बस्तर: शिल्पगुरु डॉ जयदेव बघेल

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी मंगलवार, 29 जनवरी 2013


जयदेव बघेल जी के घर (चित्र राहुल सिह जी के सौजन्य से)
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स्तर, भानपुरी से चल कर हम कोण्डागाँव पहुंचे, नाके के पास गाड़ी रोक कर एक पान वाले से जयदेव बघेल जी का घर पूछते हैं। तो वह कहता है कि सीधे हाथ की तरफ़ जो रास्ता जा रहा है उस पर चले जाईए। उनके नाम का बोर्ड लगा है। हम रास्ते पर आगे बढते हैं, गली में दोनो तरफ़ टेराकोटा के बने हुए शिल्प रखे हुए दिखते हैं। एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर अंगेजी में Dr. Jaydev Baghel लिखा दिखाई देता है, साथ उन्हे प्राप्त सम्मान भी लिखे हैं। सीमेंट की चार दीवारी पर टेराकोटा एवं पत्थर से बनी विभिन्न आकृतियाँ लगी दिखाई देती हैं। घर देखने से ही लगता है कि यह किसी शिल्पकार का घर है। गाड़ी की आवाज सुनकर नीले रंग के पेंट से पुता हुआ परम्परागत छत्तीसगढी नौबेड़िया दरवाजा खुलता है और एक नवयुवक बाहर आता है, मैं कहता हूँ, जय देव बघेल जी से मिलना है। वह बैठक का दरवाजा खोलता है और हमें बैठने को कहता है। बरसात के कारण आंगन में कीचड़ हो गया। मैं भीतर बैठक में पहुंचता हूँ तो सामने की दीवाल पर उन्हे प्राप्त सम्मान पत्र लगे हैं। इंदिरा जी से लेकर बड़े-बड़े नेताओं से सम्मान पाते उनके चित्र एवं 2003 में रविशंकर विश्वविद्यालय से डी लिट की मानद उपाधि प्राप्त करते हुए भी एक चित्र लगा है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
थोड़ी देर में भीतर से कुर्ता और धोती पहने एक वृद्ध आते हैं, उन्होने स्टीक का सहारा ले रखा है। पहचान जाता हूँ यही जयदेव बघेल जी हैं। राम राम जोहार के पश्चात स्नेह से मुझे अपने समीप बैठाते हैं और आने का कारण पूछते हैं। मैं कहता हूँ कि ईश्वर ने नए साल में आपसे मिलने लिखा था, इसलिए चला आया। अन्यथा सैकड़ों बार इस रास्ते से गुजरना हुआ, पहुंच नहीं पाया। सरल मृदू भाषी जयदेव जी को देख कर कोई नहीं कह सकता कि ये वही जयदेव बघेल हैं जिनके ढोकरा शिल्प का डंका पूरे विश्व में बजता है। वे मुझसे स्नेह के साथ चर्चा करते हैं। अपने पुत्र एवं नाती से परिचय करवाते हैं। पुत्र भी इनकी विरासत को आगे बढा रहा है। कुछ माह पहले साउथ अफ़्रीका में 3 माह तक शिल्प का प्रशिक्षण देकर आया है। सच में इनसे मिलना मुझे आल्हादित कर गया। उनका पुत्र सहयात्रियों को घड़वा शिल्प दिखाता है और मैं जयदेव जी के संस्मरण सुनने में व्यस्त हूँ। वे बताते जा रहे हैं और मैं सुनता जा रहा हूँ।  उनका सारा जीवन योगी की तरह शिल्प साधना को समर्पित है।

घर में लगे सम्मान पत्र
चर्चा करते हुए वे पुरानी यादों में खो जाते हैं, कहते हैं कि उनका परिवार अबुझमाड़िया है और हम घड़वा जाति के हैं। पिताजी अबुझमाड़ से आकर इस जगह पर बसे थे। इस जगह को भेलवांपदर पारा कहते हैं यह पारा मेरे पिताजी ने ही बसाया है। हम परम्परागत शिल्पकार हैं। मेरे पिताजी और माता जी ढोकरा शिल्प का कार्य करते थे। 1960 के सर्वे में मेरे पिताजी पूरे बस्तर जिले में वरिष्ठ शिल्पी थे। उसी समय बंगाल की प्रथम राज्यपाल पद्मजा नायडू ने पिताजी सम्मान किया और नेहरु जी को बताया कि घड़वा शिल्पी बस्तर में हैं। प्रख्यात मूर्ति शिल्पी मीरा मुखर्जी जर्मनी में शिल्प कला सीख रही थी। उसके बाद किसी के कहने से मेरे पिताजी के पास मूर्ति शिल्प सीखने आई। 1961 से 64 तक प्रत्येक वर्ष 2 महीना पिताजी के पास रहकर काम सीखती थी। फ़िर वह बड़ा काम करने लगी। 10-20 फ़िट की बड़ी मुर्तियाँ बनाने लगी। मोरारजी देसाई के समय 1977 में मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तो मै पुरस्कार पाने वालों में सबसे कम उम्र का था, मेरी उम्र 24 साल थी, उस समय 40 से लेकर 80-85 साल के लोगों को ही सभी राज्यों में से चयन करके राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाता था।

मुरिया मारिन (ढोकरा शिल्प)
मैं युरोप में बहुत घूमा हूँ सबसे पहले 1977 में मास्को के शिल्पमेला में भारत सरकार ने भेजा। उस समय लता मंगेश्कर ने वहाँ रशिया नाईट में गाया था, वे हमारे ग्रुप में ही गई थी। भारत से 4 लोगों को भेजा गया था। उनका संगीत का काम था इसलिए वे जल्दी आ गई और मैं 3 महीना मास्को में रहा। क्योंकि मुझे अपना काम दिखाना था। उसके बाद से मैं यूरोप में बहुत रहा। लंदन में 4 बार चार-चार महीने तक रहा। ग्लास्गो स्कूल ऑफ़ आर्टस में 3 बार चार-चार महीने तक वहाँ के विद्यार्थियों को काम सिखाया। स्विटजरलैंड में 3 माह रहा। जर्मनी की हेडनवर्ग युनिर्वसिटी में 3 माह रहा। आस्ट्रेलिया के सिडनी, मेलबोर्न, केनबरा में 2 साल तक 2-2 महीना तक, इटली, पेरिस, नीदरलैंड,सिंगापुर, थाईलैंड आदि स्थानों पर लम्बे समय तक रहा। इसके पश्चात लांसएजिल्स में 4 महीने रहा। उस समय वहाँ कबीर बेदी रहते थे। वे मेरी प्रदर्शनी में भी आए। सब चित्र मेरे पास याददास्त के तौर पर हैं। बैठक को पक्का बनाऊंगा तब सब दीवालों पर वे चित्र सजाऊंगा।

शेर (ढोकरा शिल्प)
जिस समय मैं लांसएंजिल्स में था उस समय ही रजनीश को अमेरिका से निकाला जा रहा था। वहां रजनीश ने रजनीशपुरम बसा रखा था और विनोद खन्ना वहीं मुझसे मिले थे। मेक्सिकों में 15 दिन रहा। सभी जगह काम के सिलसिले में ही गया। नीदरलैंड और इटली से आने के बाद डायबिटिज के कारण मेरा पैर कट गया। ये जयपुर वाला पैर लगाया हूँ। अब शुगर डाऊन हो जाती है। कभी 200 रहती है तो कभी 50-40 तक हो जाती है।जापान के ओसाका क्वेटो नारा में तीन बार दो-दो माह तक रहा। जापान की पुरानी राजधानी नारा है। वहाँ नदी के किनारे ढाई तीन हजार हिरण बैल-कुत्ते जैसे घुमते रहते थे। जो जापानी दोस्त हैं वो मेरे घर आकर ठहरते हैं। बहुत सारे विदेश मित्र आकर यहाँ काम सीखते हैं।

नंदी बैल (ढोकरा शिल्प)
टोकियों  के म्युजियम का नाम नेशनल शतग्या म्युजियम है। वहाँ म्युजियम में काम किया। मैं हर जगह ही म्यूजियम जाकर काम करता था। जब 1987 में स्विटजरलैंड के बाजल शहर के म्युजियम में गया तो वहां पर पिताजी के 35 काम रखे थे 87 के 50 साल पहले के। मैने जब उन्हे कहा कि यह मेरे पिताजी का काम है तो उन्हे विश्वास नहीं हुआ। वहाँ पर मेरे पिताजी की फ़ोटो भी लगी हुई है। जब मैने अपने पिताजी की एलबम रखी हुई फ़ोटो दिखाया तब उन्हे विश्वास हुआ। फ़िर वहाँ के बाजल टाईम्स में मेरे उपर जर्मनी भाषा में आर्टिकल लिखा गया। उसकी प्रति मेरे पास है। मेरे पिताजी द्वारा किया लगभग 75 साल पुराना काम बाजल के म्युजियम में रखा है। ब्रिटेन के एल्बर्ट म्युजियम में हमारे ढोकरा शिल्प का काम रखा हुआ है। उनका कहना है कि यह काम ढाई हजार साल पुराना है।

 काम करते हुए एक पु्राना चित्र
म्युजियम ऑफ़ मेन्स ने मेरा एक साढे चार फ़िट का काम 2500 पौंड में खरीदा। लेकिन वह रुपया मुझे इसलिए नहीं मिला कि मैं उस काम को 5000 में गर्वमेंट को बेच चुका था। वह रुपया गर्वमेंट के खाते में गया। मैं सरकार की ओर से गया था इसलिए उस पैसे पर मेरा हक भी नहीं बनता था। मैं इतनी जगह गया, कहीं भी गड़बड़ नहीं किया। अपने देश का नाम नहीं डुबाया, देश की बदनामी नहीं किया। देश का नाम ऊंचा ही करके आया। डांसिग फ़िगर सैकड़ों सालों से हमारे पूर्वज बनाते आ रहे हैं। मोहन जोदरो और हड़प्पा में भी ढोकरा शिल्प जैसा शिल्प ही मिला है। इससे जाहिर होता है कि ढोकरा शिल्प हमारी प्राचीन कला है। अखबारों में सिरपुर के विषय में पढता हूँ पता चला है कि वहाँ भी कुछ कांस्य शिल्प मिला है। मै एक बार वहाँ जाना चाहता हूँ। पैर कटने के कारण गाड़ी में ही जाना पड़ेगा।

पारम्परिक कारीगर
1982 में मैने एक आलेख ढोकरा शिल्प पर लिखा था। जिसका अंग्रेजी अनुवाद एक किताब में छपा है। टाटा पब्लिकेशन ने भी परम्पराग शिल्पकार नामक किताब में हम 4 शिल्पियों के विषय में प्रकाशन किया है। जिसमें सबसे पहले मेरे विषय में लिखा है फ़िर श्री काला हस्ती की कलम कारी के विषय में, बिहार की मधुबनी पेंटिंग के विषय में और एक लेख पॉटरी पर लिखा गया है। जिसका एक-एक लाख हम चारों को दिया था और बाकी पैसा हम लोगों ने चैरिटी में दे दिया। यह किताब 1500 रुपए की है। 1992 में माधवराव सिंधिया जी बुलवा कर यहीं शिल्पग्राम का उद्घाटन करवाया था। यहाँ सभी तरह के शिल्प लकड़ी, टेराकोटा, मैटल पत्थर, बुनकरी, पेंटिग, बांस शिल्प आदि 10 तरह के शिल्प कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था। फ़िर जितना भी शिल्प का कार्य था मैने उसे पूरे घर में लगा दिया। दूर से ही पता चल जाता है कि एक शिल्पकार का घर है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
जयदेव बघेल जी से चर्चा के दौरान चाय के लिए कहते हैं और मै मना करता हूँ। मुझे अभी बहुत दूर जाना था। खपरैल  की बैठक में कवेलु से पानी चूह रहा था। वे कहते हैं कि मेरे पिताजी की बनाई हुई निशानी है इसलिए तोड़कर बनाना  नहीं चाहता। घर तो इसके पीछे बना लिया पर इसे ज्यों का त्यों ही रख दिया। इस साल इसे भी पक्का कर दुंगा। उनकी कार्यशाला भी देखता हूँ जहाँ पर ढलाई का कार्य किया जाता है। जीवन भर इतना बड़ा काम करने के बाद भी उन्हे घमंड रत्ती भर भी नहीं छू पाया। जब उनका पैर कटा तो स्थानीय सरकार के संस्कृति विभाग ने इलाज के लिए उनकी आर्थिक सहायता की। जयदेव बघेल जी जैसी हस्ती से मिलकर अच्छा लगा। वे मुझे छोड़ने गेट तक आते हैं और मेरा कारवां आगे बढ जाता है।---------- आगे पढें

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