3202 फ़ुट की ऊंचाई पर है। रामगढ की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर, भित्तिचित्रों एवं गुफ़ाओं से सम्पन्न होने के कारण इस स्थान पर प्राचीन भारतीय संस्कृति का परिचय मिलता है। यहाँ सात परकोटों के भग्नावेश हैं। रामगढ पहाड़ी पर स्थित सीता बेंगरा गुफ़ा के समीप ही रामगढ महोत्सव का स्थायी मंच बनाया गया। इस मंच पर ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन होना है। मंच के समीप से ही बना हुआ कांक्रीट का रास्ता सीता बेंगरा गुफ़ा तक जाता है जिसे प्राचीन नाट्य शाला कहते हैं। कार्यक्रम प्रारंभ होने में विलंब था तब हमने तय किया गुफ़ा देख कर आया जाए। जंगल में महोत्सव स्थल पर शासन की ग्रामोन्मुख एवं विकासोन्मुख जानकारियाँ देने के लिए सभी विभागों के स्टाल लगे हुए थे। जिसमें पांम्पलेट फ़ोल्डर के साथ जानकारियाँ दी जा रही थी। समीप ही मेले जैसे उत्सव था, खाई-खजानी (मेले के चटर-पटर मिष्ठान) के साथ घरेलु उपयोग में आने वाली वस्तुओं की दुकाने सजी हुई थी। वनवासी मेले एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेने आए हुए थे। पहाड़ के पास कोई बसाहट नहीं है, दुरस्थ वनवासी मेले में शिरकत करने करमा नाच करने अपने मांदर, ढोल के साथ साज श्रृंगार करके बाजे गाजे के साथ अतिथियों का स्वागत करने के लिए आए हुए हैं।

जोगीमारा गुफ़ा  में सुतनुका और देवद्त्त की कथा कहता शिलालेख
हम सीता बेंगरा गुफ़ा में पहुचे। सीता बेंगरा नाम सीता जी से संबंधित होने के कारण पड़ा। पहाड़ में ऊंचाई पर खोद कर इसे बनाया गया है। सामने मुख्य नाटय मंच है तथा दांयी तरफ़ जोगी माड़ा गुफ़ा है जिसमें हजारों साल पुराने शैल चित्र हैं। जो समय की मार से अछूते नहीं रहे। धीरे-धीरे इनका क्षरण हो रहा है। लाल रंग से निर्मित कुछ शैल चित्र अभी भी स्पष्ट हैं। जोगीमाड़ा गुफ़ा में मौर्य ब्राह्मी लिपि में शिलालेख अंकित है, जिसे राहुल भैया ने पढ कर सुनाया। जिससे सुतनुका तथा उसके प्रेमी देवदीन के विषय में पता चलता है। जोगीमाड़ा गुफ़ा की उत्तरी दीवाल पर पाँच पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं - पहली पंक्ति-शुतनुक नम। दूसरी पंक्ति-देवदार्शक्यि। तीसरी पंक्ति-शुतनुक नम देवदार्शक्यि। चौथी पंक्ति-तंकमयिथ वलन शेये। पांचवी पंक्ति-देवदिने नम। लुपदखे। अर्थात सुतनुका नाम की देवदासी (के विषय में),सुतनुका नाम की देवदासी को प्रेमासक्त किया। वरुण के उपासक(बनारस निवासी) श्रेष्ठ देवदीन नाम के रुपदक्ष ने। जोगीमाड़ा गुफ़ा की नायिका सुतनुका है। जोगीमाड़ा की गुफ़ाएं प्राचीनतम नाट्यशाला और कवि-सम्मेलन के मंच के रुप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

सीता बेंगरा नाट्य शाला का विहंगम दृश्य
हम जोगीमाड़ा गुफ़ा से सीता बेंगरा गुफ़ा में चढते हैं। आज मेला होने के कारण काफ़ी ग्रामवासी पर्यटक आए हुए हैं। गुफ़ा में राम दरबार की मूर्तियां सजा दी गयी हैं। यहां एक पुजारीनुमा बैगा बैठा है जो मुर्तियों सहारे कुछ आमदनी की आस लगाए हुए है। गुफ़ा के भीतर दोनो तरफ़ कक्ष बने हुए हैं जो सामने से दिखाई नहीं देते। मुझे बताया गया कि नाटक करने वाले कलाकार यहीं पर बैठ कर सजते थे और अपनी पात्र की प्रस्तुतिकरण की प्रतीक्षा करते थे। विद्वानों का कहना है कि भारतीय नाट्य के इस आदिमंच के आधार पर ही भरतमुनि ने गुफ़ाकृति नाट्यमंच की व्यवस्था दी होगी- कार्य: शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यामण्डप:। सीता बेंगरा गुफ़ा पत्थरों में ही गैलरीनुमा काट कर बनाई गयी है। यह 44.5 फ़ुट लम्बी एवं 15 फ़ुट चौड़ी है। दीवारें सीधी तथा प्रवेशद्वार गोलाकार है। इस द्वार की ऊंचाई 6 फ़ुट है जो भीतर जाकर 4 फ़ुट ही रह जाती हैं। नाट्यशाला को प्रतिध्वनि रहित करने के लिए दीवारों को छेद दिया है। प्रवेश द्वार के समीप खम्बे गाड़ने के लिए छेद बनाए हैं तथा एक ओर श्रीराम के चरण चिन्ह अंकित हैं। कहते हैं कि ये चरण चिन्ह महाकवि कालीदास के समय भी विद्यमान थे। मेघदूत में रामगिरि पर सिद्धांगनाओं(अप्सराओं) की उपस्थिति तथा उसके रघुपतिपदों से अंकित होने का उल्लेख भी मिलता है।

सीता बेंगरा में शिलालेखा
पिछले दिनों मै रामटेक की यात्रा पर गया था, वहां भी कहा गया कि कालीदास ने मेघदूत की रचना यहीं रामटेकरी पर की थी। विद्वानों से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रो वी वी मिराशी द्वारा रामटेक(नागपुर) में रखे गए दो लकड़ी के खड़ाऊं आदि के आधार पर उसे रामगढ बनाने का प्रयास किया था। पर 1906 में पूना से प्रकाशित श्री वी के परांजपे के शोधपरक व्यापक सर्वेक्षण के "ए फ़्रेश लाईन ऑफ़ मेघदूत" द्वारा अब यह सिद्ध हो गया कि रामगढ(सरगुजा) ही श्रीराम की वनवास स्थली एवं मेघदूत का प्रेरणास्रोत रामगिरी है। इस पर्वत के शिखर की बनावट आज भी वप्रक्रीड़ा करते हाथी जैसे है। सीता गुफ़ा के प्रवेश द्वार के उत्तरी हिस्से में तीन फ़ुट आठ इंच लम्बी दो पंक्तियाँ(जिसमें 2.5 इंच अस्पष्ट) उत्कीर्ण हैं। जो किसी राष्ट्र स्तरीय कवि सम्मेलन का प्रथम प्रमाण कही जा सकती हैं। "आदिपयंति हृदयं सभाव्वगरु कवयो ये रातयं… दुले वसंतिया! हासावानुभूते कुदस्पीतं एव अलगेति। अर्थात हृदय को आलोकित करते हैं, स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में… वासंती दूर है। संवेदित क्षणों में कुन्द पुष्पों की मोटी माला को ही आलिंगित करता है।" इस पंक्ति का मैने छाया चित्र लिया। 

सीताबेंगरा नाट्य शाला के समक्ष लेखक
गुफ़ा को भीतर से अच्छे से देखा तथा वहां बैठ कर अहसास किया कि उस जमाने में जब यहां नाटक खेले जाते होगें तो यहां से पहाड़ी के नीचे का दृश्य कैसा दिखाई देता होगा? पात्रों के संवाद बोलने के समय उनकी आवाज कहां तक जाती होगी? गुफ़ा तक जाने के लिए पहाड़ियों को काटकर पैड़ियाँ बनाई गयी हैं। नाट्यशाला(सीता बेंगरा) में प्रवेश करने के लिए दोनो तरफ़ पैड़ियाँ बनी हुई हैं। प्रवेश द्वार से नीचे पत्थर को सीधी रेखा में काटकर 3-4 इंच चौड़ी दो नालियाँ जैसी बनी हुई है। शायद यहीं पर नाटक करने के लिए मंच बनाया जाता होगा। कालीदास के मेघदूत का यक्ष इसी जोगीमारा गुफ़ा में रहता था जहां उसने प्रिया को प्रेम का पावन संदेश दिया था यही के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कालीदास ने मेघदूत में किया है। यहीं पर जल का कुंड है। वनौषधियाँ, कंदमूल फ़ल भी इस स्थान पर प्रचूर मात्रा में मिलते हैं। गुफ़ा के सामने शासन द्वारा मंच बनाकर इसके प्राकृतिक सौंदर्य को समाप्त कर दिया गया है। सीमेंट से बना यह मंच मखमल में टाट का पैबंद नजर आता है। पर्यटकों की सीधी पहुंच गुफ़ा तक होने के कारण इसका भी क्षरण हो रहा है। यदि ऐसा ही रहा तो इसका प्राकृतिक सौंदर्य समाप्त हो सकता है।

180 फ़ुट लम्बी सुरंग"हाथी पोल"
गुफ़ा के नीचे पहाड़ी में हाथी पोल नामक सुरंग है। इसकी लंबाई 180 फ़ुट है। पहाड़ी उस पार के निवासी इस गुफ़ा सुरंग के रास्ते सीता बेंगरा तक आते हैं। यह सुरंग इतनी ऊंची है कि इसमें हाथी आसानी से पार हो जाते हैं। इसीलिए इसे हाथी खोल या हाथी पोल कहा जाता है। हम सीता बेंगरा गुफ़ा से नीचे उतर कर हाथी पोल सुरंग में पहुचे, यहाँ सामने खड़े होने पर सुरंग से दूसरे सिरे आता हुआ प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है। सुरंग के भीतर प्रवेश करने पर जानी पहचानी गंध आती है। यह गंध सभी पुरातात्विक स्थलों पर मिलती है। दिमाग भन्ना जाता है, इस गंध से मुझे प्राचीन जगह की पहचान होती है। यह गंध चमगादड़ के मल-मुत्र की है। जहाँ भी गुफ़ाओं या पुरानी इमारतों में अंधेरा रहता है चमगादड़ उसे अपना आदर्श बसेरा समझ कर निवास कर लेते हैं। सुरंग में पहाड़ी से कई जगह पानी रिस रहा है, आए हुए लोग इस पानी को पी रहे हैं। कुछ लोग धूप से बचने के लिए सुरंग में नींद ले रहे है, एक महिला और उसकी बेटी पत्थरों का चुल्हा बनाकर भोजन बना रही है और खाने के लिए ताजा पत्तों की पत्तल का निर्माण हो रहा है। इससे प्रतीत होता है कि आदिम अवस्था में मनुष्य इन कंदराओं में ऐसे ही गुजर बसर करता होगा।

रामगढ पहाड़ी का दृश्य ( यह चित्र इंडियन एक्सप्रेस ने चुराया)
महाकवि  कालिदास का रामगिरि और सीतबेंगरा से गहरा नाता है। यह पुरातात्विक प्रमाण और कालिदास द्वारा रचित मेघदूत से मिलते हैं। हम कालिदास से तो मिले नहीं पर उनके द्वारा रचित मेघदूत के छंद और यक्ष-प्रिया की प्रेम कथा अभी तक रामगढ के वनों में पहाड़ियों में गुंज रही है। आज भी मधुमक्खियों के छत्तों से उत्तम मकरंद झर रहा है। महुआ के वृक्ष फ़ल फ़ूल रहे हैं, सरई (साल) के वन गर्व से सिर उठाकर आकाश की ऊंचाई से होड़ लगा रहे हैं। गजराज आज भी अपनी उपस्थिति इस अंचल में बनाए हुए हैं। यहां के हाथी इंद्र के एरावत से कम नहीं है। डील-डौल और कद में उतने ही मजबूत है। आषाढ के प्रथम दिन वर्षा का आगमन नहीं हुआ है। बदला है तो सिर्फ़ प्रकृति का चक्र बदला है। मानसून के आगमन की तिथि पीछे रह गयी। वही मांदर की थाप वनवासियों का नाच हो रहा है। जो रामगढ की गौरव गाथा गा रहे हैं उल्लासित होकर। रामगढ से लौट आया पर मेरा मन उन्हीं कंदराओं में अटका हुआ है जहाँ भगवान श्रीराम के चरण पड़े थे, सीता माता ने निवास किया था। महाकवि कालीदास ने मेघदूत रचा था, जहाँ सुतनुका देवदासी और रुपदक्ष (मेकअप मेन) श्रेष्ठी देवदीन का प्रेम हुआ था। फ़िर कभी लौट कर आऊंगा रामगढ यक्ष बनकर प्रिया से मिलने के लिए आषाढ के प्रथम दिवस में।………… आगे पढें

दंतैल हाथी से मुड़भेड़

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हेशपुर के मंदिरों के पुरावशेष देख कर जंगल के रास्ते से लौट रहे थे। तभी रास्ते में सड़क के किनारे हाथी दिखाई दिया। एक बारगी तो दिमाग की बत्ती जल गयी। सरगुजा के जंगलों में हाथी का दिखना और देखना दोनो ही खतरनाक होता है। छत्तीसगढ के रायगढ, कोरबा, जशपुर और सरगुजा के जंगलों में हाथियों के उत्पात से प्रतिवर्ष बहुत सी जाने जाती हैं और जंगलवासियों के घर तबाह हो जाते हैं। इन हाथियों से मुकाबला करने एवं बचाव के लिए सरकार के प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। एक बार आसाम से 2003 में ही हाथी विशेषज्ञ पार्वती बरूआ के नेतृत्व में जशपुर में हाथियों को पकड़ने का प्रयोग किया जा चुका था, जिसमें एक हाथी पकड़ा गया और अठारह दिनों में ही मर गया। हाथी के मरने पर प्रदेश सरकार ने पार्वती बरूआ के साथ अपने अनुबंध को समाप्त कर उन्हें वापस भेज दिया। परन्तु जंगली हाथियों से बचाव का कोई हल नहीं निकला। ये वनों के प्राकृतिक वातावरण में स्वछन्द विचरण कर रहे हैं। जिस गांव में प्रवेश कर गए उसे तो पूरा ही तबाह करके छोड़ते हैं। आज इन हाथियों से तकरीबन पूरा एक जिला ही नहीं पूरा संभाग आतंकित है। मानवीय छेड़छाड़ और धान, महुआ शराब के प्रति इनकी रूचि इतनी बढ़ गई है कि हाथियों के एक दल ने जिला मुख्यालय के मायापुर मुहल्ले में अपनी उपस्थिति बताकर शहरी लोगों को भी सावधान रहने चेतावनी दे डाली है।
मेरे द्वारा हाथी का पहला चित्र- सड़क पार से

आज 122 हाथियों का दल पांच दलों में बंटकर इन प्रभावित जिलों में लूटपाट एवं आतंक पैदा कर रहा है। इनमें से लगभग पचास हाथियों के तीन दलों ने जिले में भ्रमण कर सरगुजा जिले को अपने प्रभाव क्षेत्र में कैदकर रखा है। पिछले कुछ सालों में हाथियों ने 72 लोगों को कुचल डाला है।हाथियों का प्राकृतिक आवास और उदरपूर्ति का क्षेत्र लगभग समाप्ति की ओर है इसलिए हाथी सरगुजा में घुस रहे हैं। सिंहभूमि के हाथी भी इन्हीं कारणों से झारसुगुड़ा होकर यहां अपना रहवासी क्षेत्र खोजने आ रहे हैं। स्थानीय जंगलों में इन हाथियों को कुछ सुकून मिल रहा है इसलिए यहां ये बार-बार दस्तक दे रहे हैं। जिले में अवैध कटाई, बस्तियों का अतिक्रमण एवं वनभूमि अधिकार पत्र पाने की होड़ में जंगल रातों-रात साफ हो रहे हैं। इन्हीं कारणों से हाथियों का दल अब मानवीय बस्तियों से भी गुरेज नहीं कर पा रहा है। सरगुजा के नामकरण के पीछे हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इससे ऐसा भान होता है कि सरगुजा में भारी तादाद में हाथियों की उपस्थिति रही होगी। सरगुजा शब्द सुरगज, सरगजा या स्वर गजा का विकृत रूप हो सकता है। सुरगज- जहां इन्द्रदेव के हाथी ऐरावत जैसे हाथी पाए जाते हों। सरगजा- जहां हाथियों के विशालकाय सिर ही सिर दिखते हों। स्वरगजा- जहां हाथियों का स्वर चिंघाड़ गुजता रहता हो। इस प्रकार सरगुजा नाम की व्युत्पत्ति इन शब्दों से विकृत होकर हो सकती है।
दूसरा चित्र - हाथी के नजदीक जाकर, इसके बाद मेरे मोबाईल की बैटरी धोखा दे गयी

हम हाथी तो बचपन से देखते आए हैं।पालतु हाथी देखे और उसकी सवारी भी की। लेकिन हाथी के प्राकृतिक आवास में उसे पहली बार हम सभी ने देखा। हाथियों का झुंड नहीं था वह अकेला ही सड़क उस पार पेड़ों के बीच खड़ा था। कुछ वनवासी भी सड़क के इस पार खड़े होकर हाथी की गतिविधि देख रहे थे। हमने थोड़ी दूर पर कार रोक दी क्योंकि फ़ोटो लेने का लोभ नहीं छोड़ पा रहे थे। मै, राहुल सिंह, बाबू साहब, के पी वर्मा ने अपना-अपना हथियार(कैमरा) संभाला और चित्र लेने लगे।
बाबू साहब के मोबाईल कैमरे का चित्र

दूरी होने के कारण मेरे मोबाईल में हाथी का चित्र ठीक से नहीं आ रहा था। हाथी को चित्र में कैद करने के लालच से मै सड़क पार करके उसके समीप चला गया। मुस्किल से 20-25 फ़ुट की दूरी होगी। तब हाथी का पार्श्व भाग दिख रहा था। जैसे ही मैने कैमरा साधा उसने मुंह सीधा करके कैमरे की तरफ़ कर लिया जैसे फ़ोटो खिंचाने के लिए पोज दे रहा हो। लेकिन जैसे ही उसने आगे मेरी ओर कदम बढाया, मुझे लगा कि दौड़ाने वाला है। जान बचाकर भागने में ही भलाई है। बस मैने दौड़ लगा दी। मेरे कार के समीप पंहुचते तक सभी साथी कार में समा चुके थे।
समीप से फ़ोटो लेने  के लिए जाते हुए- बाबू साहब के मोबाईल कैमरे का चित्र
हमारे सामने हाथी और कार को उसके सामने से निकालना खतरे से खाली नहीं था। हाथी तो बड़ी-बड़ी बस को टक्कर मार कर पलटा देते हैं। फ़िर उसके सामने कार की क्या बिसात है? तभी लोगों के मना करने के बाद भी एक मोटर सायकिल सवार हाथी के सामने वाले रास्ते से गुजर गया। हाथी का ध्यान उधर बंटते ही हमारे ड्रायवर ने कार आगे बढा दी। डब्लु बी एम रोड़ होने के कारण स्पीड भी नहीं चला सकते थे। पर जीवन में पहली बार जंगली हाथी को इतने करीब से देखा और उसकी फ़ोटो लेना रोमांचित कर गया। फ़ोटो लेते वक्त सभी मित्रों के कैमरे की फ़्रेम ऐसे फ़िट थी कि मजा आ गया।
पोजिशन लेकर मुझे और हाथी को कैद करते बाबु साहब - चित्र: राहुल सिंह जी द्वारा

मै हाथी को फ़ोटो ले रहा था तो बाबु साहब का कैमरा मेरी और हाथी की। फ़िर राहुल सिंह जी का कैमरा मेरी, हाथी और बाबु साहब की फ़ोटो ले रहा था। इसके बाद केपी वर्मा जी अपने एस एल आर कैमरे से हम सबकी फ़ोटो ले रहे थे। मतलब इस मुड़भेड़ के सभी गवाह थे। जंगली हाथी खतरनाक ही होते हैं और एक बार पीछे पड़ गए तो जान बचाना नामुमकिन है। कुछ दिनों पूर्व तीन हाथी हाईवे पर बैठ गए थे। 6 घंटे तक ट्रैफ़िक जाम रहा। सारा प्रशासनिक अमला लगा रहा उन्हे हटाने के लिए, पर वे गए अपनी मर्जी से। जंगली हाथी यह मुड़भेड़ जीवन भर याद रहेगी। क्योंकि जंगली हाथी शेर से भी खतरनाक होता है।
हाथी के आगे बढते ही  रवानगी डालते मैं और बाबु साहब - चित्र: राहुल सिंह जी द्वारा
डॉ के पी वर्मा के पास SLR (रील वाला) कैमरा था, उसके चित्र डेवलप होकर नहीं आए हैं। फ़ुल साईज में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें.
पोस्ट अपडेट - डॉ कामता प्रसाद वर्मा के एस एल आर कैमरे की फ़ोटो
डॉ के पी वर्मा के पास SLR (रील वाला) कैमरे का चित्र डेवलप होकर आ गया। हाथी से मुड़भेड़ की कहानी चित्रो। की जुबानी। फ़ुल साईज में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें. ……… आगे पढें

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मारी सुबह देर से हुई, बाकी साथी तैयार होकर चले गए और हम अलसाए पड़े थे। 11 बजे उदयपुर जनपद मुख्यालय में संगोष्ट्री प्रारंभ होनी थी, समय पर पहुंचना ही ठीक होता है। स्नानाबाद नाश्ता करने लिए बाहर जाना पड़ा क्योंकि आर्यन होटल में किचन नहीं है। रुम सर्विस का भी सत्यानाश है। थोड़ी देर में हमारी गाड़ी आ गयी। अनिल तिवारी और बाबु साहब के साथ हम रामगढ पहुचे। वहां राहुल सिंह एवं के पी वर्मा पहुंच चुके थे। साथ में देवनारायण सिंह जी की सुपुत्री भी थी। युवा एसडीएम तीर्थराज अग्रवाल के निर्देशन में कार्य चल रहा था। जनपद के सामुदायिक भवन में संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र प्रारंभ हुआ। दीप प्रज्जवल ने के प्रश्चात उपस्थित मुख्यातिथियों के उद्घाटन उद्बोधन के पश्चात "आषाढस्य प्रथमदिवसे" शोध संगोष्ठी प्रारंभ हुई। दो विद्वानों ने अपने शोध पत्र पढे तभी भोजन की घोषणा हो गयी। हम रेस्टहाउस के भोजन स्थल पर आ गए। थोड़े अंतराल के पश्चात संगोष्ठी पुन: प्रारंभ होनी थी।

डॉ केपी वर्मा
द्वितीय सत्र में ननका बाबू ने सरगुजा की विरासत के विषय में बहुत ही सारगर्भित जानकारी दी। बताया कि उन्होने किस तरह सरगुजा अंचल को कदमों से नापा है। अनेक स्थानों पर पैदल चल कर गए हैं। जिसका उद्देश्य सरगुजा की देव भूमि को समीप से जानना था। उन्होने सरगुजा के हाथियों का भी जिक्र किया। साथ ही बताया कि जब तापमान नापने का यंत्र नहीं था  तो स्थानीय निवासी किस तरह जाड़े को मुट्ठी, बीता, ढूड्डी और हाथ से नापते थे। इसके पश्चात  डॉ कामता प्रसाद वर्मा ने "महेशपुर में प्राप्त नरसिंह प्रतिमाओं" पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया। ये नरसिंह प्रतिमाएं विभिन्न मुद्राओं में प्राप्त हुई हैं। वर्मा जी का शोध-पत्र नवीन जानकारीपरक था। कुछ लोगों ने सिर्फ़ अपना शोध पत्र रामगढ (रामगिरि) पर ही केन्द्रित किया था। इसके पश्चात के समारोह के अतिथि मेजर अनिल सिंह आ गए। उनके स्वागत के पश्चात मैने अपना शोध पत्र (छत्तीसगढ की सांस्कृतिक विरासत: हसदपुर) पढा। हसदपुर (हसदा) की जानकारी पहली बार विद्वानों के बीच मेरे द्वारा ही आई। मेरा शोध पत्र निम्नानुसार था - 

छत्तीसगढ की समृद्ध पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत

सिरपुर का मूर्ति शिल्प
छत्तीसगढ राज्य पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से सदा से ही वैभवशाली रहा है। जहाँ प्रकृति ने सुंदर कल-कल करते झरने, नदी, नाले, वन पहाड़ों से समृद्ध किया वहीं शिल्पकला, मूर्तिकला, ललितकला एवं अपने तीज त्यौहारों, मेलों से छत्तीसगढ ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करते हुए विश्व पटल पर अपना स्थान बनाया। बस्तर से लेकर सरगुजा तक पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत के अवशेष कदम-कदम पर बिखरे हुए हैं। छत्तीसगढ़ राज्य चित्रित शिलाश्रयों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है. इन चित्रों के अध्ययन से प्रागैतिहासिक काल के आदि मानवों की जीवन शैली, उस काल के पर्यावरण तथा प्रकृति की जानकारी प्राप्त होती है. यहाँ मध्याश्मीय काल से लेकर ऎतिहासिक काल तक के शैलचित्र प्राप्त होते है। छत्तीसगढ़ में 32 ऐसे स्थान हैं जहां शैल चित्र खोजे गये है इनमें सबसे ज्यादा रायगढ़ जिले में है। इन शैलचित्रों में प्रदर्शित कुछ अलंकरण आज भी आदिवासी कलाओं में जीवित है। बस्तर जिले में केशकाल लिमदरिहा, सरगुजा जिले में सीतालेखनी, ओंड़गी कुदुगढ़ी आदि अनेक स्थान पर चित्रित शैलाश्रय पाये जाते है. छत्तीसगढ में लगभग 45 धूलि दुर्ग (मड फ़ोर्ट) की खोज हो चुकी है। 

माता कौशल्या की जन्मभूमि

माता कौशल्या की जन्मभूमि चंदखुरी (चन्द्रपुरी) में तीजा उत्सव
माता कौशल्या की जन्म भूमि होने एवं अयोध्या के राजा रामचंद्र की कर्म भूमि होने के भी प्रमाण मिले हैं।  छत्तीसगढ़ में धर्म, कला व इतिहास की त्रिवेणी अविरल रूप से प्रवाहित होती रही है। हिंदुओं के आराध्य भगवान श्रीराम 'राजिम' व 'सिहावा' में ऋषि-मुनियों के सानिध्य में लंबे समय तक रहे और यहीं उन्होंने रावण के वध की योजना बनाई थी। 'राजिम कुंभ' को देश के पाँचवें कुंभ के रूप में मान्यता मिली है। सिरपुर की ऐतिहासिकता यहाँ बौद्धों के आश्रम, रामगिरी पर्वत, चित्रकूट, भोरमदेव मंदिर, सीताबेंगरा गुफ़ा स्थित जैसी अद्वितीय कलात्मक विरासतें छत्तीसगढ़ को आज अंतर्राष्ट्रीय पहचान प्रदान कर रही हैं।  आवश्यकता हैं उन्हे संजोने एवं संरक्षित करने के साथ विश्व में प्रचारित और प्रसारित करने की। छत्तीसगढ राज्य निर्माण के पश्चात पुरातत्व तथा संस्कृति के संरक्षण संवर्धन का कार्य होने लगा। पुरातात्विक महत्व के नए स्थान सामने आए एवं प्राप्त स्थानों पर उत्खनन प्रारंभ हुआ। जिससे हमें इतिहास की प्रमाणिक जानकारीयाँ प्राप्त हुई। इसमें सिरपुर, महेशपुर, पचराही एवं मदकू द्वीप का उत्खनन मील का पत्थर साबित हुआ। वर्तमान में तुरतुरिया एवं तरीघाट में उत्खनन प्रारंभ है। 

हसदा (हसदपुर) एक परिचय

छत्तीसगढ में अनेकों ऐसे स्थान है जहाँ तक हम पहुंच नहीं पाए हैं और पहुंच गए हैं तो उसके ऐतिहासिक महत्व के विषय में जानकारी नहीं है। ऐसे ही एक स्थान हसदा (प्राचीन नाम हसदपुर) के विषय में जिक्र करना चाहूंगा। मेरा आलेख हसदा पर ही केंद्रित है।हसदा लगभग 5000 हजार की आबादी का गाँव है। जहाँ साहू, सतनामी, जातियों का बाहुल्य है। हसदा रायपुर जिले की अभनपुर तहसील में रायपुर राजिम मार्ग पर अभनपुर से 10 किलोमीटर पूर्व दिशा में 21N05, 81E46 पर स्थित है तथा कृषि उत्पादन की दृष्टि से समृद्ध ग्राम है। धान एवं चने की खेती होती है, रबी फ़सल के लिए भी पानी उपलब्ध है।
हसदा ग्राम का गुगल दृश्य

800 से 1000 वर्ष पुराना पीपल

हसदा में  एक प्राचीन पीपल का वृक्ष है जिसकी उम्र लगभग 800 वर्ष है। जहाँ प्राचीन पीपल का वृक्ष है वह मालगुजार की पुरानी बखरी है। बखरी लगभग 3-4 एकड़ की होगी, इसमें एक राम मंदिर बना है और उसके पीछे पीपल का विशाल वृक्ष है। पीपल के  नीचे एक प्लेटफ़ार्म बनाकर झोंपड़ी नुमा छाया बनी है। वृक्ष के नींचे एक बहुत बड़ी बांबी है और वहीं पर हनुमान जी का छोटा सा दक्षिण मुखी मंदिर भी बना है। सामने एक वलयाकार हवनकुंड है जिसमें पूजा के फ़ूल चढाए हुए हैं। पीपल के नीचे दीप जलाने के लिए टीन का कांच लगा आयताकार डिब्बा रखा है। बखरी में नाना फ़ड़नवीस रहते है, वे मालगुजार के संबंधी है और हसदा उनका पैतृक गांव है। 
पीपल का वृक्ष  और राजा गोपीचंद की तपस्थली

राजा गोपीचंद की तपस्थली 

बाजीराव पेशवा के छोटे भाई चिमना जी अप्पा जब बंगाल पर आक्रमण करने के लिए आए थे तब नाना फ़ड़नवीस के पूर्वज चिमना जी साथ यहाँ पहुचे। छत्तीसगढ पहुचने पर चिमना जी अप्पा को अपने भाई बाजीराव पेशवा की बीमारी की सूचना मिली तो वे लौट गए और उनके पूर्वज यहीं रह गए। नाना फ़ड़नावीस की उम्र लगभग 80 वर्ष है, वे गाँव के हायर सेकेंडरी स्कूल से प्राचार्य पद पर रहते हुए सेवानिवृत हुए हैं। उन्होने बताया कि यह पीपल का वृक्ष लगभग 800 से 1000 वर्ष पुराना है। उनके गुरुजी स्वामी विकासानंद जी ने बताया था कि इस वृक्ष के नीचे बंगाल के राजा गोपीचंद ने तपश्चर्या की थी। राजा गोपीचंद नौ नाथों में जालंधर नाथ के शिष्य थे एवं राजा भृतहरि के भानजे थे। छत्तीसगढ में भरथरी लोक गाथाओं के रुप में प्रचलित है। 
नाना फ़ड़नवीस के साथ 

किलानुमा संरचना

कहते हैं पहले यहाँ किला था। गाँव के चारों ओर खाई थी। जिसके अवशेष अभी भी दिखाई देते हैं। इस खाई की तसदीक मैने की, गांव के अन्य निवासियों से भी जानकारी प्राप्त की। जहाँ खाई थी वहां अब खेत हैं। किन्तु खाई के चिन्ह अभी भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। यहां के खेत खाई के हिसाब से गोल बने हुए हैं और इन खेतों को ग्राम वासी अभी भी खइया कहके ही बोलते हैं। हसदा गाँव में 7 तालाब हैं। इससे जाहिर होता है कि कोई बड़ी आबादी पहले यहाँ निवास करती थी और किसी राजा या मालगुजार ने उनकी निस्तारी के लिए तालाब खुदवाए होगें या किले के परकोटे की खाई ने तालाबों का रुप ले लिया होगा।

प्राचीन महामाया  मंदिर

उन्होने बताया कि खइया की तरफ़ महामाया का एक प्राचीन मंदिर है। हम मंदिर देखने गए। महामाया मंदिर में देवी के साथ भैरव भी विराजमान हैं। कुछ वर्षों पूर्व महामाया के पक्के मंदिर की जगह कच्चे मिट्टी की कुरिया का निर्माण था। अब पक्का मंदिर बना दिया गया है। यहाँ नित्य पूजा होती है, महामाया का मंदिर यहाँ कब है इसकी कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं है।

स्वामी विकासनंद (लाम्बे महाराज) का आश्रम

हसदा की बखरी में स्वामी विकासानंद का आश्रम है, वे नागपुर से यहाँ आकर निवास करते थे। शांत हो जाने के पश्चात उनके प्रयोग का सामान आज भी यथावत रखा हुआ है। उनके पूजा करने का कमरा भी उसी रुप में है जैसा पहले था। इनके कई आश्रम बताए जाते हैं। नागपुर और जबलपुर के गुवारीघाट के आश्रम प्रमुख है। उन्होने बखरी में एक राम मंदिर का भी निर्माण कराया। कमरछठ के दिन हसदा की समस्त महिलाएं बखरी में ही कमरछठ की पूजा करने आती हैं। इस स्थान पर कमरछठ की पूजा करने की परम्परा बरसों से चली आ रही है।

सितम्बर 1666 ईस्वीं में शिवाजी का आगमन

कुछ शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि औरंगजेब की कैद से जब शिवाजी राजे भागे तो वे आगरा से इटावा, अलाहाबाद, मिर्जापुर, दुधिनगर, अम्बिकापुर, रतनपुर, रायपुर, हसदा, चंद्रपुर होते हुए पुणे गए थे। क्योंकि अन्य मार्गों पर मुसलमानों का कब्जा था तथा इस मार्ग पर तीर्थयात्री देवियों के दर्शन के लिए आते थे। कहते हैं इसी मार्ग से शिवाजी छिपते हुए पुणे गए थे। संभवत: शिवाजी सितम्बर माह सन 1666 ईसवीं में हसदा आए थे। आगरा से निकल कर शिवाजी के चंद्रपुर आने का उल्लेख चंद्रपुर दर्शन पत्रिका में उल्लेखित है। चंद्रपुर के इतिहासकार दत्तात्रेय नानेरकर एवं अशोक ठाकुर इसकी पुष्टि करते हैं। 
प्रमाण पत्र

प्रारंभिक जानकारियों से प्रतीत होता है कि हसदा का इतिहास से गहरा नाता है, क्योंकि 8 किलोमीटर दूर महानदी चित्रोत्पला गंगा बहती है और कुलेश्वर (उत्पलेश्वर) महादेव का मंदिर एवं राजीव लोचन भगवान का मंदिर स्थित है। हसदा की भौगौलिक स्थिति से तो पता चलता है कि अवश्य ही यहाँ इतिहास के कुछ पन्ने समय की गर्द में दबे पड़े हैं जिन्हे सामने लाना चाहिए।  जिससे छत्तीसगढ के पुरातात्विक एवं गौरवमयी इतिहास में एक कड़ी और जुड़ जाएगी। विस्तार पूर्वक प्रामाणिक जानकारी उत्खनन एवं शोध के पश्चात ही मिल सकती है। 

शोध-पत्र प्रस्तुत करने के पश्चात हम महेशपुर के लिए चल पड़े।  जारी है……आगे पढें……

सुरगजा से सरगुजा

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रगुजा छत्तीसगढ का एक जिला और सम्भाग है। सरगुजा जिला राजनैतिक सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों का आदिकाल से ही प्रमुख केन्द्र रहा है।  भारतीय कला के इतिहास में सरगुजा का विशेष महत्व है। सरगुजा के अंतर्गत रामगढ, लक्ष्मणगढ, महेशपुर, सतमहला, बेलसर, कोटगढ, डीपाडीह आदि में पुरातात्विक संपदा बिखरी पड़ी है। यहाँ शिल्पियों ने शिल्पकला का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए अद्वितीय शिल्प का निर्माण किया। कलचुरी कालीन शासकों ने शिल्पकला का अनुपम पक्ष प्रस्तुत किया। पुरासम्पदा एवं प्राकृतिक सौंदर्य, खनिज एवं वन सम्पदा की दृष्टि से धनी और सम्पन्न है। सरगुजा जिले का मुख्यालय अम्बिकापुर है। सरगुजा क्षेत्र के अंतर्गत रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, महेशपुर, बेलसर, सतमहला, कोटगढ़, डीपाडीह आदि प्रमुख स्थान आते हैं। जहाँ की पुरासम्पदा एवं प्राचीन कलाकृतियां अद्वितीय हैं। नामारुप सरगुजा (सुरगजा) जंगली हाथियों के लिए भी प्रसिद्ध है। अम्बिकापुर में स्थित महामाया मन्दिर है। महामाया कलचुरियों की इष्टदेवी मानी गयी है। जहाँ-जहाँ कलचुरियों का शासन रहा, वहाँ-वहाँ उनके द्वारा महामाया मन्दिर का निर्माण कराया गया तथा मन्दिर के पार्श्व में किला बनवाया गया। सरगुजा का महामाया मन्दिर कलचुरिकालीन कला परम्परा का श्रेष्ठ नमूना है। सरगुजा के रामगढ में प्रतिवर्ष आषाढ मास के प्रथम दिन "आषाढस्य प्रथमदिवसे" नामक आयोजन छत्तीसगढ के पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग द्वारा किया जाता है। इस आयोजन में राष्ट्रीय स्तर पर शोध संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। महाकवि कालीदास का नाम भी सरगुजा के साथ जुड़ा हुआ है। यहाँ भगवान राम भी आए थे। धार्मिक दृष्टि से भी सरगुजा  महत्वपूर्ण है।

सरगुजा का राजसिंहासन
वैसे सरगुजा मेरा पूर्व में भी आना हुआ है। परन्तु इस बार की यात्रा का प्रयोजन विशेष था। आयोजन समिति के निमंत्रण मुझे अपना हसदा (हसदपुर) पर शोध-पत्र प्रस्तुत करना था। 4-5 जून को दो दिवसीय कार्यक्रम में जाने मन आमंत्रण मिलते ही बना लिया था। सरगुजा के प्राकृतिक सौदर्य के साथ कुछ पुरातात्विक महत्व के स्थलों का भ्रमण करना था और जब पुराविद साथ हों तो आनंद चौगुना हो जाता है। जो एक साधारण मनुष्य नहीं देख समझ पाता वह हम उनके द्वारा समझ लेते हैं।  संज्ञा टंडन भी बिलासपुर से रायपुर आई हुई थी। कार्यवश उनसे भी मिलना था। इसलिए 3 जून को घर से पूरी तैयारी के साथ ही रायपुर के लिए प्रस्थान किया। अगर रात को जाना हो तो भी जाया जा सके। दादा जी कहते थे - अगर चूहे का शिकार करना हो तो भी शेर के शिकार का समान साथ होना चाहिए अर्थात पूरी तैयारी के साथ चलना चाहिए। महंत घासीदास संग्रहालय के मुक्ताकाशी मंच पर "यादें हबीब" कार्यक्रम के अंतर्गत नाचा एवं नाटक का भी मंचन था। अब एक पंथ और कई काज साधने के इरादे से रायपुर पहुंच गए।

हेमंत वैष्णव (राजा फ़ोकलवा)
संज्ञा जी को फ़ोन लगाया तो वे पहुंची और हम भी हेमंत वैष्णव के साथ पहुंच गए। वार्ता होने के पश्चात मुक्ताकाशी मंच पर आ गए। वहां तैयारी हो रही थी लोक नाट्य (नाचा गम्मत) की। हमने वहां बैठकर पूरा गम्मत देखा। रात्रि के 9 बज चुके थे। तय हुआ कि सुबह की साऊथ बिहार एक्सप्रेस से चांपा तक जाएं फ़िर साथियों के आने बाद आगे का सफ़र किया जाए। हेमंत के आग्रह पर मैने उसके घर में रात रुकने का कार्यक्रम बना लिया। अनुज का फ़ोन आने पर उसे बता दिया कि आज हेमंत वैष्णव के घर का दाना पानी लिखा है। हेमंत के घर पहुंच कर भोजन किया और कुछ समय नेट पर गुजारने के बाद निद्रा देवी की आराधना में लग गए और हेमंत लाफ़्टर ऑडिशन के लिए स्क्रीप्ट लिखते रहा। सुबह होने पर जल्दी ही तैयार हो गए। साढे सात बजे स्टेशन पहुंच कर टिकिट ली। साउथ बिहार का समय रायपुर पहुचने का 7.55 है। गाड़ी निर्धारित समय पर पहुंच गयी। बिहार और बंगाल जाने वाली गाड़ियों में लोकल यात्रियों के लिए सीट मिलना बहुत कठिन हो जाता है। हमेशा ही इधर की सवारियाँ टंगे मिल जाती है। थोड़ी मसक्कत के बाद बैठने के लिए सीट मिल गयी और हमने अपना पाठ-पीढा जमा लिया। गर्दी के मारे फ़र्श पर भी पैर रखने की जगह नहीं थी। सवारियाँ खड़े-खड़े सफ़र का मजा ले रही थी। पर मुझे तो बैठने का स्थान मिल चुका था।

कथेसर
समय बिताने के लिए सत्यनारायण सोनी हनुमानगढ द्वारा भेजी गयी राजस्थानी की त्रैमासिक पत्रिका कथेसर पढने लगा। राजस्थानी भाषा की कोई पत्रिका पढना मेरे लिए पहला मौका था। भाषा पर क्षेत्र विशेष का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। राजस्थान बड़ा राज्य है और यहाँ क्षेत्र के हिसाब से लगभग 76 बोलियां बोली जाती हैं। सीमा क्षेत्र पर समीप के राज्यों का प्रभाव भी बोली पर रहता है। भरतपुर या झुंझनु का व्यक्ति जोधपुर बाड़मेर, नागौर, हनुमानगढ तरफ़ की बोली आसानी से नहीं समझ सकता। यह पत्रिका ठेढ मारवाड़ी में भी नहीं है, पर मिली जुली बोली का भी अपना ही आनंद है। कुछ कहानियाँ बड़ी मजेदार और ज्ञानवर्धक हैं। जिसमें नवनीत पाण्डे की "घुसपैठ", पेंटर भोजराज सोलंकी की "डर", श्रीभगवान सैनी की मार्मिक कहानी "तीर", विजयदान देथा की "माँ" सामाजिक सरोकार से जुड़ी अच्छी कहानियाँ है। साथ ही मोहन आलोक का लेख "अभनै रा किस्सा" मुल्ला नसीरुद्दीन एवं अकबर बीरबल के किस्सों से इक्कीस ही है। धड़धड़ाती रेल में इन कहानियों को पढने का मजा आ गया। गरमी बढने से लू के थपेड़े लगने लगे। 10 बजे ही शोले बरसने लगे थे, आज नौतपा का अंतिम दिन था। सूर्य देवता पुर्ण प्रखरता पर थे। गाड़ी ने 1045 के सही समय पर चांपा पहुंचा दिया। साथियों ने 1 बजे चांपा पहुचने की कही थी। अब मुझे तीन घंटे यहीं काटने थे।

चांपा स्टेशन
स्टेशन के बाहर जाने से लू लग रही थी। इसलिए स्टेशन पर रहकर ही सवारियों के लटके झटके देखते हुए समय बिताने का निश्चय किया। क्योंकि समय बिताने के लिए स्टेशन से अच्छी जगह और दूसरी नहीं होती। स्टेशन पर सुरक्षा के लिए सुरक्षा बल, खाने के लिए भोजन, एवं विपत्ति के समय भागने के लिए ट्रेन तैयार मिलती है। भूख लगने पर चांपा के प्रसिद्ध बड़े लिए। चांपा से गुजरने वाली सवारियां यहां के बड़े जरुर खाती हैं। मैने टेस्ट करके देखे तो लगा कि बड़े चावल के थे। दाल का तो नामोनिशान ही नहीं था। बड़ी मुश्किल से खाए गए। चांपा के बड़ों में वो स्वाद नहीं रहा। मिलावटी होने के कारण  सिर्फ़ नाम ही रह गया। बड़ा खा ही रहा था इतने में कोरबा पुश पुल ट्रेन आ गयी। सवारियाँ चढने लगी। ट्रेन के जाते ही एक डोकरी चिल्लाते हुए आई कि- गाड़ी छुटगे गाड़ी छुटगे। अपने आप ही बोलने लगी कि - तीन पोतियों को गाड़ी में बैठाकर आम लेने गयी थी और गाड़ी चली गयी। अब लड़कियों को यह नहीं पता कि कौन से टेसन में उतरना है। पहली बार आई है उसके साथ, अब क्या होगा? अगली गाड़ी शाम 4 बजे थी। लोग अपनी तरफ़ से उसे सलाह देने लगे। मैने पैर फ़ैलाए और झपकी आ गयी लू के थपेड़ों में ही।

ढोकरा कला सिखाते हुए
फ़ोन बजने पर जागा,अपन भी हाथ मुंह धोकर नींद की खुमारी उतारने में लग गए। अब हमें कोरबा होते हुए अम्बिकापुर पहुंचना था। बाबू साहब से कोरबा में मिलना तय हुआ था। सही समय पर साथी पहुंच गए। जब हम कोरबा पहुचे तब भोजन का समय निकल रहा था। यहाँ के सुरुचि मारवाड़ी भोजनालय में पहुंचे और बाबु साहब का लोकेशन लेकर उन्हे सुरुचि में ही बुला लिया। बाबु साहब भी आ गए, अब आगे का सफ़र आनंददायी होने वाला था। बाबु साहब साथ रहें और बोरियत हो जाए यह हो ही नहीं सकता। आकार का कार्यक्रम देखने के बाद हमने ने नया पुरातत्व संग्रहालय देखने की इच्छा जाहिर की। बाबु साहब पुराने संग्रहालय में ले गए। जब उन्हे कहा गया कि नए संग्रहालय में जाना था तो उन्होने दिमाग पर जोर डाल कर कहा कि मेरी किडनी काम नहीं कर रही है, फ़ेल हो गयी। यहां से सीधे ही हम कटघोरा होते हुए अम्बिकापुर की ओर चल पड़े। रास्ते में शास्त्र चर्चा होते रही। घरेलु मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय विषयों पर चर्चा करते हुए हम रात को 9 बजकर 9 मिनट पर अम्बिकापुर के महामाया चौक के आगे स्थित अम्बर होटल तक पहुंच गए। यहां हमारे खाने की व्यवस्था थी। स्नान करके भोजनोपरांत हम होटल आर्यन में सोने के लिए आ गए।

रजवार पेंटिंग
बाबु साहब की कविताएं कठिन होती हैं, आम पाठक की समझ से बाहर होकर उपर से ही उड़ जाती हैं, कभी-कभी मेरे भी।:) एक दिन उनकी कविता आँच पर चढी हुई देखी। समीक्षक द्वारा उसमें मात्राओं की कमी बताई गयी थी लेकिन बाबु साहब ने गाकर सुनाया तो सारी मात्राएं फ़िट हो गयी। बात गाने के अंदाज की है। गाने के आरोह-अवरोह में मात्रा दोष दिखाई नहीं देता। बाबु साहब की इस काबिलियत के हम कायल हैं। बाबू साहब की डुएट गजल की एक बानगी देखिए - मेरा अंदाज जुदा प्यार जतलाने का, पा न पाया तुझे तो हस्ती मिटा जाने का। कैसा अंदाज तेरा प्यार जतलाने का, प्यार तू कर न सका, प्यार में मिट जाने का। यह गज़ल सुनकर हम तो घायल होकर कटे पंछी की तरह बिस्तर पर पड़ गए। रात सुखद स्वपनों से भरी रही। अम्बपाली थिरकते रही और हम सोते रहे। अम्बपाली को कैसे भुला सकते हैं। जो हमारा हमेशा प्रिय चाहती रही आर्यबलाधिकृत से। जारी है सरगुजा कथा………आगे पढें…  

बस्तर: अजूबों की धरती

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ढोकरा कला कृतियाँ
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यदेव जी के घर से निकले ही थे कि बहन का फ़ोन आ गया। उसने बताया कि खाना बनकर तैयार है विलंब न करें। दो शिल्प खरीदे गए थे, बिजली न होने के कारण उन पर पालिश नहीं हो पाई, जयदेव जी के पुत्र ने पालिश के लिए बिजली आने का इंतजार करने कहा। तब तक हमने भोजन करना ही जरुरी समझा। बहन के घर पहुंचे, वह बेताबी से इंतजार कर रही थी। बहनोई भी मधूक रस लाकर तैयार थे। उन्हे दो दिन पहले ही आर्डर कर दिया था। थोड़ा स्वाद चख कर भोजन किया। कोण्डागाँव में हरिहर वैष्णव जी रहते हैं। इन्होने हल्बी भाषा पर बहुत काम किया है। अभी बस्तर के परम्परागत संगीत पर कार्य कर रहे हैं। इनसे भी मिलना था, मैं और मनोज जी, हरिहर वैष्णव जी के घर पहुंचे। इनका घर सरगी पाल मोहल्ले में है। मनोज जी को घर का पता था इसलिए सीधे इनके घर ही पहुंच गए।

श्री हरिहर वैष्णव जी
फ़ोन लगाने पर उनका बालक बाहर निकला। हमें बैठक में बिठाया, थोड़ी देर में हरिहर वैष्णव जी पटका पहने उपस्थित हो चुके थे। मेरी उनसे पहली भेंट थी। चलभाष पर चर्चा तो होते रहती है पर रुबरु अभी ही हुए। इन्होने 12 किताबें बस्तर पर लिखी हैं, और विदेशी शोध कर्ता इनके सम्पर्क में रहते थे। मैने इन्हे "मोहनी" को लेकर फ़ोन किया था। अगर कोई मोहनी बनाने वाला मिले तो उसके विषय में कुछ सत्यान्वेषण किया जाए। मोहनी के विषय में चर्चा करने वे ठठा कर हँस पड़ते हैं। बोले कि-एक व्यक्ति मेरे साथ काम करता है। उसने पूछा किसके लिए बनाना है? तो मैने उसे टाल दिया। मैने कहा कि कभी समय मिला तो उनसे सम्पर्क करेगें। "मोहनी" के विषय में बचपन से सुनता आया हूँ लेकिन जिज्ञासा अभी तक शांत नहीं हुई है। अभी तक इसकी खोज में हूँ। कहीं उचित माध्यम मिले तो बताऊंगा। छत्तीसगढी का गीत भी है "का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फ़ूल" और भी कई गीत मोहनी को लेकर रचे गए हैं।

दंतेवाड़ा मंदिर में फ़ोटो ग्राफ़र का कलर प्रिंटर
नेट के विषय में वैष्णव जी से चर्चा होती है कि वे अपने काम को ऑन लाईन करें, जिससे उनका काम दुनिया तक पहुंचे। वे कहते हैं कि मैं वन विभाग में एकाऊंटेंट था, सेवानिवृति के 4 वर्ष पूर्व ही वी आर एस ले लिया। वी आर एस लेने का कारण यह था कि मेरे पास शोध कार्य के लिए समय कम है और काम अधिक है। नौकरी में रहते हुए इस कार्य को नहीं कर सकता था। इसलिए मुझे वी आर एस लेना पड़ा। उनके पास कम्पयुटर एवं नेट की सुविधा है, वे अपना लेखन कार्य कम्पयुटर पर ही करते हैं। छोटी सी मुलाकात के दौरान दो बार साथियों के फ़ोन आ जाते हैं कि अब चलना चाहिए। मैं उनसे इजाजत लेता हूँ तो वे चाय का आग्रह करते हैं। मैं चाय के लिए मना करता हूँ, लेकिन वे नहीं मानते। तो लाल चाय बनाने के लिए कहता हूँ। थोड़ी देर में लाल चाय बन कर आ जाती है। चाय पीकर हम उनसे विदा लेते हैं, वे आग्रह करते है पुन: भेंट के लिए। हम चल पड़ते है।

बहन के घर वह बार-बार मेरे दोहरे से इकहरे होने का राज जानना चाहती है। मैं कहता हूँ राज को राज ही रहने दो तो ठीक है। फ़िर आने का आश्वासन देकर वहाँ से चल पड़ते हैं। बारिश फ़िर शुरु हो चुकी है। चित्रकूट आते हुए भीगे होने के कारण हमने गाड़ी के काँच बंद कर लिए थे तो सांसों की भाप से विंड स्क्रीन के अंदर की तरफ़ भाप जम जाती थी। उसे लगातार साफ़ करना पड़ता था। हीटर चलाने पर और बढ जाती थी। आज हमने काँच खुले रखे, इससे विंड स्क्रीन पर भाप नहीं जमी। जगदपुर के रास्ते में कोण्डागाँव से केसकाल के बीच में कुछ वृक्ष सड़क के किनारे ही हैं और डामर रोड़ से सटे हुए। मैने कई वृक्षों पर दुर्घटना के चिन्ह देखे। अगर आपने अपनी लैन थोड़ी सी भी छोड़ी तो इन वृक्षों से टकरा कर दुर्घटना ग्रस्त हो सकते हैं। मैने इस मार्ग पर पेड़ों से टकरा कर कई गाड़ियाँ दुर्घटना ग्रस्त होते देखी है। इस रास्ते पर गाड़ी संभाल के ही ड्राईव करनी पड़ती है।

पुन: केसकाल घाट पहुंचते है, बादलों और बारिश के कारण दिन ढलने का पता ही नहीं चल रहा। धीरे-धीरे घाट से गाड़ी उतारते हैं। ड्रायवर को बताते जा रहा हूँ कैसे चलना है और घाट पर गाड़ी कैसे उतारना है। घाट पार करके हम कांकेर पहुंचते है, फ़िर वही बायपास पकड़ लेते है। शहर के बीच नहीं जाना पड़ता। पिछली बार जब बरसात के समय कांकेर आया था तो नदी के पुल पर भीड़ लगी थी। देखने के लिए रुका तो नदी में अठखेलियाँ करता एक बड़ा अजगर साँप दिखाई दिया। इतना बड़ा अजगर मैने अपनी आँखों से नहीं देखा था। वह कभी नदी के इस किनारे पर जाता कभी उस किनारे पर। थोड़ी देर बाद मैं आगे बढ लिया। लेकिन दूसरे दिन नई दुनिया समाचार पत्र में उसकी फ़ोटो और समाचार छपा था। वन विभाग वालों ने बड़ी मशक्कत से उसे पकड़ा था। कांकेर से आगे माकड़ी ढाबे में पुन: खीर खाने की योजना बन जाती है। लेकिन मैं खीर की बजाए सिर्फ़ चाय ही लेता हूं। क्योंकि मेरी भी जासूसी हो रही है जासूसों द्वारा। मीठा नहीं खाना चाहिए। चाहे हमारे जासूस रोज हलवा खाएं चोरी छुपे।

पोखरा (कमलगट्टा)
कांकेर से चारामा के आगे छोटा सा घाट पड़ता है। अंधेरा हो चुका था, गाड़ी की लाईटें रोशन कर ली गयी। हम चलते रहे चारामा घाट का मुझे ध्यान नहीं रहा। जगदलपुर से घाट शुरु होते ही घाट के पहले मोड़ को चौड़ा कर दिया गया है और उसके बीच में सीमेंट के ब्लॉक रख कर डिवाईडर बना दिया गया। अचानक गाड़ी डिवाईडर पर चढते दिखाई देती है। पीछे से आवाज आई "बचा लो भगवान, बचा लो भगवान।" गाड़ी डिवाईडर पर चढ गयी लेकिन थोड़ी देर में संभलने के बाद एक जगह के निकले हुए ब्लॉक से फ़िर रास्ते पर आ गयी। चालक के होश गुम हो चुके थे। गाड़ी साईड में रुकवा कर मैने टार्च से गाड़ी के नीचे देखा। सामने से चेचिस तगड़ी रगड़ खा गया था। दाहिने तरफ़ की लाईट बंद हो गयी थी। अभी पता न था कि गाड़ी चलने की स्थिति में है या नहीं। थोड़ी देर गाड़ी को अच्छे से देखा, तभी छोटे भाई का फ़ोन आया। उसने हाल चाल पूछा और कहा कि -मैने सोचा आप गाड़ी ड्राईव कर रहे होगें इसलिए फ़ोन नहीं किया।

उदय नई यूनिफ़ार्म में
अब मित्र ने गाड़ी संभाली, धीरे-धीरे गाड़ी चलाते हुए बातें शुरु हो गयी। उन्होनें चालक को कहा कि दुर्घटनाएं सीख देती हैं। अब तुम बिना कहे की संभल कर चलोगे। सही है जब तक स्वयं गड्ढे में न गिरे तब तक गड्ढे का पता नहीं चलता। घर फ़ोन करके खाने की सूचना दी, हम लगभग 9 बजे घर पहुंचे। बच्चों को एक साल बाद देखते ही रौनक आ गयी। सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएं दी, उदय ने पूछा कि उसकी स्कूल यूनिफ़ार्म बनी कि नहीं? जिस दर्जी को उसकी यूनिफ़ार्म दी गई लगता है वह एक साल में ही सी कर लाएगा। मैने उसे आश्वासन दिया कि 2012 में पक्की मिल जाएगी। अभी तो तुम्हारे पास है ही काम चलाने के लिए। भोजनोपरांत मित्र का कारवां आगे बढ गया और बच्चों के साथ मशगुल हो गए। मैं सोच रहा था कि दर्जी के लिए कौन सा फ़ार्मुला फ़िट किया जाए जिससे वह उदय की स्कूल यूनिफ़ार्म सिल कर ले आए। आखिर कपड़े दिए 4 महीने हो गए, हद है भाई............आगे पढें......


जयदेव बघेल जी के घर (चित्र राहुल सिह जी के सौजन्य से)
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स्तर, भानपुरी से चल कर हम कोण्डागाँव पहुंचे, नाके के पास गाड़ी रोक कर एक पान वाले से जयदेव बघेल जी का घर पूछते हैं। तो वह कहता है कि सीधे हाथ की तरफ़ जो रास्ता जा रहा है उस पर चले जाईए। उनके नाम का बोर्ड लगा है। हम रास्ते पर आगे बढते हैं, गली में दोनो तरफ़ टेराकोटा के बने हुए शिल्प रखे हुए दिखते हैं। एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर अंगेजी में Dr. Jaydev Baghel लिखा दिखाई देता है, साथ उन्हे प्राप्त सम्मान भी लिखे हैं। सीमेंट की चार दीवारी पर टेराकोटा एवं पत्थर से बनी विभिन्न आकृतियाँ लगी दिखाई देती हैं। घर देखने से ही लगता है कि यह किसी शिल्पकार का घर है। गाड़ी की आवाज सुनकर नीले रंग के पेंट से पुता हुआ परम्परागत छत्तीसगढी नौबेड़िया दरवाजा खुलता है और एक नवयुवक बाहर आता है, मैं कहता हूँ, जय देव बघेल जी से मिलना है। वह बैठक का दरवाजा खोलता है और हमें बैठने को कहता है। बरसात के कारण आंगन में कीचड़ हो गया। मैं भीतर बैठक में पहुंचता हूँ तो सामने की दीवाल पर उन्हे प्राप्त सम्मान पत्र लगे हैं। इंदिरा जी से लेकर बड़े-बड़े नेताओं से सम्मान पाते उनके चित्र एवं 2003 में रविशंकर विश्वविद्यालय से डी लिट की मानद उपाधि प्राप्त करते हुए भी एक चित्र लगा है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
थोड़ी देर में भीतर से कुर्ता और धोती पहने एक वृद्ध आते हैं, उन्होने स्टीक का सहारा ले रखा है। पहचान जाता हूँ यही जयदेव बघेल जी हैं। राम राम जोहार के पश्चात स्नेह से मुझे अपने समीप बैठाते हैं और आने का कारण पूछते हैं। मैं कहता हूँ कि ईश्वर ने नए साल में आपसे मिलने लिखा था, इसलिए चला आया। अन्यथा सैकड़ों बार इस रास्ते से गुजरना हुआ, पहुंच नहीं पाया। सरल मृदू भाषी जयदेव जी को देख कर कोई नहीं कह सकता कि ये वही जयदेव बघेल हैं जिनके ढोकरा शिल्प का डंका पूरे विश्व में बजता है। वे मुझसे स्नेह के साथ चर्चा करते हैं। अपने पुत्र एवं नाती से परिचय करवाते हैं। पुत्र भी इनकी विरासत को आगे बढा रहा है। कुछ माह पहले साउथ अफ़्रीका में 3 माह तक शिल्प का प्रशिक्षण देकर आया है। सच में इनसे मिलना मुझे आल्हादित कर गया। उनका पुत्र सहयात्रियों को घड़वा शिल्प दिखाता है और मैं जयदेव जी के संस्मरण सुनने में व्यस्त हूँ। वे बताते जा रहे हैं और मैं सुनता जा रहा हूँ।  उनका सारा जीवन योगी की तरह शिल्प साधना को समर्पित है।

घर में लगे सम्मान पत्र
चर्चा करते हुए वे पुरानी यादों में खो जाते हैं, कहते हैं कि उनका परिवार अबुझमाड़िया है और हम घड़वा जाति के हैं। पिताजी अबुझमाड़ से आकर इस जगह पर बसे थे। इस जगह को भेलवांपदर पारा कहते हैं यह पारा मेरे पिताजी ने ही बसाया है। हम परम्परागत शिल्पकार हैं। मेरे पिताजी और माता जी ढोकरा शिल्प का कार्य करते थे। 1960 के सर्वे में मेरे पिताजी पूरे बस्तर जिले में वरिष्ठ शिल्पी थे। उसी समय बंगाल की प्रथम राज्यपाल पद्मजा नायडू ने पिताजी सम्मान किया और नेहरु जी को बताया कि घड़वा शिल्पी बस्तर में हैं। प्रख्यात मूर्ति शिल्पी मीरा मुखर्जी जर्मनी में शिल्प कला सीख रही थी। उसके बाद किसी के कहने से मेरे पिताजी के पास मूर्ति शिल्प सीखने आई। 1961 से 64 तक प्रत्येक वर्ष 2 महीना पिताजी के पास रहकर काम सीखती थी। फ़िर वह बड़ा काम करने लगी। 10-20 फ़िट की बड़ी मुर्तियाँ बनाने लगी। मोरारजी देसाई के समय 1977 में मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तो मै पुरस्कार पाने वालों में सबसे कम उम्र का था, मेरी उम्र 24 साल थी, उस समय 40 से लेकर 80-85 साल के लोगों को ही सभी राज्यों में से चयन करके राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाता था।

मुरिया मारिन (ढोकरा शिल्प)
मैं युरोप में बहुत घूमा हूँ सबसे पहले 1977 में मास्को के शिल्पमेला में भारत सरकार ने भेजा। उस समय लता मंगेश्कर ने वहाँ रशिया नाईट में गाया था, वे हमारे ग्रुप में ही गई थी। भारत से 4 लोगों को भेजा गया था। उनका संगीत का काम था इसलिए वे जल्दी आ गई और मैं 3 महीना मास्को में रहा। क्योंकि मुझे अपना काम दिखाना था। उसके बाद से मैं यूरोप में बहुत रहा। लंदन में 4 बार चार-चार महीने तक रहा। ग्लास्गो स्कूल ऑफ़ आर्टस में 3 बार चार-चार महीने तक वहाँ के विद्यार्थियों को काम सिखाया। स्विटजरलैंड में 3 माह रहा। जर्मनी की हेडनवर्ग युनिर्वसिटी में 3 माह रहा। आस्ट्रेलिया के सिडनी, मेलबोर्न, केनबरा में 2 साल तक 2-2 महीना तक, इटली, पेरिस, नीदरलैंड,सिंगापुर, थाईलैंड आदि स्थानों पर लम्बे समय तक रहा। इसके पश्चात लांसएजिल्स में 4 महीने रहा। उस समय वहाँ कबीर बेदी रहते थे। वे मेरी प्रदर्शनी में भी आए। सब चित्र मेरे पास याददास्त के तौर पर हैं। बैठक को पक्का बनाऊंगा तब सब दीवालों पर वे चित्र सजाऊंगा।

शेर (ढोकरा शिल्प)
जिस समय मैं लांसएंजिल्स में था उस समय ही रजनीश को अमेरिका से निकाला जा रहा था। वहां रजनीश ने रजनीशपुरम बसा रखा था और विनोद खन्ना वहीं मुझसे मिले थे। मेक्सिकों में 15 दिन रहा। सभी जगह काम के सिलसिले में ही गया। नीदरलैंड और इटली से आने के बाद डायबिटिज के कारण मेरा पैर कट गया। ये जयपुर वाला पैर लगाया हूँ। अब शुगर डाऊन हो जाती है। कभी 200 रहती है तो कभी 50-40 तक हो जाती है।जापान के ओसाका क्वेटो नारा में तीन बार दो-दो माह तक रहा। जापान की पुरानी राजधानी नारा है। वहाँ नदी के किनारे ढाई तीन हजार हिरण बैल-कुत्ते जैसे घुमते रहते थे। जो जापानी दोस्त हैं वो मेरे घर आकर ठहरते हैं। बहुत सारे विदेश मित्र आकर यहाँ काम सीखते हैं।

नंदी बैल (ढोकरा शिल्प)
टोकियों  के म्युजियम का नाम नेशनल शतग्या म्युजियम है। वहाँ म्युजियम में काम किया। मैं हर जगह ही म्यूजियम जाकर काम करता था। जब 1987 में स्विटजरलैंड के बाजल शहर के म्युजियम में गया तो वहां पर पिताजी के 35 काम रखे थे 87 के 50 साल पहले के। मैने जब उन्हे कहा कि यह मेरे पिताजी का काम है तो उन्हे विश्वास नहीं हुआ। वहाँ पर मेरे पिताजी की फ़ोटो भी लगी हुई है। जब मैने अपने पिताजी की एलबम रखी हुई फ़ोटो दिखाया तब उन्हे विश्वास हुआ। फ़िर वहाँ के बाजल टाईम्स में मेरे उपर जर्मनी भाषा में आर्टिकल लिखा गया। उसकी प्रति मेरे पास है। मेरे पिताजी द्वारा किया लगभग 75 साल पुराना काम बाजल के म्युजियम में रखा है। ब्रिटेन के एल्बर्ट म्युजियम में हमारे ढोकरा शिल्प का काम रखा हुआ है। उनका कहना है कि यह काम ढाई हजार साल पुराना है।

 काम करते हुए एक पु्राना चित्र
म्युजियम ऑफ़ मेन्स ने मेरा एक साढे चार फ़िट का काम 2500 पौंड में खरीदा। लेकिन वह रुपया मुझे इसलिए नहीं मिला कि मैं उस काम को 5000 में गर्वमेंट को बेच चुका था। वह रुपया गर्वमेंट के खाते में गया। मैं सरकार की ओर से गया था इसलिए उस पैसे पर मेरा हक भी नहीं बनता था। मैं इतनी जगह गया, कहीं भी गड़बड़ नहीं किया। अपने देश का नाम नहीं डुबाया, देश की बदनामी नहीं किया। देश का नाम ऊंचा ही करके आया। डांसिग फ़िगर सैकड़ों सालों से हमारे पूर्वज बनाते आ रहे हैं। मोहन जोदरो और हड़प्पा में भी ढोकरा शिल्प जैसा शिल्प ही मिला है। इससे जाहिर होता है कि ढोकरा शिल्प हमारी प्राचीन कला है। अखबारों में सिरपुर के विषय में पढता हूँ पता चला है कि वहाँ भी कुछ कांस्य शिल्प मिला है। मै एक बार वहाँ जाना चाहता हूँ। पैर कटने के कारण गाड़ी में ही जाना पड़ेगा।

पारम्परिक कारीगर
1982 में मैने एक आलेख ढोकरा शिल्प पर लिखा था। जिसका अंग्रेजी अनुवाद एक किताब में छपा है। टाटा पब्लिकेशन ने भी परम्पराग शिल्पकार नामक किताब में हम 4 शिल्पियों के विषय में प्रकाशन किया है। जिसमें सबसे पहले मेरे विषय में लिखा है फ़िर श्री काला हस्ती की कलम कारी के विषय में, बिहार की मधुबनी पेंटिंग के विषय में और एक लेख पॉटरी पर लिखा गया है। जिसका एक-एक लाख हम चारों को दिया था और बाकी पैसा हम लोगों ने चैरिटी में दे दिया। यह किताब 1500 रुपए की है। 1992 में माधवराव सिंधिया जी बुलवा कर यहीं शिल्पग्राम का उद्घाटन करवाया था। यहाँ सभी तरह के शिल्प लकड़ी, टेराकोटा, मैटल पत्थर, बुनकरी, पेंटिग, बांस शिल्प आदि 10 तरह के शिल्प कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था। फ़िर जितना भी शिल्प का कार्य था मैने उसे पूरे घर में लगा दिया। दूर से ही पता चल जाता है कि एक शिल्पकार का घर है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
जयदेव बघेल जी से चर्चा के दौरान चाय के लिए कहते हैं और मै मना करता हूँ। मुझे अभी बहुत दूर जाना था। खपरैल  की बैठक में कवेलु से पानी चूह रहा था। वे कहते हैं कि मेरे पिताजी की बनाई हुई निशानी है इसलिए तोड़कर बनाना  नहीं चाहता। घर तो इसके पीछे बना लिया पर इसे ज्यों का त्यों ही रख दिया। इस साल इसे भी पक्का कर दुंगा। उनकी कार्यशाला भी देखता हूँ जहाँ पर ढलाई का कार्य किया जाता है। जीवन भर इतना बड़ा काम करने के बाद भी उन्हे घमंड रत्ती भर भी नहीं छू पाया। जब उनका पैर कटा तो स्थानीय सरकार के संस्कृति विभाग ने इलाज के लिए उनकी आर्थिक सहायता की। जयदेव बघेल जी जैसी हस्ती से मिलकर अच्छा लगा। वे मुझे छोड़ने गेट तक आते हैं और मेरा कारवां आगे बढ जाता है।---------- आगे पढें

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