पर्यटन का सिरमौर बनने अग्रसर छत्तीसगढ़

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी शनिवार, 5 जुलाई 2014 1 टिप्पणियाँ

त्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के डेढ दशक बाद के बदलाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। राज्य ने लगभग सभी क्षेत्रों में विकास के नए आयामों को छुआ है। सड़क, बिजली-पानी, शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य आदि मूलभूत सेवाओं में वृद्धि हुई है। इसके साथ ही पर्यटन के विकास क्षेत्र में राज्य ने उल्लेखनीय कार्य किया है। केन्द्रीय पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य के पर्यटन ने भारत के शीर्ष-10 राज्यों में अपना स्थान बना लिया है। मंत्रालय से जारी आंकड़ों में बताया गया है कि सन् 2013 में  2 करोड़ 28 लाख पर्यटक छत्तीसगढ़ आए। यह आंकड़ा छत्तीसगढ़ की कुल आबादी के समतुल्य है। प्रदेश की पर्यटन नीतियों को इसका श्रेय जाता है। 
उत्खनन में प्राप्त मंदिर समूह मदकू द्वीप (जिला मुंगेली)
छत्तीसगढ़ राज्य पर्यटन की दृष्टि से भारत का सर्वोत्तम प्रदेश माना जा सकता है। यहाँ अभ्यारण्य, नदी-घाटी सभ्यताओं के अवशेष, पुरातात्विक महत्व के स्मारक, नदियाँ, जलप्रपात, झरने, पर्वत, जलाशय, वन्य प्राणि, आदि मानव के द्वारा निर्मित शैलाश्रय, धार्मिक स्थल, वानस्पति एवं जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत,  विभिन्न तरह के उत्सवों के संग बस्तर का 75 दिनों के विश्व प्रसिद्ध दशहरा के साथ प्रतिवर्ष एक पखवाड़े का राजिम कुंभ आयोजन दर्शनीय है।
नंदन वन रायपुर का शेर आपके इंतजार में
छत्तीसगढ़ प्रकृति की लाडली संतान है। जिस तरह एक माता अपनी संतानों में से किसी एक संतान से विशेष अनुराग एवं स्नेह रखती है, उसी तरह प्रकृति भी छत्तीसगढ़ की धरती से अपना विशेष अनुराग प्रकट करती है। इस पूण्य भूमि में दक्षिण कोसल के राजा भानुमंत की पुत्री मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की माता कौसल्या ने जन्म लिया था। प्रकृति की गोद में बसे भगवान राम के ननिहाल (दक्षिण कोसल) छत्तीसगढ़ में एक ओर निर्मल जल की धार लिए प्रवाहित शास्त्रों में वर्णित चित्रोत्पला गंगा (महानदी) शिवनाथ, इंद्रावती, हसदेव, अरपा, पैरी, सोंढूर, मनियारी, महान, हाफ़, लीलागर, डंकिनी-शंखिनी आदि नदियाँ हैं तो दूसरी तरफ़ तीरथगढ़, चित्रकोट जैसे जलप्रपात के साथ बड़े-छोटे झरने शस्य श्यामल धरा को मनोहर रुप प्रदान करते हैं।
नदी देवी पातालेश्वर मंदिर मल्हार (जिला बिलासपुर)
छत्तीसगढ़ में धार्मिक पर्यटन के साथ एडवेंचर पर्यटन के लिए भी बहुत सारे स्थान हैं। वैष्णव क्षेत्र के रुप में हमारे यहां पद्मावती नगरी राजिम, शिवरीनारायण, इत्यादि महत्वपूर्ण स्थान है, शक्ति स्थलों में दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा, महामाया रतनपुर, बम्लेश्वरी डोंगरगढ़, खल्लारी माई खल्लारी (महासमुद) महामाया अम्बिकापुर एवं अन्य स्थल हैं। शैव धार्मिक स्थलों के रुप में राजिम पंचकोशी, कुलेश्वर, पटेश्वर, चम्पेश्वर, बम्हनेश्वर, कर्पुरेश्वर, फ़णीकेश्वर, विशाल प्राकृतिक शिवलिंग भूतेश्वरनाथ (गरियाबंद) बूढामहादेव रतनपुर, देवगढ़ सरगुजा इत्यादि हैं। रामायणकालीन दक्षिणापथ मार्ग से गुजरते हुए वर्तमान में भी हमें कदम-कदम पर धार्मिक दर्शनीय स्थल मिलते हैं।
अचानकमार अभ्यारण्य का बायसन
छत्तीसगढ़ राज्य का लगभग 44 फ़ीसदी भू-भाग वनों से अच्छादित है। यहाँ विभिन्न तरह की वन सम्पदा के साथ जैविक विविधता भी दिखाई देती है। यहाँ सबसे अधिक वन संपदा एवं वन्यप्राणि है। वन्य प्राणियों एवं वनों की रक्षा करने के लिए यहाँ इंद्रावती, कांगेर, गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान हैं। साथ ही अचानकमार, बादलखोल, बारनवापारा, सेमरसोत, सीतानदी, तमोर पिंगला ,भैरमगढ़, भोरमदेव, गोमर्डा, पामेड़, उदन्ती अभयारण्य हैं। इंदिरा उद्यान, कानन पेंडारी चिड़ियाघर, मैत्री बाग चिड़ियाघर, नंदन वन चिड़ियाघर रायपुर एवं कोटमी सोनार मगरमच्छ पार्क भी है जो पर्यटकों की आंखों के रास्ते हृदय को प्रफ़ुल्लित करती है। वन प्रेमी एवं वन्य फ़ोटोग्राफ़ी करने वाले पर्यटकों के लिए छत्तीसगढ़ के वन किसी स्वर्ग से कम नहीं हैं।
आम के वृक्ष में कठफ़ोड़वा (अभनपुर-रायपुर जिला)
इन राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभ्यारण्यों में साल, सागौन, बेंत, धावड़ा, हल्दु, तेन्दु, कुल्लू , कुसुम, आंवला, कर्रा, जामुन, सेन्हा, आम, बहेडा, बांस आदि के वृक्ष पाए जाते हैं, इसके अतिरिक्त सफेद मूसली , काली मूसली , तेजराज, सतावर, रामदतौन, जंगली प्याज, जंगली हल्दी, तिखुर, सर्पगंधा आदी औषधीय पौधे भी पाए जाते हैं। वन्य प्राणियों में शेर, तेन्दुआ, बाघ, चीतल, सांभर, लकडबग्घा, जंगली भालू, काकड, सियार, घड़ियाल, जंगली सुअर, लंगूर, सेही, माऊस डीयर, छिंद, चिरकमाल,, खरगोश, सिवेट, सियार, लोमड़ी, नील गाय, उदबिलाव, गौर, जंगली भैंसा, विभिन्न तरह के सर्प एवं मुर्गे, मोर, धनेश, महोख, ट्रीपाई, बाज, चील, डीयर, हुदहुद, किंगफिशर, बसंतगौरी, नाइटजार, उल्लू, तोता, बीइटर , बगुला, मैना, आदि पक्षी दिखाई देते है।
बस्तर की सांस्कृतिक झलक - बस्तर बैंड
प्राचीन स्थलों का भ्रमण करने वाले पर्यटकों के लिए बस्तर से लेकर सरगुजा तक शिल्प सौंदर्य का खजाना बिखरा हुआ है। बस्तर में बारसुर, नारायणपाल, दंतेवाड़ा, तुलार, गुप्तेश्वर, ढंढोरेपाल, भोंगापाल, मध्य छत्तीसगढ़ में आरंग, रतनपुर , मदकू द्वीप, भोरमदेव, मड़वा महल, पचराही, चतुरभूजी धमधा, मल्हार, नकटा मंदिर जांजगीर, शिवरीनारायण,  ताला,  सिरपुर, खल्लारी, जांजगीर, नगपुरा, खरखरा, देवबलौदा, सिंघोड़ा, बालौद, तुरतुरिया, पलारी, गिरौदपुरी, दामाखेड़ा, सिहावा, चंदखुरी, दमऊधारा, पाली, लाफ़ागढ़, चैतुरगढ़ तथा सरगुजा में सीता बेंगरा रामगढ़ (प्राचीन नाट्यशाला), सीतामढी, हरचौका, देवगढ़, हर्रा टोला बेलसर, सतमहला, डीपाडीह, आदि प्राचीन स्थल दर्शनीय हैं। 
एशिया का नियाग्रा चित्रकोट जलप्रपात अपने यौवन पर - बस्तर जिला
प्रागैतिहासिक काल के मानव सभ्यता के उषाकाल में छत्तीसगढ़ भी आदिमानवों के संचरण तथा निवास का स्थान रहा। इसके प्रमाण प्रमुख रूप से रायगढ़ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बसनाझर, बोसलदा, ओंगना पहाड़ और राजनांदगांव जिले के चितवाडोंगरी से प्राप्त होते हैं। आदिमानवों द्वारा निर्मित तथा प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के पाषाण उपकरण, महानदी, मांड, कन्हार, मनियारी तथा केलो नदी के तटवर्ती भाग से प्राप्त होते हैं। सिंघनपुर तथा कबरा पहाड़ के शैलचित्र विविधता तथा शैली के कारण प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्रों में विशेष रूप से चर्चित हैं। प्रागैतिहासिक काल के अन्य अवशेषों के एकाश्म शवाधान के बहुसंख्यक अवशेष रायपुर और दुर्ग जिले में मिलते हैं।
प्राचीन नगरी सिरपुर का महास्मारक - सुरंग टीला (जिला महासमुंद)
प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विविधता का सम्पूर्ण सौंदर्य छत्तीसगढ़ में देखने मिलता है। अंचल में पर्यटकों का निरंतर आना ही  देश के घरेलू पर्यटकों के पसंदीदा राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ को भारत में 10 वें नम्बर पर स्थापित करता है। केरल, हिमाचल, गोवा, उत्तराखंड जैसे पर्यटन के लिए स्थापित राज्यों को पछाड़ते हुए कम अवधि में शीर्ष-10 में अपना स्थान बना लेना महत्वपूर्ण है। इसका श्रेय प्रदेश के मुखिया डॉ रमन सिंह, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर, पर्यटन सचिव आर सी सिन्हा को जाता है। पर्यटन मंडल के महाप्रबंधक श्री संतोष मिश्रा का कार्य नि:संदेह प्रसंशनीय है, उन्होने लगन के साथ पर्यटन के विकास के सुविधाएं विकसित करने का कार्य किया। नवीन राज्य छतीसगढ़ के लिए यह गौरव की बात है कि पर्यटन के क्षेत्र में भी हम उल्लेखनीय प्रगति कर रहे हैं। आईए छत्तीसगढ़ दर्शन के लिए चलें और जाने छत्तीसगढ़ प्रकृति की लाडली संतान क्यों कहलाता है।

हरेली तिहार: टोनही संस्कृति एवं मिथक

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी सोमवार, 30 जून 2014 2 टिप्पणियाँ

धरती हरियाली से मस्त
सावन का महीना प्रारंभ होते ही चारों तरफ़ हरियाली छा जाती है। नदी-नाले प्रवाहमान हो जाते हैं तो मेंढकों के टर्राने के लिए डबरा-खोचका भर जाते हैं। जहाँ तक नजर जाए वहाँ तक हरियाली रहती है। आँखों को सुकून मिलता है तो मन-तन भी हरिया जाता है। यही समय होता है श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में अमावश्या को "हरेली तिहार" मनाने का। नाम से ही प्रतीत होता है कि इस त्यौहार को मनाने का तात्पर्य भीषण गर्मी से उपजी तपन के बाद वर्षा होने से हरियाई हुई धरती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना ही होता है, तभी इसे हरेली नाम दिया गया। मूलत: हरेली कृषकों का त्यौहार है, यही समय धान की बियासी का भी होता है। किसान अपने हल बैलो के साथ भरपूर श्रम कृषि कार्य के लिए करते हैं, तब कहीं जाकर वर्षारानी की मेहरबानी से जीवनोपार्जन के लिए अनाज प्राप्त होता है। उत्सवधर्मी मानव आदि काल से ही हर्षित होने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता और खुशी प्रकट करने, रोजमर्रा से इतर पकवान खाने की योजना बना ही लेता है, यह अवसर हमारे त्यौहार प्रदान करते हैं।

चारागन में गायें
हरेली के दिन बिहान होते ही पहटिया (चरवाहा) गाय-बैल को कोठा से निकाल कर चारागन (गौठान) में पहुंचा देता है। गाय-बैल के मालिक अपने मवेशियों के लिए गेंहु के आटे को गुंथ कर लोंदी बनाते हैं। अंडा (अरंड) या खम्हार के पत्ते में खड़े नमक की पोटली के साथ थोड़ा सा चावल-दाल लेकर चारागन में आते हैं। जहाँ आटे की लोंदी एवं नमक की पोटली को गाय-बैल को खिलाते हैं तथा चावल-दाल का "सीधा" पहटिया (चरवाहा) को देते हैं। इसके बदले में राउत (चरवाहा) दसमूल कंद एवं बन गोंदली (जंगली प्याज) देता है। जिसे किसान अपने-अपने घर में ले जाकर सभी परिजनों को त्यौहार के प्रसाद के रुप में बांट कर खाते हैं। इसके बाद राऊत और बैगा नीम की डाली सभी के घर के दरवाजे पर टांगते हैं, भेलवा की पत्तियाँ भी भरपूर फ़सल होने की प्रार्थना स्वरुप लगाई जाती हैं। जिसके बदले में जिससे जो बन पड़ता है, दान-दक्षिणा करता है। इस तरह हरेली तिहार के दिन ग्रामीण अंचल में दिन की शुरुवात होती है।     

बन गोंदली - द्शमूल कांदा - फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
ग्रामीण अंचल में बैगाओं को जड़ी-बूटियों की पहचान होती है। परम्परा से पीढी-दर-पीढी मौसम के अनुसार पथ्य-कुपथ्य की जानकारी प्राप्त होते रहती है। कौन सी ॠतु में क्या खाया जाए और क्या न खाया जाए। कौन सी जड़ी-बूटी, कंद मूल बरसात से मौसम में खाई जाए जिससे पशुओं एवं मनुष्यों का बचाव वर्षा जनित बीमारियों से हो। सर्व उपलब्ध नीम जैसा गुणकारी विषाणु रोधी कोई दूसरा प्रतिजैविक नही है। इसका उपयोग सहस्त्राब्दियों से उपचार में होता है। वर्षा काल में नीम का उपयोग वर्षा जनित रोगों से बचाता है। दसमूल (शतावर) एवं  बन गोंदली (जंगली प्याज) का सेवन मनुष्यों को वर्ष भर बीमारियों से लड़ने की शक्ति देता है। साथ ही अंडापान (अरंड पत्ता) एवं खम्हार पान (खम्हार पत्ता) पशुओं का भी रोगों से वर्ष भर बचाव करता है। उनमें विषाणुओं से लड़ने की शक्ति बढाता है। पहली बरसात में जब चरोटा के पौधे धरती से बाहर आते हैं तब उसकी कोमल पत्तियों की भाजी का सेवन किया जाता है।  

गेड़ी का आनंद - फ़ोटो रुपेश यादव
हम बचपन से ही गाँव में रहे। हरेली तिहार की प्रतीक्षा बेसब्री से करते थे क्योंकि इस दिन चीला खाने के साथ "गेड़ी" चढने का भी भरपूर मजा लेते थे। जो ऊंची गेड़ी में चढता में उसे हम अच्छा मानते थे। हमारे लिए गेड़ी बुधराम कका तैयार करते थे। ध्यान यह रखा जाता था कि कहीं अधिक ऊंची न हो और गिरने के बाद चोट न लगे। गेड़ी के बांस के पायदान की धार से पैर का तलुवा कटने का भी डर रहता था। तब से ध्यान से ही गेड़ी चढते थे। गेड़ी पर चढकर अपना बैलेंस बनाए रखते हुए चलना भी किसी सर्कस के करतब से कम नहीं है। इसके लिए अपने को साधना पड़ता है, तभी कहीं जाकर गेड़ी चलाने का आनंद मिलता है। अबरा-डबरा को तो ऐसे ही कूदते-फ़ांदते पार कर लेते थे। बदलते समय के साथ अब गांव में भी गेड़ी का चलन कम हो गया। परन्तु पूजा के नेग के लिए गेड़ी अभी भी बनाई जाती है। छोटे बच्चे मैदान में गेड़ी चलाते हुए दिख जाते हैं।

फ़ुरसत में किसान
इस दिन किसान अपने हल, बैल और किसानी के औजारों को धो मांज कर एक जगह इकट्ठा करते हैं। फ़िर होम-धूप देकर पूजा करके चावल का चीला चढा कर जोड़ा नारियल फ़ोड़ा जाता है जिसे प्रसाद के रुप में सबको बांटा जाता है। नारियल की खुरहेरी (गिरी) की बच्चे लोग बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। टमाचर, लहसून, धनिया की चटनी के साथ गरम-गरम चीला रोटी के कहने ही क्या हैं, आनंद आ जाता है। पथ्य और कुपथ्य के हिसाब से हमारे पूर्वज त्यौहारों के लिए भोजन निर्धारित करते थे। सभी त्यौहारों में अलग-अलग तरह का खाना बनाने की परम्परा है। भोजनादि से निवृत होकर खेलकूद शुरु हो जाता है। इन ग्रामीण खेलों की प्रतीक्षा वर्ष भर होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि हरेली परम्परा में रचा बसा पूर्णत: किसानों का त्यौहार है।

दरवाजे पर नीम की डाली-फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
खेल कूद के लिए ग्रामीण मैदान में एकत्रित होते हैं और खेल कूद प्रारंभ होते हैं जिनमें नगद ईनाम की व्यवस्था ग्राम प्रमुखों द्वारा की जाती है। कबड्डी, गेड़ी दौड़, टिटंगी दौड़, आंख पर पट्टी बांध कर नारियल फ़ोड़ना इत्यादि खेल होते हैं। गाँव की बहू-बेटियां भी नए कपड़े पहन कर खेल देखने मैदान में आती हैं, तथा उनके भी खेल होते हैं, खेलों के साथ सभी का एक जगह मिलना होता है, लोग एक स्थान पर बैठकर सुख-दु:ख की भी बतिया लेते हैं। खेल-कूद की प्रथा ग्रामीण अंचल में अभी तक जारी है। खेती के कार्य के बाद मनोरंजन भी बहुत आवश्यक है। किसानों ने हरेली तिहार के रुप में परम्परा से चली आ रही अपनी सामुहिक मनोरंजन की प्रथा को वर्तमान में भी जीवित रखा है।

पहाटिया (चरवाहा)-फ़ोटो डॉ पंकज अवधिया
हरेली तिहार के दिन का समय तो देवताओं के पूजा पाठ और खेल कूद में व्यतीत हो जाता है फ़िर संध्या वेला के साथ गाँव में मौजूद आसुरी शक्तियां जागृत हो जाती हैं। अमावश की काली रात टोनहियों की सिद्धी के लिए तय मानी जाती है। यह सदियों से चली आ रही मान्यता है कि हरेली अमावश को टोनही अपना मंत्र सिद्ध करती हैं, सावन माह मंत्र सिद्ध करने के लिए आसूरी शक्तियों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। शहरों के आस-पास के गाँवों में अब टोनही का प्रभाव कम दिखाई देता है लेकिन ग्रामीण अंचल में अब भी टोनही का भय कायम है। हरियाली की रात को कोई भी घर से बाहर नहीं निकलता, यह रात सिर्फ़ बैगा और टोनहियों के लिए ही होती है। टोनही  को लेकर ग्रामीणों के मानस में कई तरह की मान्यताएं एवं किंवदंतियां स्थाई रुप से पैठ गयी हैं। विद्युतिकरण के बाद भूत-प्रेत और टोनही दिखाई देने की चर्चाएं कम ही सुनाई देती हैं। टोनही के अज्ञात भय से मुक्ति पाने में अभी भी समय लगेगा।    

प्राकृतिक सुषमा से भरपूर अद्भुत सौंदर्य एवं प्राचीन गढ़ों के प्रदेश छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने नैसर्गिक रुप से अनुपम शृंगार दिया है। शस्य श्यामला धरा के मनमोहक शृंगार के संग यहाँ के प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों एवं जैन विहारों में मानवकृत अनुपम मिथुन शिल्प सौंदर्य का दर्शन होता है। कलचुरियों, पाण्डूवंशियों एवं नागवंशियों ने अपने कार्यकाल में भव्य मंदिरों एवं विशाल बौद्ध विहारों का निर्माण कराया। इसके साथ ही अन्य शासकों द्वारा निर्मित मंदिर भी मिलते हैं। निर्माण कार्यों में शिल्पकारों ने अपनी कला कौशल का प्रभावी परिचय दिया है। उनके द्वारा उत्कीर्ण शिल्प आज भी दर्शकों का मन मोह लेता है।
आलिंगन - राजीव लोचन मंदिर (राजिम)
मिथुन शिल्प के लिए खजुराहो को अधिक प्रसिद्धि मिली, परन्तु छत्तीसगढ़ के मंदिरों का मिथुन शिल्प भी अनूठा और खजुराहो से कमतर नहीं है। आरंग के भांड देवल जैन मंदिर, सिरपुर के तीवरदेव बौद्ध विहार, कबीर धाम के भोरमदेव, बारसूर के चंद्रादित्य मंदिर, महेशपुर के निशान पखना, नारायणपुर  के महादेव मंदिर, छप्परी के मंड़वा महल, राजिम के राम मंदिर, फ़िंगेश्वर के फ़णीकेश्वर महादेव मंदिर में तथा आंशिक रुप से जांजगीर के नकटा मंदिर, शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर, पाली के शिवालय में शिल्पकारों ने शिल्पशास्त्रों एवं कामशास्त्रों के मानकों के आधार पर मिथुन-मैथुन प्रतिमाओं का निर्माण किया है। ये प्रतिमाएँ अपनी ओर सहज ही दर्शक का ध्यान आकृष्ट कराती है।
चुंबन तीवरदेव बौद्ध विहार ( सिरपुर)
कामसूत्र में उल्लेखित बाभ्रवीय आचार्यों के अनुसार आलिंगन, चुंबन, नखक्षत, दंतक्षत, संवेशन, सीत्कृत, पुरुषायित तथा मुख मैथुन इत्यादि अष्टमैथुन क्रियाएँ होती है। स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में "स्मरण, कीर्तन, केलिः, प्रेक्षणं, गुह्यभाषणम्, सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च ॥" अर्थात स्त्री का स्मरण, स्त्री सम्बन्धी बात चीत करना, स्त्रियों के साथ खॆलना, स्त्री को देखना,  स्त्री से गुप्त भाषण (बात) करना, स्त्री से मिलनें का संकल्प करना, स्त्री की जिज्ञासा करना, स्त्री के साथ रहने को अष्टमैथुन माना है। उपरोक्त विषयों को शिल्पकारों ने अपने शिल्प में स्थान दिया।
मिथुन शिवालय (पाली-बिलासपुर)
कामशास्त्र पर संस्कृत में 'अनंगरंग', 'कंदर्प चूड़ामणि', 'कुट्टिनीमत', 'नागर सर्वस्व', 'पंचसायक', 'रतिकेलि कुतूहल', 'रति मंजरी', 'रति रहस्य', 'रतिरत्न प्रदीपिका', 'स्मरदीपिका', 'श्रृंगारमंजरी' आदि कई ग्रंथ हैं। इसके अतिरिक्त 'कुचिमार मंत्र', 'कामकलावाद तंत्र', 'काम प्रकाश', 'काम प्रदीप', 'काम कला विधि', 'काम प्रबोध', 'कामरत्न', 'कामसार', 'काम कौतुक', 'काम मंजरी', 'मदन संजीवनी', 'मदनार्णव', 'मनोदय', 'रति मंजरी', 'रति सर्वस्व', 'रतिसार', 'वाजीकरण तंत्र' आदि संबंधित ग्रंथ हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ कामसूत्र के हिन्दी टीकाकार डॉ गंगा सहाय शर्मा कहते हैं कि "अत्यंत आश्चर्य होता है कि आज से दो हज़ार वर्ष से भी पहले विचारकों को स्त्री और पुरुषों के मनोविज्ञान का इतना सूक्ष्म ज्ञान था।" 
मिथुन - चंद्रादित्य मंदिर बारसूर
वात्सायान के कामसूत्र में वर्णित अष्ट मैथुन का सजीव चित्रण मंदिरों की भित्तियों पर जीवंत होता हुआ दिखाई देता है। वात्सायन ने कामसूत्र को शब्दों में रचा और शिल्पकारों ने इसका मंदिरों में चित्रिकरण करके स्त्री-पुरुष के मनोविज्ञान को जन-जन तक शिक्षा की दृष्टि से पहुंचाया। मैथुन मूर्तियों को बौद्ध, शैव, वैष्णवों, जैनों आदि सभी पंथों ने अपने मंदिरों में स्थान दिया। बारसूर के चंद्रादित्य मंदिर स्थित एक प्रतिमा में प्रसव को भी उत्कीर्ण किया गया है। पुराविद डॉ शिवाकांत बाजपेयी कहते हैं "नवीं शताब्दी से 13 वीं शताब्दी के मध्य सामंतवादी शक्तियों ने अपने मनोरंजनार्थ मैथुन प्रतिमाओं को मंदिर की भित्तियों में स्थान दिया।"  
मिथुन - भांडदेवल जैन मंदिर (आरंग)
मैथुन प्रतिमाओं के निर्माण के पीछे एक कारण यह भी बताया जाता है कि उस समय गृहस्थ धर्म से विमुख होकर अधिकतर युवा ब्रह्मचर्य और सन्यास की ओर अग्रसर हो रहे थे, उन्हें गृहस्थ धर्म समझाने के लिए इन प्रतिमाओं को मंदिरों में स्थान दिया गया। आचार्य रजनीश कहते हैं "यदि काम, मन से बाहर रहेगा तभी हृदय में राम (ईश्वर) का निवास होगा। जन मानस को यही शिक्षा देने के लिए मंदिरों के गर्भ गृह में भगवान की प्रतिमा स्थापित करने के साथ बाहरी भित्तियों पर मैथुन प्रतिमाओं की स्थापना की जाती थी। अर्थात ईश्वर से अगर मिलन करना हो तो काम से तृप्त हो उसे बाहर ही छोड़ कर आना होगा। तभी ईश्वर तत्व की प्राप्ति होगी।" 
मिथुन - फ़णिकेश्वर महादेव (फ़िंगेश्वर जिला गरियाबंद)
मैथुन प्रतिमा निर्माण के एक पक्ष को उद्धृत करते हुए उदयपुर के डॉ श्री कृष्ण जुगनु कहते हैं "मंदिरों में कार्य करने वाले शिल्पकार बरसों यौनाचरण से वंचित रहते थे, उन्होनें यौन कुंठाएँ शांत करने की दृष्टि से भी इन प्रतिमाओं का निर्माण कर मैथुनानंद प्राप्त किया होगा।" साथ ही मिथक है कि आकाशीय बिजली से मंदिर को सुरक्षा देने की दृष्टि से भी मंदिरों में मिथुन प्रतिमाओं का निर्माण किया गया, उस काल में मान्यता थी कि यदि मंदिरों में मिथुन प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी तो उन्हें आकाशीय बिजलियों से सुरक्षा मिलेगी। इसलिए कई मंदिर परिसरों में सिर्फ़ एक-दो मिथुन प्रतिमाएँ ही दिखाई देती हैं। 
मिथुन - शिवालय (पाली-बिलासपुर)
कामग्रंथों में वर्णित अष्ट मैथुन को मंदिरों की भित्तियों स्थान देने के साथ ही नारी नखशिख शृंगार को भी प्रमुखता से अभिव्यक्त किया गया। उस जमाने में समाज में इतना खुलापन नहीं था जो अष्ट मैथुन जैसे विषय पर सार्वजनिक चर्चा कर सकें। इसे मंदिरों में उत्कीर्ण करवाने पर लोगों ने अवश्य ही इसका लाभ उठाया। मैथुन जैसे गोपनीय कार्य को सावर्जनिक करने पर इसे कौतुहल की दृष्टि से देखा गया और लोग मंदिरों की ओर आकृष्ट हुए। वे पर्यटक जो खजुराहो में मिथुन सौंदर्य देखने जाते हैं उनके लिए छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिरों में दर्शनीय सामग्री भरी पड़ी है। पर्यटकों के लिए मिथुन-मैथुन सर्वकालिक कौतुहल का विषय था और रहेगा। इससे कोई बिरला ही अछूता हो सकता है।

डिस्क्लैमर :- कई पाठकों ने मंदिरों में मिथुन मूर्तियों के निर्माण का उद्देश्य जानना चाहा था, इस आलेख में पाठकों की मंदिरों में मिथुन मूर्तियों के निर्माण के उद्देश्यों के प्रति जिज्ञासा शांत कराने एवं छत्तीसगढ़ के मिथुन शिल्प की जानकारी देने का प्रयास किया गया है। 

कुरुद अंचल का मधुबन धाम

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी मंगलवार, 24 जून 2014 0 टिप्पणियाँ

त्तीसगढ़ अंचल में फ़सल कटाई और मिंजाई के उपरांत मेलों का दौर शुरु हो जाता है। साल भर की हाड़ तोड़ मेहनत के पश्चात किसान मेलों एवं उत्सवों के मनोरंजन द्वारा आने वाले फ़सली मौसम के लिए उर्जा संचित करता है। छत्तीसगढ़ में महानदी के तीर राजिम एवं शिवरीनारायण जैसे बड़े मेले भरते हैं तो इन मेलों के सम्पन्न होने पर अन्य स्थानों पर छोटे मेले भी भरते हैं, जहाँ ग्रामीण आवश्यकता की सामग्री बिसाने के साथ-साथ खाई-खजानी, देवता-धामी दर्शन, पर्व स्नान, कथा एवं प्रवचन श्रवण के साथ मेलों में सगा सबंधियों एवं इष्ट मित्रों से मुलाकात भी करते है तथा सामाजिक बैठकों के द्वारा सामाजिक समस्याओं का समाधान करने का प्रयास होता है। इस तरह मेला संस्कृति का संवाहक बन जाता है और पीढी दर पीढी सतत रहता है।
मधुबन धाम का गुगल मैप
कुछ स्थानों पर मेले स्वत: भरते हैं तो कुछ स्थानों पर ग्रामीणों के प्रयास से लघु रुप में प्रारंभ होकर विशालता ग्रहण कर लेते हैं। ऐसा ही एक स्थान छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले स्थित कुरुद तहसील अंतर्गत रांकाडीह ग्राम हैं। यहाँ 35 वर्षों से मधुबन धाम मेला फ़ाल्गुन शुक्ल पक्ष की तृतीया से एकादशी तक भरता है। मधुबन धाम रायपुर व्हाया नवापारा राजिम 61 किलोमीटर एवं रायपुर से व्हाया कुरुद मेघा होते हुए 69 किलोमीटर तथा ग्लोब पर  20040’4986” उत्तर एवं 81049’4262” पूर्व पर स्थित है।
मधुबन धाम का रास्ता और नाला
मधुबन लगभग 20 हेक्टेयर भूमि पर फ़ैला हुआ है। इस स्थान पर महुआ के वृक्षों की भरमार होने के कारण मधुक वन से मधुबन नाम रुढ हुआ होगा। यह स्थान महानदी एवं पैरी सोंढूर के संगम स्थल राजिम से पहले नदियों के मध्य में स्थित है। राजिम कुंभ स्थल से हम नयापारा से भेंड्री, बड़ी करेली होते हुए मधुबन धाम पहुंचे। यहाँ पर छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मेले के दौरान संतों के निवास के लिए संत निवास नामक विश्राम गृह बनाया हुआ है। आस पास के क्षेत्र में चूना से चिन्ह लगाए होने अर्थ निकला कि मेले की तैयारियाँ प्रारंभ हो गई हैं।
बोधन सिंह साहू खैरझिटी वाले
विश्राम गृह का अवलोकन करने के पश्चात मेरी मुलाकात खैरझिटी निवासी 82 वर्षीय बोधन सिंह साहू से होती है। राम-राम जोहार के पश्चात उन्हें कुर्सी देने पर वे कहते हैं - 35 वर्षों से मैं मधुबन क्षेत्र में कुर्सी तख्त इत्यादि पर नहीं बैठता। भूमि पर ही बैठता हूँ और नंगे पैर ही चलता हूँ। ईश्वरीय कृपा से आज तक मेरे पैर में एक कांटा भी नहीं गड़ा है।" वे ईंट की मुंडेर पर बैठ जाते हैं और हमारी चर्चा शुरु हो जाती है। मेला जिस जमीन पर भरता है वह जमीन रांकाडीह गाँव की है। मेरे पूछने पर वो कहते हैं कि इस गाँव में कोई भी डीही नहीं है। जिसके कारण इस गांव का नाम रांकाडीह पड़ा हो।
संत निवास मधुबन धाम
मेले के विषय में मेरे पूछने पर कहते हैं कि - " मेरा गांव खैरझिटी नाले के उस पार है। हमारे गांव में गृहस्थ संत चरणदास महंत रहते थे। वे तपस्वी एवं योगी थे। उनके मन आया कि मधुबन में मंदिर स्थापना होनी चाहिए, रांकाडीह के जमीदार से भूमि मांगने पर उसने इंकार कर दिया। इसके पश्चात वे घर लौट आए। एक दिन उनकी पत्नी ने चावल धो कर सुखाया था और गाय आकर खाने लगी। महंत ने गाय को नहीं भगाया और उसे चावल खाते हुए देखते रहे। यह दृश्य देखकर उनकी पत्नी आग बबूल होकर बोली - आगि लगे तोर भक्ति मा। तो महंत ने कहा कि - मोर भक्ति मा आगि झन लगा। मैं हं काली रात 12 बजे अपन धाम म चल दुहूँ। (मेरी भक्ति में आग मत लगा, मैं कल रात 12 बजे अपने धाम को चला जाऊंगा। अगले दिन रात 12 बजे बाद महंत ने बैठे हुए प्राणोत्सर्ग कर दिया। बात आई गई हो गई।
मधुबन धाम के मधुक वृक्ष
बोधन सिंह आगे कहते हैं कि - पहले यह घना जंगल था तथा जंगल इतना घना था कि पेड़ों के बीच से 2 बैल एक साथ नहीं निकल सकते थे। महंत के जाने के बाद यहां पर कुछ लोगों को बहुत बड़ा लाल मुंह का वानर दिखाई दिया। वह मनुष्यों जैसे दो पैरों पर खड़ा दिखाई देता था। देखने वालों ने पहले उसे रामलीला की पोशाकधारी कोई वानर समझा, लेकिन वह असली का वानर था। उसके बाद हम सब गांव वालों ने इस घटना पर चर्चा की। खैरझिटी गाँव में अयोध्या से बृजमोहन दास संत पधारे। उन्होने यहाँ यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की। हम सबने जाकर रांकाडीह के गौंटिया से यज्ञ में सहयोग करने का निवेदन किया तो उन्होने पूर्व की तरह नकार दिया। लेकिन हम सब ने जिद करके यहाँ यज्ञ करवाया जो 9 दिनों तक चला। तब से प्रति वर्ष यहाँ यज्ञ के साथ मेले का आयोजन हो रहा है।
मधुबन धाम के विभिन्न समाजों के मंदिर
रांकाडीह निवासी शत्रुघ्न साहू बताते हैं कि "इस मेले में 11 ग्रामों खैरझिटी, अरौद, गिरौद, कमरौद, सांकरा, भोथीडीह, रांकाडीह, चारभाटा, कुंडेल, मोतिनपुर, बेलौदी के निवासी हिस्स लेते हैं। मेला स्थल पर विभिन्न समाजों के संगठनों ने निजी मंदिर एवं धर्मशाला बनाई हैं। साहू समाज का कर्मा मंदिर, देशहा सेन समाज का गणेश मंदिर, निषाद समाज का राम जानकी मंदिर, आदिवासी गोंड़ समाज का दुर्गा मंदिर, निर्मलकर धोबी समाज का शिव मंदिर, झेरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कोसरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, लोहार समाज का विश्वकर्मा मंदिर,  कंड़रा समाज का रामदरबार मंदिर, मोची समाज का रैदास मंदिर, कबीर समाज का कबीर मंदिर, गायत्री परिवार का गायत्री मंदिर, कंवर समाज का रामजानकी मंदिर, मधुबन धाम समिति द्वारा संचालित उमा महेश्वर एवं हनुमान मंदिर, लक्ष्मीनारायण साहू बेलौदी द्वारा निर्मित रामजानकी मंदिर, स्व: मस्त राम साहू द्वारा निर्मित हनुमान मंदिर स्थापित हैं।"
सरोवर में विराजे हैं भगवान कृष्ण
मधुबन में मेला आयोजन के लिए मधुबन धाम समिति का निर्माण हुआ है, यही समिति विभिन्न उत्सवों का आयोजन करती है। फ़ाल्गुन मेला के साथ यहां पर चैत नवरात्रि एवं क्वांर नवरात्रि का नौ दिवसीय पर्व धूमधाम से मनाया जाता है तथा दीवाली के पश्चात प्रदेश स्तरीय सांस्कृति मातर उत्सव मनाया जाता है, जिसकी रौनक मेले जैसी ही होती है। चर्चा आगे बढने पर बोधन सिंह बताते हैं कि - मधुबन की मान्यता पांडव कालीन है, पाँच पांडव में से सहदेव राजा ग्राम कुंडेल में विराजते हैं और उनकी रानी सहदेई ग्राम बेलौदी में विराजित हैं, यहाँ से कुछ दूर पर महुआ के 7 पेड़ हैं , जिन्हें पचपेड़ी कहते हैं। इन पेड़ों को राजा रानी के विवाह अवसर पर आए हुए बजनिया (बाजा वाले) कहते हैं तथा मधुबन के सारे महुआ के वृक्षों को उनका बाराती माना जाता है।
हनुमान मंदिर एवं यज्ञ शाला
ऐसी मान्यता भी है कि भगवान राम लंका विजय के लिए इसी मार्ग से होकर गए थे। इस स्थान को राम वन गमन मार्ग में महत्वपूर्ण माना जाता है। मेला क्षेत्र के विकास के लिए वर्तमान पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर ने अपने पूर्व विधायक काल विशेष सहयोग किया है। तभी इस स्थान पर शासकीय राशि से संत निवास का निर्माण संभव हुआ। मधुबन के समीप ही नाले पर साप्ताहिक बाजार भरता है। सड़क के एक तरफ़ शाक भाजी और दूसरी मछली की दुकान सजती है। होटल वाले ने बताया कि मेला के दिनों में यहां पर मांस, मछरी, अंडा, मदिरा आदि का विक्रय एवं सेवन कठोरता के साथ वर्जित रहता है। यह नियम समस्त ग्रामवासियों ने बनाया है। यदि कोई इस स्थान पर इनका सेवन करता है तो उसे बजरंग बली के कोप का भाजन बनना पड़ता और विक्रय करने वाले को पुलिस पकड़ लेती है।
शत्रुघ्न साहू मधुबन धाम समिति पदाधिकारी
आस पास से सभी ग्राम साहू बाहुल्य हैं, गावों की कुल आबादी में 75% तेली जाति की हिस्सेदारी है। हम मंदिरों के चित्र लेते हैं, बाजार क्षेत्र में मेले में दुकान लगाने के लिए आबंटन होने से काफ़ी शोर गुल हो रहा था। हनुमान मंदिर एवं यज्ञ शाला के चित्र लेने के पश्चात हम तालाब में स्थित कालिया मर्दन करते हुए श्रीकृष्ण की प्रतिमा का चित्र लेते पहुंचते हैं, तभी वहाँ पर गायों का झुंड आ जाता है, इससे हमारी फ़ोटोग्राफ़ी में चार चाँद लग जाते हैं, कृष्ण प्रतिमा के पार्श्व में गायें चरती हुई दिखाई देती हैं। कृष्ण का गायों के साथ जन्म जन्म का संबंध है। इसलिए गायें भी अपनी भूमिका निभाने चली आती हैं। तालाब में पचरी बनाने का कार्य जारी है। मेले को देखते हुए तैयारियाँ युद्ध स्तर पर हो रही हैं। आगामी फ़ाल्गुन शुक्ल की तृतीया (3 मार्च) से एकादशी (11 मार्च) तक मेला सतत चलेगा। हम मधुबन की सैर करके वापस राजिम कुंभ होते हुए घर लौट आए। 

(डिस्क्लैमर - सभी चित्र एवं लेखन सामग्री लेखक की निजी संपत्ति हैं, इनका बिना अनुमति उपयोग करना कापीराईट के अधीन अपराध माना जाएगा।)

नागमाड़ा सरगुजा : रहस्यमय गुफ़ा

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी शुक्रवार, 20 जून 2014 0 टिप्पणियाँ

लखनपुर/ छत्तीसगढ़ राज्य का सरगुजा अंचल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ अपने गर्भ में ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व के अनेक रहस्य छुपाए हुए है। जो क्रमश: प्रकाश में आते दिखाई देते हैं। ऐसा ही एक स्थान है लखनपुर ब्लॉक के नागमाड़ा की गुफ़ा। लखनपुर से उत्तर पश्चिम दिशा में गुमगरा-भरतपुर मार्ग पर 15 किलोमीटर की दूरी पर सागौन, साल, शीशम, धौरा एवं अन्य प्रजातियों से आच्छादित गुमगरा वन क्षेत्र के सघन वन मध्य नागमाड़ा का प्राकृतिक अनुपम सौंदर्य दिखाई देता है।
nagmada

धरती में गुफ़ा की मानिंद एक बड़ी खोह है जिसके ईर्द-गिर्द वृक्षों की लताओं ने अपना मायाजाल रचा है। वृक्षों की जड़ें सर्पाकृति में होने के कारण अदभुत दृश्य उत्पन्न करती हैं। इस गुफ़ा का मुहाना लगभग 7-8 फ़ुट की गोलाई लिए हुए है। इस गुफ़ा में उतरने के लिए वृक्षों की जड़ों का सहारा लेना पड़ता है। वृक्षों की जड़ों से शीतल जल धारा बहती है। जन मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर आता है उसे इस निर्मल जल धारा का जल ग्रहण करना अनिवार्य है। अन्यथा अनिष्ट की आशंका रहती है। अनिष्ट की आशंका के कारण इस स्थान पर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यहाँ की जल धारा का जल ग्रहण करना ही पड़ता है। नागमाड़ा सदियों से आधुनिक मानवों की नजरो से ओझल होकर वनवासियों की धार्मिक आस्था का केन्द्र बना हुआ है। इस गुफ़ा में विभिन्न प्रजातियों के सर्प दिखाई देते हैं, जिनमें, अजगर, नाग (कोबरा) करैत, अहिराज, चिंगराज एवं अन्य जहरीले सर्प प्रमुख हैं। इस गुफ़ा में स्थिल बिलों से ये सर्प झांकते हुए दिखाई देते हैं। जीवन में सुख-शांति एवं समृद्दि की कामना लिए वनवासी यहाँ सर्पों की पूजा करते हैं। शिवरात्रि के विशेष पर्व में वनवासी मेले की शक्ल में यहाँ उपस्थित होकर आराधना करते हैं और नाग देवता को प्रसन्न करते हैं।
nag_mada
वनवासी कहते हैं कि धार्मिक त्यौहारों के अवसरों पर नागमाड़ा में मुहरी, चांग, एवं डफ़ला प्राचीन वाद्ययंत्र बजने की आवाजें सुनाई देती है, इन वाद्ययंत्रों का उपयोग उनके पूर्वज धार्मिक अनुष्ठानों के अवसरों पर किया करते थे। यह रहस्य है कि इन वाद्ययंत्रों को कौन बजाता है और उनकी आवाज कहाँ से आती है? वाद्ययंत्रों की ये आवाजें वनवासियों में कौतुहल जगा कर अज्ञात की ओर उन्हें खींचती हैं तथा इसी के फ़लस्वरुप यह गुफ़ा धार्मिक आस्था का केन्द्र बनी हुई है।मान्यता है कि इस गुफ़ा में सच्चा एवं शुद्ध प्रकृति का व्यक्ति ही प्रवेश कर सकता है वरना यहाँ निवास करने वाले देव कुपित हो जाते हैं।सदियों से जनमान्यता है इस गुफ़ा में रजस्वला स्त्री के प्रवेश नहीं करना चाहिए। रजस्वला स्त्री के गुफ़ा में प्रवेश करने पर यह जलप्लावित हो जाती है। माड़ा में जल का भराव हो जाता है और गुफ़ा शुद्ध होने पर जल स्वत: ही उतर जाता है। इसलिए वनवासी इस बात का ध्यान रखते हैं उनकी कोई भी परिजन स्त्री माहवारी के समय में नागमाड़ा क्षेत्र में प्रवेश न करे। इस तरह की रोक-टोक वन क्षेत्रों में अन्य दैवीय स्थानों पर सुनाई देती है।
nagamada_lakhanpur
नागमाड़ा की सतह के साथ ही एक लम्बी प्राकृतिक सुरंग है। वनवासी बताते हैं कि उनके पूर्वज एवं बैगा लोग लगभग 1 किलोमीटर लम्बी इस सुरंग के माध्यम से पैदल ही गुमगरा तक का सफ़र तय कर लेते थे। वर्तमान में इस सुरंग में कोई भी प्रवेश नहीं करता क्योंकि जहरीले सर्पों की अधिकता होने से उनके दंश का खतरा हमेशा बना रहता है। क्षेत्रिय जनों की माँग है कि इस महत्वपूर्ण स्थान का संरक्षण एवं संवर्धन होना चाहिए। वनक्षेत्र में और अधिक पौधा रोपण एवं बाड़ इत्यादि से घेरा करके इस प्राकृतिक दर्शनीय स्थल का सौंदर्यवर्धन किया जा सकता है।
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त्रिपुरारी पाण्डेय
(पत्रकार लखनपुर सरगुजा)

राजिम कुंभ में सैलानी

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी सोमवार, 24 फ़रवरी 2014 0 टिप्पणियाँ

चित्रोत्पला गंगा महानदी, सोंढूर और पैरी नदी के त्रिवेणी संगम पर माघ पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मेला भरता है तथा इस मेले का समापन शिवरात्रि को होता है। भारत में तीन नदियों के संगम स्थल को पवित्र माना जाता है, यहाँ लोकमान्यतानुसार धार्मिक कर्मकांड सम्पन्न कराए जाते हैं। राजिम त्रिवेणी संगम में मेले का आयोजन कब से हो रहा है इसकी कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती पर सन 2000 में इसका सरकारीकरण हो गया। फ़िर 2004 में भाजपा की सरकार सत्ता में आने के बाद इसे कुंभ का नाम दे दिया गया। जिससे स्वस्फ़ूर्त पारम्परिक आयोजन सरकारी आयोजन में बदल गया। इसके साथ ही माने हुए साधू संतों का आगमन प्रारंभ हो गया। धार्मिक कथा-प्रवचनों के आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी जन मनोरंजार्थ होने लगा। धीरे-धीरे राजिम मेला कुंभ में परिवर्तित हो गया।
राजिम कुंभ समिति सचिव गिरीश बिस्सा
कुंभ के आयोजन की तैयारियाँ एक माह पूर्व प्रारंभ हो जाती हैं, कुंभ में समन्वय स्थापित करने के लिए शासन के अधिकारियो के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों को मिलाकर एक आयोजन समिति का निर्माण किया जाता है। कुंभ का संचालन एवं आगतों की आवास, भोजन एवं सुरक्षा की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है। कुंभ में हजारों साधू-संत जुटते हैं जिनकी व्यवस्था करने के लिए समिति वालों को दिन रात एक करना पड़ता है साथ ही विशेष ध्यान रखा जाता है कि कहीं अव्यवस्था न फ़ैले। लोग मेला देखने जाते हैं और घूम फ़िर कर मनोरंजन करके चले आते हैं पर उन्हें पता नहीं रहता कि इस भव्य आयोजन के पार्श्व में दिन-रात मेहनत करने वाले कौन लोग हैं। राजिम कुंभ के सचिव के रुप में गिरीश बिस्सा 10 वर्षों से आयोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, सहयोग करने के लिए इनके साथ कर्मचारियों का बड़ा अमला है, जिससे कार्यों का निष्पादन होता है।
राजिम कुंभ में उदय भैया
बचपन में देखा था कि मेला प्रारंभ होने के एक सप्ताह पहले से ही बैल गाड़ियों का रेला प्रारंभ हो जाता है। लोग अपना खाना दाना लेकर हफ़्ते या पखवाड़े भर मेले में ठहरने की व्यवस्था करके आते थे। अब वे बैलगाड़ियां कहीं दिखाई नहीं देती, वर्तमान में आवागमन के आधुनिक साधन होने के कारण लोग सुबह मेले में आते और रात तक लौट जाते हैं। मैने मेले का पैदल ही भ्रमण किया। मेले में मनोरंजन से लेकर खाने-पीने की वस्तुओं की दुकानों के साथ खिलौने, दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं तथा महिलाओं द्वारा खरीदी जाने वाली श्रृंगार सामग्री का विशेष आकर्षण दिखाई दिया। नदी  की रेत में मुरम की अस्थाई सड़क बना कर तत्कालिक नगर बसाया गया है। 
संत नगर
लोमश ॠषि आश्रम में गत वर्ष नागा साधुओं एवं स्थानीय साधुओं के बीच मारपीट और हंगामें की खबर सामने आई थी। इस वर्ष नागाओं को लोमश ॠषि आश्रम में स्थान नहीं दिया गया। सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस की व्यवस्था की गई थी। लोमश ॠषि आश्रम से मेले का विशाल दृश्य दिखाई देता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर में दर्शनार्थियों की लाईन लगी हुई थी। मंदिर के समीप ही नागलोक की प्रदर्शनी लगाई गई है। इसके साथ ही इस तरह की अन्य पाँच प्रदर्शनियाँ भी लगी हैं, इनको जंगल सफ़ारी, स्वर्ग नर्क इत्यादि नाम दिए गए हैं। 
नाग लोक की झांकी
हम नागलोक की प्रदर्शनी देखने पहुंचे। प्रदर्शनी में लाईट एवं साऊंड के संयोजन से जीवंत प्रभाव उत्पन्न किया गया है, द्वार टिकिट लेने वालों की लाईन लगी हुई थी। प्रवेश द्वार पर चिखली दुर्ग निवासी प्रकाश वैष्णव से मुलाकात होती है, इस प्रदर्शनी के वे मालिक हैं। पूछने पर कहते हैं कि - इस वर्ष मेलें कम ही लोग आए, उम्मीद से कम कमाई हो रही है। प्रदर्शनी बनाने में 1 लाख रुपया लग जाता है, फ़िर कर्मचारियों एवं बिजली का खर्च अलग देना पड़ता है साथ ही ट्रांसपोर्टिंग का खर्च पहले से अधिक हो गया है। ऐसी स्थिति में अगर 3 लाख रुपए से कम आवक हुई तो खा-पीकर सब बराबर हो जाता है।" इस कुंभ में वे 10 वर्षों से लगातार झांकी लगा रहे हैं, पहले एक ही झांकी होने से अच्छी आमदनी हो जाती थी, लेकिन अब झांकियों की संख्या बढने से आमदनी में कमी हो गई।
नाग लोक में नाग कन्याओं का सुवा नृत्य 
झांकियों का विषय धार्मिक रखा जाता है। जिसमें देवी देवताओं की फ़ाईवर की मूर्तियाँ लगाई जाती हैं, जिसे बिजली की मोटरों द्वारा संचालित करके झांकियों में जीवंत प्रभाव उत्पन्न किया जाता है। इसके बाद हमने जंगल सफ़ारी नामक झांकी का अवलोकन किया। जिसमें जंगल के जानवरों को दिखाया गया है। कहानी में जंगल के जानवर बैठक करके सशरीर स्वर्ग जाना चाहते हैं तथा इसके लिए वे गणेश जी एवं महादेव से विनती करते हैं। इसके पश्चात अनुमति मिलने पर वे स्वर्ग पहुंच कर मेनका, रंभा, उर्वशी नामक अप्सराओं के संग नृत्य करते दिखाई देते हैं। ग्रामीणों के स्वस्थ मनोरंजन का यह उत्तम उपाय है तथा इसे देख कर बच्चे भी रोमांचित होते हैं।
मुफ़्त में तारामंडल दर्शन
कुलेश्वर मंदिर के समीप ही एक स्थान पर लम्बी लाईन लगी हुई थी, देखने पर पता चला कि संस्कृति विभाग की तरफ़ से यहाँ पर मुफ़्त तारामंडल दिखाया जा रहा है। बड़ी संख्या में महिलाएं सौंदर्य प्रसाधन के सामान खरीदती दिखाई दे रही थी। मुख्य मंडप की तरफ़ बढने पर चश्मे की दुकान लगाए सुनील वंशकार से मुलाकात होती है। ये जबलपुर से मेले में दुकानदारी करने आए हैं। पूछने पर बताया कि - इस वर्ष मेले में कम लोग आए हैं, आसाराम बापू का कार्यक्रम होता था तो मेले में उनके शिष्यों की अधिक भीड़ होने से अच्छी कमाई हो जाती थी। उनके जेल जाने की वजह से कार्यक्रम नहीं हो पाया।" आगे कहते हैं कि -" वो अपराधी है कि नहीं यह तो न्यायालय तय करेगा, परन्तु उनके समर्थकों के आगमन से हमारी तो अच्छी कमाई हो जाती थी।"
गोदना गोदवा ले न……
चश्मे वाले समीप ही गोदना की दुकान सजी हुई है, यहाँ भिन्न-भिन्न तरह के गोदने के डिजाईन दिखाई दे रहे थे। इस दुकान के मालिक कलीम हैं। पूछने पर पहले तो अपना नाम लल्लू बताते हैं फ़िर कहते हैं कि "मेरा नाम कलीम है। फ़ाफ़ामऊ से आया हूँ और राजिम कुंभ में सन 2000 से प्रतिवर्ष आ रहा हूँ।" आमदनी के विषय पर पूछने पर कहते हैं कि "अबकि बार आमदनी कुछ कम ही है, ले-देकर दैनिक खर्च निकल रहा है।" गोदना करना इनका पारम्परिक पेशा है, पहले इनके पिता जी करते थे 1991 से अब इन्होने अपना पुस्तैनी धंधा अपना लिया। ये वर्ष भर मेलों में घूम कर रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। जिससे बच्चों का लालन पालन हो सके। इनका सारा समय मेलों और यात्राओं में बीत जाता है। दो महीने बस घर में रहते हैं।
मुख्य मंच राजिम कुंभ
मेलों के विषय में पूछने पर ये बताते हैं कि " हमारी यात्रा जेठ के महीने में अभार माता छतरपुर मेले से प्रारंभ होती है, फ़िर मंडौर ललितपुर का मेला करते हैं। सावन में सोनभ्रद शिवद्वार का मेला 1 महीने चलता है, भादो में काशी धाम बनारस चले जाते हैं। कार्तिक में रायपुर बंजारीधाम,  अगहन में बाराबंकी का महादेवा मेला, पूष में गोरखनाथ का मेला गोरखपुर, मकर संक्राति के खिचरी तिहार के बाद छत्तीसगढ़ आ जाते हैं जिसमें राजिम कुंभ, शिवरीनारायण मेला के पश्चात चैत्र नवरात्र में कामाख्याधाम गाजीपुर चले जाते हैं, यह मेला नवरात्र में एक महीने चलता है फ़िर दो महीना आराम करते हैं और फ़िर यही कार्यक्रम शुरु हो जाता है।
खैनी बनाओ और खाओ
गोदना से रक्त जनित बीमारियाँ फ़ैलने के विषय में कहते हैं कि - मैं पूरा ध्यान रखता हूँ कि इसके द्वारा एच आई वी न फ़ैले। गोदना से पहले डेटाल लगाता हूँ, एक गोदना गोदने के बाद मशीन की सुईयां बदल देता हूँ तथा रीगल कम्पनी की सुइयों का ही प्रयोग करता हूँ, इस मशीन से गोदना करने पर खून नहीं निकलता है, स्याही सिर्फ़ त्वचा की पहली परत के नीचे तक ही जाती है। साथ ही गोदना करने के बाद हल्दी लगा दी जाती है। हल्दी सबसे बड़ी एन्टीबायोटिक है। यह हमारा खानदानी पेशा है, इसलिए सारी सावधानी बरती जाती है। इस बातचीत के मध्य एक लड़की गोदना गोदाने के लिए आ जाती है। वह अपने हाथ में सिर्फ़ अंग्रेजी के दो अक्षर "P k" लिखवाती है और पुरा नाम लिखवाने की बजाए संकेत से ही काम चलाती है।
उखरा वाली
राजिम के मेले में "उखरा" बेचने वाले प्रतिवर्ष आते हैं, मेले की यही खई-खजानी है। धान की लाई को गुड़ या गन्ना रस में सान कर उसे मीठा कर दिया जाता है, पहले तो आठ आने में बहुत सारी मिल जाती थी। लेकिन अब इसका छोटा पैकेट 10 रुपए और बड़ा पैकेट 20 रुपए में मिलता है। शकुंतला ने उखरा की दुकान लगा रखी है। कहती है कि - मंहगाई बहुत बढ गई है। इसलिए उखरा का भी दाम बढाना पड़ा। वरना मुद्द्ल भी निकालना कठिन है। उसके बच्चे दुकान के आस पास ही घूम रहे हैं। साथ ही एक ढिमरिन चना बेच रही है। कुल्फ़ी, आईसक्रीम, गन्ना रस, चाट पकौड़ी, मिठाई, खिलौनों इत्यादि की दुकाने सजी हुई है। सभी को मेले से आमदनी की प्रतीक्षा है।
खिलौनों की दुकान
पहले मेले में गिलट के आभुषणों की दुकाने खूब दिखाई देती थी। लेकिन अब दिखाई नहीं दी, लगता है अब इनका चलन कम हो गया है। इनका स्थान आर्टिफ़िसियल ज्वेलरी ने ले लिया है। लोहार के बनाए हुए खेती एवं घरेलू उपरकर्णों की दुकाने भी नदारत हो गई है। सिर्फ़ चौकी बेलना बेचता हुआ एक बढई दिखाई दिया। एक स्थान पर दारु पीकर झगड़ा करता हुआ रामकंद बेचने वाला दिखाई दिया। आस पास के दुकानदारों ने कहा कि इससे वे बहुत परेशान हैं। सुबह से शाम तक पिए रहता है और दुकानदारों से रार करते रहता है।
डोर पर जिन्दगी
अब हम संतों के मंडप की तरफ़ पहुंचे, यहाँ पर एक लड़की रस्सी पर चलकर संतुलन साधने वाला खेल दिखा रखी थी। नटों का यह परम्परागत पेशा है। तरह तरह के करतब दिखा कर जीविकोपार्जन करते हैं। हजारों साल से ये कौतुक दिखाने का पेशा चला आ रहा है। राजे रजवाड़ों के खत्म होने के बाद इन्हें मेले-ठेलों में प्रदर्शन करना पड़ता है, वरना इन नटों को राजाश्रय प्राप्त होता था और राजपरिवार के मनोरंजन के लिए सदैव उपलब्ध रहते थे। छोटी सी लड़की बांस को गले में लटकाए सिर पर कलश रखे रस्सी पर चलकर संतुलन साध रही थी, नीचे बिछे हुए तौलिए पर लोग इच्छानुसार पैसे डाल रहे है जिन्हें उसकी माँ सकेल रही थी।
व्यवस्थाओं में व्यस्थ प्रताप पारख
संतों के कुंभ स्नान करने के लिए नदी की रेत को हटा कर विशाल जल कुंड तैयार किया गया है। इसके प्रवेश द्वार पर मंत्री द्वय के फ़्लेक्स लगे हैं। कुछ स्नान कर रहे थे तो कुछ लोग किनारे बैठ कर खैनी घिस रहे थे। अखाड़ों के संतों महंतो को डोम बना कर दिए गए हैं, जिसके पास जितनी बड़ी फ़ौज है, उसके डोम उतने ही बड़े हैं। संस्कृति विभाग के कर्मचारी इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में लगे हुए दिखाई दिए। एक स्थान पर प्रताप पारख से मुलाकात होती हैं। संतों के अस्थाई नगर के बीच कुंभ में आने वाली विशिष्ट लोगों के लिए चायपानी की व्यवस्था की गई है। इसकी जिम्मेदारी शिवनंदन दूबे मुस्तैदी से निभा रहे हैं। मंच पर कार्यक्रम प्रस्तुति की जिम्मेदारी राकेश तिवारी, युगल तिवारी संभाल रहे हैं तथा सतपाल, समीर टल्लू, सुधीरे दुबे, प्रमोद पाण्डे कुंभ की व्यवस्था संभालने में सक्रीय हैं।
शंकराचार्य मंडप
लोमश ॠषि आश्रम के पास ही नागा साधुओं का डेरा लगा हुआ है, भभूत रमाए नंग धंड़ग साधू मेलार्थियों को आकर्षित करते हैं। धूने की अग्नि सिलगाए चिलम से धुंआ उड़ाते दिखाई देते हैं। मै जब इनके टोले में पहुंचा तो एक युवा नागा साधू ने करतब दिखाना शुरु किया। पहले अपने लिंग को एक डंडे पर लपेट लिया फ़िर उस डंडे पर दोनो तरफ़ एक एक साधू को खड़ा कर दिया, लोग दांतों तले अंगुली दबा कर इस कौतुक को देख रहे थे। फ़िर कहने लगा कि - इसे कहते हैं पावर, है कोई जो यह कर सके। इस तरह उसने कई करतब दिखाई और इसके बाद उदय मुझसे कई तरह के सवाल करता और रास्ते भर पैदल चलते हुए मैं उसकी शंकाओं का समाधान करते रहा। इसके पश्चात हम चाय की तलब पूरी करने टेंट में आ गए।
कुलेश्वर महादेव में दर्शनार्थी एवं पुलिस व्यवस्था
चाय पानी के पश्चात दिन ढलने लगा, मौसम भी कुछ नरम बना हुआ था, बदलियों से लग रहा था कि कभी भी बरस सकती हैं। अगर बरसात होती है तो इतने सारे लोगों को सिर छुपाने के लिए जगह तलाशनी पड़ेगी। मुख्य प्रवेश द्वार के समीप गीता प्रेस गोरखपुर वालों का स्टाल लगा है। साथ ही आर्युवेदिक दवाई वाले तथा ज्योतिष भी मेले का लाभ उठा रहे हैं। पुलिस की पैट्रोलिंग करती गाड़ियाँ एवं बैरिकेट के समीप कंट्रोम रुम से सुरक्षा पर नजर गड़ाए अधिकारी दिखाई देते हैं। इस बीच संतों की कलश यात्रा आती दिखाई देती हैं, मैं कैमरे से 2-4 चित्र लेता हूँ, एक परसुधारी संत मुझे फ़ोटो लेते हुए देखकर अपने मंडप में मिलने के लिए कहते हैं, शायद उन्हें फ़ोटुओं की जरुरत होगी। लेकिन मेरे पास इतना समय नहीं था कि उनसे मंडप में मिलने जाऊं।
कुछ माला मुंदरी हो जाए मेला कि निशानी
पूजा की सामग्री बेचने वालों की दुकाने सजी हैं, इसमें कुछ लोग इलाहाबाद, प्रयाग, मालवाचंल के खंडवा निमाड़ क्षेत्र, बनारस इत्यादि से आए हुए हैं। राजिम कुंभ विशेषता यह है कि जिस स्थान पर लगता है वहां तीन जिलों की सीमाएं मिलती हैं, एक तरफ़ लोमश ॠषि आश्रम धमतरी जिले में है तो दूसरी तरफ़ राजीव लोचन मंदिर गरियाबंद जिले में आता है और नयापारा नगर रायपुर जिले में। तीन जिलों के प्रशासन के संयुक्त प्रयास से ही राजिम कुंभ का सफ़ल आयोजन होता है। संस्कृतियों, धर्मों, पंथों एवं मेलानुरागियों का मिलन क्षेत्र अब राजिम कुंभ बन गया है। समन्वित सहयोग एवं प्रयास से ही यह भगीरथ कार्य सम्पन्न होता है।

(डिस्क्लैमर - सभी चित्र एवं लेखन सामग्री लेखक की निजी संपत्ति हैं, इनका बिना अनुमति उपयोग करना कापीराईट के अधीन अपराध माना जाएगा।)

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