बस्तर का दशहरा पर्व

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी बुधवार, 24 अक्तूबर 2012 1 टिप्पणियाँ

बस्तरराज की कुलदेवी दंतेश्वरी माई 
त्तीसगढ़ में बस्तर का दशहरा पर्व प्रसिद्ध है। 75 दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार को आदिवासियों के साथ सारा बस्तर मनाता है। यहाँ दशहरे में रावण का पुतला फूंकने की परम्परा नहीं है। यह देवी दंतेश्वरी की आराधना का त्यौहार है। चलिए आपको बस्तर के दशहरा की सैर कराते हैं। दशहरा का प्रारंभ पाट जात्रा से होता है। पाटजात्रा का अर्थ है लकड़ी की पूजा। बस्तर के आदिवासी अंचल मे लकड़ी को अत्यंत पवित्र माना जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक लकड़ी मनुष्य के काम आती है इसलिए आदिवासी संस्कृति मे इसका विशिष्ट स्थान है। हरेली अमावश को लकड़ी के एक बड़े तने को महल के सिंह द्वार पर लाकर पूजा जाता है। इसे पाटजात्रा कहते हैं। 

पाटजात्रा के बाद रथ निर्माण 
इसके बाद डेरी गढ़ई होती है। भादो मास के शुक्ल पक्ष के द्वादशी को लकड़ी के एक स्तंभ को सीरसार अर्थात जगदलपुर के टाउन हाल में स्थापित किया जाता है। सीरसार चौक दशहरा मनाने का केन्द्र स्थल है। दशहरा उत्सव की वास्तविक शुरुवात में एक मिरगन पनिका कुल की एक कन्या पर देवी के रूप में पूजा की जाती है तथा उसे देवी के सिंहासन पर बैठाकर कर झुलाया जाता है. इसके पश्चात कलश स्थापना नवरात्रि के प्रथम दिन की जाती है। फिर जोगी बिठाई का कार्यक्रम सम्पन्न किया जाता है। इस परम्परा के अंतरगत सिरासर चौक में एक व्यक्ति के बैठने लायक गड्ढा खोद कर एक युवा जोगी (पुरोहित) को उसमें बैठाया जाता है जो नौ दिन नौ रात तक वहां पर बैठ कर इस समारोह की सफलता के लिए प्रार्थना करता है, उपरोक्त पूजा कार्यक्रम का प्रारम्भ मांगुर प्रजाति की मछली की बलि से किया जाता है।

जोगी बिठाई 
जोगी बिठाई के दूसरे दिन ही रथ परिक्रमा प्रारंभ होती है, पूर्व में 12 चक्के का एक रथ बनाया जाता था, लेकिन वर्त्तमान में दो रथ क्रमश: 4 एवं 8 चक्के के बनाये जाते है, फूलों से सजे 4 चक्के के रथ को "फूल रथ" कहा जाता है, जिसे दुसरे दिन से लेकर सातवें दिन तक हाथों से खींच कर चलाया जाता है,पूर्व में राजा फूलों की पगड़ी पहन कर इस रथ पर विराजमान होते थे ,वर्तमान में कुलदेवी दन्तेश्वरी का छत्र रथ पर विराजित होता है। निशा जात्रा के रात्रि कालीन उत्सव मे प्रकाश युक्त जुलूस इतवारी बाजार से पूजा मंडप तक निकला जाता है, नवरात्रि के नवमें दिन जोगी उठाई की रस्म निभाई जाती है। आठवें दिन मौली परघाव का कार्यक्रम होता है। महाष्टमी की रात्रि में मौली माता का दन्तेवाडा के दन्तेश्वरी मंदिर से दशहरा उत्सव हेतु विशिष्ट रूप से  आगमन होता है।

दशहरा पर मुख्यरथ भ्रमण 
चन्दन लेपित एवं पुष्प से सज्जित नवीन वस्त्र के रूप में देवी आकर जगदलपुर के महल द्वार में स्थित दन्तेश्वरी मंदिर में विराजित होती है नव रात्रि के नवमे दिन शाम को गड्ढे में बैठाये गए जोगी को परम्परागत पूजन विधि के साथ भेंट देकर धार्मिक उत्साह के साथ उठाया जाता है, विजयादशमी वाले दिन से ८ चक्के का रथ चलने को तैयार होता है, इस रथ पर पहले राजा विराजते थे अब माँ दन्तेश्वरी का छत्र विराजता है तथा यह रथ पूर्व में चले हुए फूल रथ के मार्ग पर ही चलता है, जब यह रथ सीरासार चौक पर पहुचता है तो इसे मुरिया जनजाति के व्यक्ति द्वारा चूरा कर 2 किलोमीटर दूर कुम्भदकोट नामक स्थान पर ले जाया जाता है, इस परम्परा को "भीतर रैनी" कहते हैं। 

जोगी उठाई 
समारोह के 12 वें दिन देवी कंचन की समारोह के सफलता पूर्वक सम्पन्न होने के उपलक्ष्य में कृतज्ञता ज्ञापित की जाती। इसे कंचन जात्रा कहते हैं। इसी दिन मुरिया दरबार सजता है। सीरसार चौक पर मुरिया समुदाय के मुखिया, जन प्रतिनिधि एवं प्रशासक एकत्रित होकर जन कल्याण के विषयों पर चर्चा करते हैं। समारोह के 13 वें दिन मौली माता को शहर के पश्चिमी छोर पर स्थित मौली शिविर में समारोहपूर्वक विदाई दी जाती है, इस अवसर पर अन्य ग्राम एवं स्थान देवताओं को भी परम्परागत रूप से बिदाई दी जाती है, इस प्रकार यह संपूर्ण समारोह सम्पन्न होता है। छत्तीसगढ़ अंचल परम्पराओं एंव संस्कृति सम्पन्न अंचल है। प्रकृति ने इसे अपनी नेमतों से नवाजा है। प्राकृतिक सुंदरता, पुरातात्विक धरोहरें, उपजाऊ भूमि, सांस्कृतिक परम्परा, साम्प्रदायिक सद्भावना, आपसी सामन्जस्य से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ प्रदेश संसार के किसी भी स्थान से कम नहीं है।

पंडवानी मोटल

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी सोमवार, 8 अक्तूबर 2012 3 टिप्पणियाँ

पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है। यहाँ की धरा किसी स्वर्ग से कम नहीं है। वनों से आच्छादित धरती पर रंग बिरंगी तितलियों के साथ शेर की दहाड़ एवं हाथियों की चिंघाड़ भी सुनने मिलती है। मन करता है कि कभी इस पावन भूमि को अपने कदमों से चलकर उसका एक-एक इंच भाग के दर्शन कर लूँ, यहाँ के नजारे अपनी आँखों में संजो लूँ। न जाने फ़िर कभी किसी जन्म में देखना संभव हो भी या नहीं। मेरे जैसे घुमक्कड़ को ऐसे ही स्थान पसंद आते हैं। मैं हमेशा प्रकृति के समीप ही रहना पसंद करता हूँ क्योंकि प्रकृति ही मुझे आगे चलने के लिए उर्जा प्रदान करती है। प्रकृति के नजारों का आनंद ही मेरी यायावरी का ईंधन है।

सुसज्जित शयन कक्ष
छत्तीसगढ नया राज्य है, इसका निर्माण हुए 11 वर्ष ही हुए हैं। इतने कम समय में सरकार के पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से बहुत कार्य किए हैं। इन कार्यों में प्रमुख हैं पर्यटन स्थलों के समीप प्राकृतिक वातावरण में मोटल एवं रिसोर्ट का निर्माण। पूर्व में छत्तीसगढ अंचल में पर्यटन करने पर ठहरने और खाने के लिए ग्रामीण होटलों का सहारा लेना पड़ता था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजों के बनाए विश्राम गृह तो है, पर वे मध्यप्रदेश के जमाने से लोकनिर्माण विभाग के अधीन हैं और पर्यटक जब रात को थका हारा विश्राम करने लिए यहाँ पहुंचता था तो पहले किसी अन्य नाम से यहाँ से कमरे बुक मिलते थे। भले ही कोई वहाँ रहने के लिए रात भर नही आए, परन्तु सरकारी आरक्षण तो आरक्षण होता है। ऐसी दशा से निपटने के लिए पर्यटकों को सुविधा देने की दृष्टि से पर्यटन स्थलों पर मोटलों एवं रिसोर्ट्स का निर्माण पर्यटन विभाग द्वारा किया गया। लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर मोटल या रिसोर्ट हैं। जहाँ ठहरने के साथ भोजन की उत्तम सुविधा भी उपलब्ध है। कुछ विश्राम गृह भी लोकनिर्माण विभाग ने पर्यटन मंडल को हस्तांतरित किए हैं।

सुव्यवस्थित रसोई घर
पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पर्यटन स्थलों पर 21 मोटलो का निर्माण किया है। जहाँ भोजन के साथ ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। ऐसा ही एक मोटल रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर ग्राम केन्द्री (अभनपुर) के समीप निर्मित हुआ है। इस मोटल का नाम छतीसगढ की प्रसिद्ध काव्य लोक गाथा पंडवानी पर रखा गया है। पंडवानी मोटल रायपुर से 22 किलोमीटर अभनपुर से 5 किलोमीटर और नवीन राजधानी से अधिकतम 5 किलोमीटर पर स्थित है। पंडवानी मोटल को केन्द्र में रख कर अगर हम समीपस्थ पर्यटन स्थलों पर गौर करें तो राजिम लोचन मंदिर 23 किलोमीटर, प्रसिद्ध तीर्थ बल्लभाचार्य की जन्म भूमि चम्पारण 23 किलोमीटर, छत्तीसगढ की सांस्कृतिक झलक पुरखौती मुक्तांगन 3 किलोमीटर, एयरपोर्ट 7 किलोमीटर, नवीन क्रिकेट स्टेडियम 10 किलोमीटर, प्रस्तावित टायगर सफ़ारी 3 किलोमीटर एवं नैरोगेज का रेल्वे स्टेशन केन्द्री में आधे किलोमीटर पर स्थित है।

रेस्टोरेंट से बाहर का नजारा
राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप होने से यहाँ से यात्रा के साधन बस, टैक्सियाँ हमेशा उपलब्ध हैं। रात को ही अगर कहीं अचानक जाना पड़े तो आवा-गमन के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। पंडवानी मोटल से 2 किलोमीटर पर छत्तीसगढ की महत्वाकांक्षीं सिंचाई परियोजना "महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना ग्राम झांकी" स्थित है। परियोजना स्थल की ऊँचाई समुद्र तल 324.25 मीटर है। इसका निर्माण 1978 में हुआ था। उस समय यह एशिया की पहली उद्वहन सिंचाई परियोजना थी। मोटल के समीप होने से इस स्थान का भ्रमण किया जा सकता है। महानदी यहाँ से 16 किलोमीटर पर प्रवाहित होती है। इसके तीर पर बसे पद्म क्षेत्र राजिम की मान्यता विश्व भर में है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष यहाँ पर राजिम कुंभ उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश-विदेश के पर्यटक आते हैं। माघ मास की पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक चलने वाले इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

विशाल आगंतुक कक्ष
पंडवानी मोटल में पर्यटकों सुविधाओं की दृष्टि से ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। साफ़-सुथरे एसी और नान एसी रुम हैं। रुम के अलावा एसी डोरमैट्री भी उपलब्ध है। जेब जितना खर्च करना चाहे उतने खर्चे में ही मोटल में ठहरने का लाभ उठाया जा सकता है। लगभग 5 एकड़ में बगीचा लगा हुआ है, जिसमें बच्चों के मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। एक कृत्रिम गुफ़ा के साथ ही स्वीमिंग पूल की व्यवस्था भी है। स्नान के लिए गर्म पानी और खाने के लिए साफ़ सुथरा शाकाहारी रेस्टोरेंट भी है, अन्य होटलों की तरह किचन में मुझे गंदगी नहीं दिखाई दी। साफ़ सुथरा रसोई घर होने से उत्तम भोजन मिलने की संभावना रहती है। पंडवानी मोटल में "बार" की सुविधा नहीं है और न ही यहाँ मांसाहारी भोजन मिलता है। रुम सर्विस के लिए पर्याप्त स्टॉफ़ की व्यवस्था है। घर से दूर शांत वातावरण में रह कर आस-पास के पर्यटन स्थलों की सैर करने की दृष्टि से यह स्थान उत्तम है। पर्यटन विभाग ने मोटल का संचालन निजी हाथों में दे रखा है, इसलिए पर्यटकों को अच्छी सेवा मिलने की उम्मीद की जा सकती है।  

महेशपुर: भग्न मंदिरों का वैभव दर्शन

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी बुधवार, 26 सितंबर 2012 4 टिप्पणियाँ

बड़े देऊर मंदिर, के पी वर्मा,ललित शर्मा, राहुल सिंह
रगुजा अंचल के महेशपुर जाने के लिए उदयपुर रेस्टहाउस से आगे जाकर दायीं तरफ़ कच्चा रास्ता है। यह रास्ता आगे चलकर एक डब्लु बी एम सड़क से जुड़ता है। थोड़ी दूर चलने पर जंगल प्रारंभ हो गया जहां सरई के वृक्ष गर्व से सीना तान कर खड़े हैं जैसे सरगुजा के वैभव का बखान कर रहे हों। सरगुजा है ही इस लायक रमणीय और मनोहारी, प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं पुरासम्पदा से भरपूर्। जिस पर हर किसी को गर्व हो सकता है। गर्मी के इस भीषण मौसम में भी सदाबहारी वृक्षों से हरियाली छाई हुई है। महुआ के वृक्षों के पत्ते लाल से अब हरे हो गए हैं। फ़ूल झरने के बाद अब फ़ल लगे हुए हैं, जिन्हे कोया, कोवा, टोरी कहते हैं। इनका तेल निकाला जाता है। तेल निकालने के बाद खल भी कई कार्यों में ली जाती है। पेड़ों पर परजीवी लताएं झूल रही हैं। जंगल का जीवन मनुष्य से लेकर वन्यप्राणियों एवं पेड़ पौधों से लेकर पशु पक्षियों तक एक दूसरे पर ही निर्भर है। कह सकते हैं कि सभी एक दूसरे पर ही आश्रित हैं। तभी जीवन गति से आगे बढ रहा है। वरना किसी की क्या बिसात है जो दो पल भी जीवन का सुख या दु:ख झेल ले। शाम होने को है, कच्ची सड़क के 5 किलोमीटर की एक पक्की सड़क आती है जो सीधे महेशपुर के पुरावशेषों तक ले जाती है। कुल मिलाकर उदयपुर से महेशपुर की दूरी 12 किलोमीटर है।

मंदिर की ताराकृति प्रस्तर जगती
महेशपुर रेण नदी के तट पर बसा है, यह क्षेत्र में 8 वीं सदी से लेकर 11 वीं सदी के मध्य कला एवं संस्कृति से अदभुत रुप से समृद्ध हुआ। इस काल के स्थापत्य कला के भग्नावेश महेशपुर में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। उपलब्ध पुरासम्पदा की दृष्टि से महेशपुर महत्वपूर्ण पुरातत्वीय स्थल है। यहाँ शैव, वैष्णव एवं जैन धर्म से संबंधित पुरावशेष मिलते हैं। रियासत कालीन प्रकाशित पुस्तकों में महेशपुर प्राचीन स्थल एवं शैव धर्म के आस्था स्थल के रुप में उल्लेखित है।अभी भी कई बड़े टीलों का उत्खनन होना है। जिससे इस स्थान  के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलेगी तथा इसका इतिहास प्रकाश में आएगा। सड़क मार्ग से जुड़ा यह पुरास्थल अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर है। इस रास्ते से ही भगवान राम का दण्डकारण्य में आगमन हुआ और उन्होन वनवास का महत्वपूर्ण समय यहाँ पर व्यतीत किया। दण्डकारण्य सरगुजा के लेकर भद्राचलम तक के भू-भाग को कहा जाता है। जनश्रुति के अनुसार जमदग्नि ॠषि की पत्नी रेणुका ही इस स्थान पर रेण नदी के रुप में प्रवाहित है। रेण नदी का उद्गम मतरिंगा पहाड़ है और यह अपने आंचल में प्रागैतिहासिक काल से लेकर इतिहास के पुरावशेषों को समेटे हुए है।

विध्वंस कथा:विशाल वृक्ष की जड़ में फ़ंसा मंदिर का आमलक
सबसे पहले हम बड़का देऊर कहे जाने वाले शिव मंदिर पहुंचे। सन 2008 में पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग छत्तीसगढ द्वारा पुराविद जी एल रायकवार के निर्देशन में यहाँ उत्खनन प्रारंभ हुआ। उत्खनन से विभिन मंदिरों की संरचनाओन के साथ दक्षिण कोसल की एतिहासिक शिल्पकला प्रकाश में आई। मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है। पत्थरों से बनी ऊंची जगती पर स्थापित यह मंदिर ताराकृति में बना हुआ है। पुराविद कहते हैं कि ताराकृति मंदिर की बनावट बहुत कम देखने मिलती है। शिल्पकारों के बनाए नाप जोख (मेसन मार्क) के निशान अभी भी पत्थरों पर निर्माण की मूक कहानी कहते हैं। जब हम मंदिर की जगती के चारों तरफ़ घूम कर देखते हैं तो दिखाई देता है कि मंदिर का सिंह द्वार पश्चिम की ओर है अर्थात मंदिर पश्चिमाभिमुख है। आस-पास मंदिरों के प्रस्तर भग्नावेश बिखरे पड़े हैं। मंदिर की पश्चिम दिशा में रेण नदी प्रवाहित होती है। मंदिर के प्रांगण में सैकड़ो वर्ष पुराने वृक्ष इन मंदिरों की तबाही की गाथा स्वयं कहते हैं। किसी कारण वश जब इनकी मंदिरों की देख-रेख नहीं हो रही होगी तब इन वृक्षों की जड़ों ने मंदिरों को तबाह किया। 

वामन और राजा बली
यहाँ से हम आगे चल कर दायीं तरफ़ स्थित टीले की ओर जाते हैं वहाँ सैकड़ो प्रस्तर मूर्तियाँ खुले में रखी हुई हैं। जिन्हे देख कर महेशपुर के वैभवशाली अतीत की एक झलक मिलती है। हमने मूर्तियों के चित्र लिए तथा बायीं तरफ़ स्थित मंदिरों की देखने गए। यहां भी सैकड़ों मुर्तियां एवं मंदिरों के विशाल आमलक पड़े हैं। एक आमलक तो वृक्ष की विशाल जड़ में फ़ंसा हुआ दिखाई दिया। मंदिरों की जगती एवं दीवारों को अपनी जड़ों से जकड़े विशाल वृक्ष खड़े हैं। कुछ टीलों का पुरातत्व विभाग ने उत्खनन कर मूर्तियों को बाहर निकाला है। अभी भी सैकड़ों टीले कई किलोमीटर में जंगल के भीतर फ़ैले हुए हैं जिनका उत्खनन करना बाकी है। इन मंदिरों को त्रिपुरी कलचुरी काल में निर्मित बताया गया है। त्रिपुरी कलचुरी राजाओं की राजधानी जबलपुर में स्थित थी। महेशपुर की विशालता से पता चलता है कि यहां तीर्थयात्री आते थे तथा यह स्थान दंडकारण्य में प्रवेश करने का द्वार रहा होगा। यहीं से होकर यात्री रतनपुर एवं रायपुर ओर बढते होगें।

आदिनाथ
इस स्थल के पास से आदिनाथ की प्रस्तर प्रतिमा प्राप्त हुई है। पुराविद कहते हैं कि आदिनाथ की यह प्रतिमा कहीं अन्य टीले से लाकर यहाँ रखी गयी होगी। इस स्थल पर रखी हुई मूर्तियों में विष्णु, वराह, वामन, सू्र्य, नरसिंह, उमा महेश्वर, नायिकाएं एवं कृष्ण लीला से संबंधित मूर्तियां प्रमुख हैं। इस स्थान से 10 वीं सदी ईसवीं का भग्न शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। उत्खनन से प्रागैतिहासिक काल के कठोर पाषाण से निर्मित धारदार एवं नुकीले उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। उत्खनन से महेशपुर की कला संपदा का कुछ अंश ही प्रकाश में आया है। महेशपुर की प्राचीनता का प्रमाण प्राचीन टीलों, आवसीय भू-भागों, तथा सरोवरों के रुप में वनांचल में 2 किलोमीटर तक फ़ैले हैं। महेशपुर की शिल्पकला को देखकर दृष्टिगोचर होता है कि वह समय शिल्पकला के उत्कर्ष दृष्टि से स्वर्णयुग रहा होगा। महेशपुर से उत्खनन में प्राप्त दुर्लभ शिल्प कलाकृतियाँ हमारी धरोहर हैं। इन्हे संरक्षित करना सिर्फ़ शासन का ही नहीं नागरिकों का कर्तव्य भी है। इस स्थान को देख कर मन रोमांचित होकर कल्पना में डूब गया कि आज से हजारों वर्ष पूर्व यह स्थल भारत के मानचित्र में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता होगा। जो आज खंडहरों में विभक्त हो धराशायी होकर मिट्टी के टीलों में दबा पड़ा है।

नृसिंह  
महेशपुर के विषय में शोध होना अभी बाकी है। यहां के मंदिरों एवं भवनों का निर्माण कराने वालों के नाम उल्लेख अभी प्रकाश में नहीं आया है। निर्माणकर्ताओं का नाम प्रकाश में आने के पश्चात छत्तीसगढ की गौरवमयी विरासत में एक कड़ी और जुड़ जाएगी। मंदिर के समीप ही उत्खनन में प्राप्त प्रतिमाओं एवं सामग्री को रखने के लिए संग्रहालय का निर्माण अपने अंतिम चरण में है। संग्रहालय की छत टीन की चद्दरों की है, चौकीदार ने बताया कि बिजली लगने पर संग्रहालय में प्रतिमाएं रख दी जाएगीं जिससे प्रतिमाओं का क्षरण एवं चोरियाँ न हो। मूर्ति तस्करों निगाह खुले में पड़ी मूर्तियों पर रहती है। जिसे चोरी करके वे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़ी कीमत में बेचते हैं। सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा है, आदिनाथ टीले के पार्श्व में बने एक मकान में फ़लदान (सगाई) का कार्यक्रम चल रहा है। सगे-संबंधी महुआ रस के साथ नए संबंधों के जुड़ने का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे हैं। खंडहर हुए महेशपुर में भी कभी ढोल नगाड़े बजते होगें तीर्थयात्रियों, पर्यटकों, पथिकों की चहल-पहल रहती होगी। दुकाने एवं बाजार सजते होगें। वर्तमान दशा को देखकर लगता है कि संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। चाहे बनाने वाले ने कितना ही मजबुत और विशाल निर्माण क्यों न किया हो? हम समय के साथ अपने आश्रय स्थल अम्बिकापुर पहुचने के लिए चल पड़ते है। ……… आगे पढें … दंतैल हाथी से मुड़भेड़

दंतेवाड़ा से कुटुमसर

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी गुरुवार, 23 अगस्त 2012 0 टिप्पणियाँ

प्रारंभ से पढें
दंतेवाड़ा की ओर
सुबह आँख खुली तो घड़ी 6 बजा रही थी और हम भी बजे हुए थे, कुछ थकान सी थी। सुबह की चाय मंगाई, चाय पीते वक्त टीवी गा रहा था "सजनवा बैरी हो गए हमार, करमवा बैरी हो गए हमार।" स्नान करने लिए गरम पानी का इंतजार करना पड़ा, जब से सोलर उर्जा से गरम पानी का यंत्र लगा है होटलों में, तब से सूर्य किरणों का इंतजार करना पड़ता है। खिड़की से देखने पर पता चला कि थोड़ी सी धूप खिली है। पानी हल्का कुनकुना ही हुआ था, उसी से स्नान कर लिया। 9 बजे तक सब तैयार हो चुके थे, अब हम दंतेवाड़ा की तरफ़ चल पड़े। नए ड्रायवर के हवाले गाड़ी थी। शारीरिक थकान को उसके ड्राईव करने की लालसा ने दबा रखा था। अगर वह कह दे कि थका हुआ है तो ड्राईव करने का मजा नहीं ले सकता था। मैं सामने सीट पर नेवीगेटर का कार्य कर रहा था और वह पायलेटिंग। तभी फ़ोन पर देवी दर्शन हुए, चलो यात्रा का शुभारंभ हुआ।  मुझे भूख लगने लगी , सुबह नाश्ता नहीं किया , मित्र परिवार ने दर्शन करके ही कुछ ग्रहण करने का मन बना चुके थे। मैने दो पीस केक से काम चलाया।

क्षतिग्रस्त थाना भवन
बास्तानार और गीदम के बीच में बास्तानार घाट पड़ता है, मुख्य मार्ग पर, घाट अच्छा है हरियाली से आच्छादित। कुछ दिनों पूर्व इसी घाट में नक्सलियों ने पुलिस पार्टी की गाड़ी को एम्बुश लगा कर उड़ाया था। उसी रास्ते से हम भी गुजरे। वहाँ पर एक मंदिर भी है। स्थानीय लोगों से चर्चा होने पर उन्होने बताया कि दादा लोगों की लड़ाई आम जन से नहीं है वे सरकारी लोगों को ही नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए आम आदमी कभी भी आ जा सकता है। लेकिन तब भी लोग डरे रहते हैं। डरना ही पड़ेगा भाई, जब दोनो हाथों में बंदुक हो तो मरना निहत्थे को पड़ता है। कब कौन चपेट में आ जाए क्या पता। पहले जब आया था तब इस रास्ते पर तीन जगहों पर पुलिस के बैरियर थे, चेकिंग के बाद ही जाने देते थे। अब कहीं पर कोई बैरियर नजर नहीं आया। गीदम पहुंचे तो वह नवनिर्मित थाना दिखाई दिया जिसे सिर्फ़ एक हफ़्ते पहले ही नक्सलियों ने उड़ाया था। यह थाना गीदम शहर की आबादी से लगा हुआ है। अब इनका प्रभाव जंगल से बाहर मुख्य मार्ग तक दिखाई देने लगा है।

स्वागत द्वार
गीदम पहुंचने लोकनिर्माण विभाग का बड़ा गेट दिखाई दिया। उस पर बताए गए मार्ग अनुसार गाडी सीधे ही बढा दी। दो चार किलो मीटर चलने पर वह रास्ता मुझे दंतेवाड़ा मार्ग जैसा नहीं लगा। एक माईल स्टोन बोंडापाल बता रहा था। अब समझ आया कि हमें गीदम से बाएं मुड़ना था और हम सीधे चले आए। वापस आकर सही रास्ता पकड़ा। 12 बजे दंतेवाड़ा पहुंचे। यहाँ की आबादी अधिक नहीं है लगभग 10,000 होगी, जिला होने के कारण सरकारी कर्मचारियों का डेरा है। पहले जब आया था तो यहां के सर्किट हाउस में ठहरा था। सरकार ने यहाँ काफ़ी निर्माण कार्य किए हैं। रहवासियों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। दंतेश्वरी माता मंदिर मार्ग का भी चौड़ी करण हो रहा है। अब सामने मुख्यद्वार दिखाई दिया। सलामत पहुंचने की खुशी थी। प्रसाद लिया और माई के दर्शन करने पहुंचे। बस्तर राज परिवार की कुल देवी दंतेश्वरी माता हैं। 

भैरव बाबा
मंदिर में प्रवेश करने पर सबसे पहले प्रस्तर स्तम्भ निर्मित भैरव बाबा का मंदिर है। मित्र ने कहा कि पहले देवी के दर्शन फ़िर भैरव दर्शन करना चाहिए। दंतेश्वरी मंदिर में फ़ूल पैंट और पैजामा पहनने की मनाही है। वहाँ धोतियों का इंतजाम है आप वहीं पैंट रख कर धोती पहन कर दर्शन कर सकते हैं। हमने भी धोती पहनी, तभी ख्याल आया कि राहुल भाई ने फ़ोन पर किन्ही शिला लेख का जिक्र किया था और उनकी फ़ोटो लाने कहा था। देवी दर्शनोपरांत मैने शिलालेख ढूंढे और उनकी फ़ोटो लेने का प्रयत्न किया। शिलालेख के पीछे से रोशनी आने के कारण चित्र सही नही आ रहे थे। उसकी लिखावट पढने में नहीं आ रही थी। फ़िर भी हमने प्रयास करके चित्र लिए और एक वीडियो भी बनाया। अंधेरे एवं प्रकाश के विपरीत संयोजन के कारण चित्र प्रभावकारी नहीं थे। मंदिर के दुसरे प्रवेश द्वार पर गणेश जी, काली माई, इत्यादि अन्य देवताओं की प्रस्तर मुर्तियाँ स्थापित हैं। तीसरे द्वार पर दो व्याघ्र व्याल बैठे हैं। वही पर गर्भ गृह में दंतेश्वरी देवी विराजित हैं। 

शिलालेख - दंतेश्वरी मंदिर
पौराणिक मान्यतानुसार जहाँ जहाँ सती के अंग गिरे थे वहां वहां शक्ति पीठों की स्थापना हुई है। शंखिनी एवं डंकनी नदी के किनारे सती के दांत गिरे, इसलिए यहां दंतेश्वरी पीठ की स्थापना हुई और माता के नाम पर गाँव का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। आंध्रप्रदेश के वारंगल राज्य के प्रतापी राजा अन्नमदेव ने यहां आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी और माँ भुनेश्वरी देवी की प्रतिस्थापना की। वारंगल में माँ भुनेश्वरी माँ पेदाम्मा के नाम सेविख्यात है। एक दंतकथा के मुताबिक वारंगल के राजा रूद्र प्रतापदेव जब मुगलों से पराजित होकर जंगल में भटक रहे थे तो कुल देवी ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि माघपूर्णिमा के मौके पर वे घोड़े में सवार होकर विजय यात्रा प्रारंभ करें और वे जहां तक जाएंगे वहां तक उनका राज्य होगा और स्वयं देवी उनके पीछे चलेगी, लेकिन राजा पीछे मुड़कर नहीं देखें। वरदान के अनुसार राजा ने यात्रा प्रारंभ की और शंखिनी-डंकिनी नदियों के संगम पर घुंघरुओं की आवाज रेत में दब गई तो राजा ने पीछे मुड़कर देखा और कुल देवी यहीं प्रस्थापित हो गई।

माँ दंतेश्वरी
माँ दंतेश्वरी की षट्भुजी वाले काले ग्रेनाइट की मूर्ति अद्वितीय है। छह भुजाओं में दाएं हाथ में शंख, खड्ग, त्रिशुल और बाएं हाथ में घंटी, पद्य और राक्षस के बाल मांई धारण किए हुए है। यह मूर्ति नक्काशीयुक्त है और ऊपरी भाग में नरसिंह अवतार का स्वरुप है। माई के सिर के ऊपर छत्र है, जो चांदी से निर्मित है। वस्त्र आभूषण से अलंकृत है। बाएं हाथ सर्प और दाएं हाथ गदा लिए द्वारपाल वरद मुद्रा में है। इक्कीस स्तम्भों से युक्त सिंह द्वार के पूर्व दिशा में दो सिंह विराजमान जो काले पत्थर के हैं। यहां भगवान गणेश, विष्णु, शिव आदि की प्रतिमाएं विभिन्न स्थानों में प्रस्थापित है। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने परवर्ती काल का गरुड़ स्तम्भ । 

गरुड़ स्तंभ
बत्तीस काष्ठ स्तम्भों और खपरैल की छत वाले महामण्डप मंदिर के प्रवेश के सिंह द्वार का यह मंदिर वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है।  माँ दंतेश्वरी मंदिर के पास ही उनकी छोटी बहन माँ भुनेश्वरी का मंदिर है। माँ भुनेश्वरी को मावली माता, माणिकेश्वरी देवी के नाम से भी जाना जाता है। माँ भुनेश्वरी देवी आंध्रप्रदेश में माँ पेदाम्मा के नाम से विख्यात है। छोटी माता भुवनेश्वरी देवी और मांई दंतेश्वरी की आरती एक साथ की जाती है और एक ही समय पर भोग लगाया जाता है। दंतेश्वरी माई में मनौती वाली पशु बलि भी दी जाती है। बकरे को पहले चांवल(अक्षत) चबवाया जाता है। अगर बकरे ने चांवल चबा लिए तो माना जाता है कि देवी या देवता ने बलि स्वीकार कर ली। हमारे सामने ही एक व्यक्ति दो बकरे लेकर मंदिर के भीतर आया और उसके नौकर ने बकरे पकड़ रखे थे।

बलि के बकरे
बकरे देख कर बलि देने के अवसर का हिसाब लगाने लगा। लेकिन ऐसा कोई समय या पर्व नहीं दिखा जिस दिन बलि दी जाए। दुर्गा नवमी या जवांरा पर्व में बलि देनी की प्रथा है।तब समझ आया कि आज 31 दिसम्बर है। देवी-देवताओं के नाम बकरे की बलि भी दी जाए और मौज मस्ती भी ली जाए। दोनो काम एक साथ, खुद भी खुश और भगवान भी खुश। बकरे वाले के पास ही बैठ कर एक वृद्ध प्राचीन वाद्य पूंगी बजा रहा था। उसकी ध्वनि मुझे शंख ध्वनि जैसी लग रही थी। मैने उसे और बजाने के लिए कहा। उसने कई बार बजाया। गर्भ गृह के पास ही एक युवा दुर्गा सप्तसति का पाठ कर रहा था। और रक्षा सूत्र का भंडार रखा था। मतलब रक्षा सूत्र बांधने का ठेका इसके पास है। सभी ने रक्षा सूत्र बंधवाए, रक्षासूत्रों ने औरंगजेब की सेना को नारनौल के हारे हुए युद्ध में विजय दिलाई थी। अब हमें चलना चाहिए था क्योंकि बादल दिख रहे थे और बरसात होने की संभावना थी। 

पद्म चिन्ह
मंदिर के गर्भ गृह के सामने पद्म बना हुआ दिखाई दिया। इस पद्मचिन्ह का उपयोग तंत्र में किया जाता है। यहाँ तंत्र सिद्धी के लिए भी उपासना होती थी। यह जानकारी पिछली यात्रा में बाबा सतबीर नाथ पटौदी वाले ने मुझे दी थी। अब दर्शनार्थी इस चिन्ह पर नारियल, अक्षत और जल चढाते हैं। मंदिर के समीप ही माई जी कि बगिया है। सुंदर बगीचा बना  हुआ है, लेकिन समयाभाव के कारण वहाँ गए नहीं। मंदिर में जल की व्यवस्था है, यहीं से हाथ पैर धोकर मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है। 2011 का अंतिम दिन होने के कारण दर्शनार्थियों की खासी संख्या थी। कुछ गुजरात एवं बंगाल के भी दर्शनार्थी मिले। दंतेश्वरी माता के दर्शन करने लिए सारे भारत से लोग आते हैं।

मुख्य द्वार
दर्शनोपरांत हमने काऊंटर पर मिल रहा प्रसाद लिया। जहाँ एक चलभाषधारी युवक बैठ कर पर्ची काट रहा था और आटे के 5 छोटे-छोटे लड्डू 25 रुपए में दे रहा था। आस्था, चिकित्सा के नाम पर सब मान्य है। हमने पचास रुपए देकर दो पैकेट लिए। पचास रुपए देने का एक मात्र कारण था कि लोग क्या कहगें प्रसाद भी नहीं लाए? ट्रस्ट द्वारा प्रसाद की व्यवस्था तो मुफ़्त में करानी चाहिए। पूर्व योजनानुसार कुटुमसर एवं तीरथगढ जल प्रपात देखने के लिए चल पडे। गीदम में भोजन करने की सोच कर आगे बढ गए। पूरा गीदम शहर निकल गया लेकिन कोई भी होटल दिखाई नहीं दिया। आगे तो कहीं खाना मिलेगा सोच कर आगे बढते गए।

विशाल बरगद किलेपाल में
किलेपाल पहुंचने पर सड़क के किनारे एक विशाल बरगद का पेड़ दिखाई दिया। जब हम मध्यप्रदेश में थे तब बरगद हमारा राज्य चिन्ह होता था। फ़ोटो लेने के लिए रुक गया। वहीं पर चाट का ठेला भी था। भूख लग रही थी, सोचा कि दो-चार गोलगप्पों पर ही हाथ साफ़ किया जाए। चाट वाले से महुआ के विषय में पूछा तो उसने कहा कि मिल सकता है। वह जब तक महुआ लाने गया तब तक हमने उसकी दुकान संभाली। थोड़ी देर बाद वह खाली हाथ आता नजर आया। उसने बताया कि आज 31 दिसम्बर होने के कारण स्टाक खत्म हो गया। जितना बनाया था सब बिक गया। दो घंटे बाद मिल जाएगा। इतना इंतजार कौन करे? हम चाट और गोलगप्पे उदरस्थ करने का मन बना चुके थे। वैसे चाट और गोलगप्पे का पानी मजेदार चटखारेदार था। 

अपनी चाट की दुकान
कई जगह गोल गप्पे वाले पानी अच्छा नहीं बनाते। गाँव में जब भी चाट खाई उसका आनंद ही लिया। हमने अपने लिए चाट स्वादानुसार स्वयं ही बनाई। अपना हाथ जगन्नाथ। अब इससे अधिक हाईजेनिक फ़ुड कोई दूसरा नहीं हो सकता। जब जगदलपुर के समीप केशलूर पहुंचे तो वहां अच्छी बारिश हो रही थी। मुझे याद था कि यहाँ पर एक ढाबा है जहां मैने 7 साल पहले खाना खाया था। केशलुर ढाबे से ही कांगेर वैली, कुटुमसर एवं तीरथगढ के लिए रास्ता जाता है। ढाबे समीप ही गाड़ी रोकी। भीतर खाने वालों की बहुत भीड़ थी। बंगालियों ने हाय तौबा मचा रखी थी। नव वर्ष के अवसर काफ़ी बंगाली टूरिस्ट आए हुए थे। गरम गरम भाप उठता हुए चावल देख कर मन मचल गया। मैने चावल, दाल और सब्जी का आर्डर दे दिया। साथियों ने चाय पी और मैने भरपेट चावल खाया, छत्तीसगढिया जो ठहरा........................आगे पढें

बस्तर: पहला पड़ाव जगतुगुड़ा

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी मंगलवार, 21 अगस्त 2012 1 टिप्पणियाँ

स्तर की धरा किसी स्वर्ग से कम नहीं। हरी-भरी वादियाँ, उन्मुक्त कल-कल करती नदियाँ, झरने, वन पशु-पक्षी, खनिज एवं वहां के भोले-भाले आदिवासियों का अतिथि सत्कार बरबस बस्तर की ओर खींच ले जाता है। बस्तर के वनों में विभिन्न प्रजाति की इमारती लकड़ियाँ मिलती हैं। यहाँ के परम्परागत शिल्पकार सारे विश्व में अपनी शिल्पकला के नाम से पहचाने जाते हैं। अगर कोई एक बार बस्तर आता है तो यहीं का होकर रह जाता है। आदिवासी हाट-बाजार, त्यौहार, वाद्ययंत्र, नाच-गाना एवं पारम्परिक उत्सव, खान-पान के साथ महुआ का मंद बस्तर भ्रमण के आनंद को कई गुना बढा देता है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण अब पर्यटकों की आवा-जाही कम हो गयी, लेकिन घुम्मकड़ों के लिए कहीं रोक टोक नहीं है। वे बेखौफ़ भ्रमण कर सकते हैं। बस्तर में ही आकर आदिवासी संस्कृति के विषय में विज्ञ हो सकते हैं। बचपन से अभी तक कई बार बस्तर जा चुका हूँ और जो भी बदलाव हुए हैं उसे मैने भी देखा है। बस्तर के निमंत्रण हमेशा तैयार रहता हूँ एक पैर पर।

नया ड्राईवर कर्ण
एक सप्ताह पहले ही गुजरात भ्रमण कर घर लौटा था। सोचा कि नव वर्ष घर पर ही मनाया जाएगा। बच्चे भी तैयारी में लगे थे। बरसों पुराने पारिवारिक मित्र का फ़ोन आया कि दंतेवाड़ा देवी दर्शन को चलते हैं। अगर छुट्टी मिल जाती है तो साथ चलेगें। मैने उन्हे अनमने मन से हाँ कह दी। बरसों के बाद मिल रहे थे। श्रीमती जी से जाने के विषय में पूछा तो उन्होने मना कर दिया और मैं अपने काम में लग गया। दुबारा उनका फ़ोन आया कि छुट्टी मिल गयी और वे शुक्रवार 30 तारीख को 12 बजे तक पहुंच रहे हैं। मैने अली सा को जगदलपुर पहुंचने की सूचना दे दी। दोपहर घर से खाना खाकर हम 5 प्राणी चल पड़े बस्तर जिले के मुख्यालय जगदलपुर की ओर। जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर है। धमतरी होते हुए चारामा के बाद माकड़ी ढाबे में हम रुके, चाय पीने का मन था। माकड़ी ढाबा भी इस वर्ष अपनी 50 वीं वर्षगांठ मना रहा है। रायपुर से जगदलपुर जाने वाली हर यात्री गाड़ी यहीं रुकती है। इस ढाबे की खीर बड़ी प्रसिद्ध है। हमने चाय से पहले खीर का आनंद लिया। यहाँ की खीर में पतले चावल और औंटाया हुआ दूध रहता है साथ ही शक्कर की मात्रा कुछ सामान्य से अधिक। माकड़ी से विश्राम करके हम कांकेर की ओर चल पड़े। कांकेर में गाड़ी शहर के बीच से जाती है इसलिए वहां ट्रैफ़िक जाम की स्थिति बन जाती थी। अब यहाँ तालाब के पास से बायपास बना दिया है जो पप्पु ढाबा के पास जाकर मुख्य मार्ग में मिलता है।

हम बायपास से होकर केसकाल घाट की ओर बढते हैं। साथ ही घाट का जंगल भी बढता है। रास्ते के साथ के जंगल अब खत्म हो गए हैं। केसकाल घाट के पास ही कुछ जंगल बचे हैं। पहले यह घाट बहुत ही सकरा था। यह घाट आंध्रप्रदेश, उड़ीसा और बस्तर का प्रवेश द्वार है। पहले जब रास्ता सकरा था तो जब कभी भी इधर से गुजरते थे तो एक-दो गाड़ियां खाई में पड़ी जरुर मिलती थी। रास्ता चौड़ा होने के बाद दुर्घटना की आशंका कम हो गयी है। लेकिन वाहन सावधानी से ही चलाने पड़ते हैं। सावधानी हटी दुर्घटना घटी। घाट के उपर तेलीन माता का मंदिर है। गाड़ियाँ यहाँ एक बार रुक कर ही जाती हैं। मंदिर में चढाने के लिए नारियल प्रसाद पास की दुकान में मिलता है। इस घाटी के अन्त में लोक निर्माण विभाग का विश्राम गृह भी है। वहाँ से घाटी का नजारा बड़ा खूबसूरत नजर आता है। जगदलपुर के सर्किट हाऊस इंचार्ज को फ़ोन लगाने से उनका नम्बर नहीं मिला। इसलिए हमने ब्लॉगरिय धर्म निभाया और अली सा को होटल बुक करने के लिए कहा। उन्होने थोड़ी देर बाद फ़ोन करके बताया कि 31 दिसम्बर मनाने वालों के कारण किसी भी होटल में जगह नहीं है। बड़ी मुस्किल से रेनबो होटल में एक कमरा मिला है और उसे आपके नाम से बुक कर दिया है। चलिए तसल्ली हुई, हमने कहा कि ये चारों एक कमरे में टिक जाएगें और हम अली सा के घर। मामला फ़िट हो जाएगा।

कोन्डागांव से बूंदा-बांदी शुरु हो गयी। मौसम खुशगवार हो गया था। नीरज को फ़ोन लगाया तो वह एक जन्मदिन पार्टी में था। वैसे भी उसकी जन्मदिन या शादी पार्टी रोज ही रहती है। हम लगभग 9 बजे रेनबो होटल ढूंढते हुए जगदलपुर शहर में पहुंचे। वहाँ काऊंटर पर पूछने पर बताया कि हमारे लिए एक कमरा बुक है, फ़िर उन्होने दूसरा कमरा भी दे दिया 3 माले पर। होटल में रेस्टोरेंट के साथ बार भी है। नीचे साफ़ सफ़ाई ठीक थी पर उपर जब अपने रुम में पहुंचे तो उसका बुरा हाल था। मेरे रुम में तो हनीमून के फ़ूल बिखरे हुए थे। बैरा ने हमारे कहने पर चादर तकिए बदले। लेकिन रुम में झाड़ू लगाने वाले गायब थे। मित्र अड़े रहे कि रुम साफ़ करवाया जाए, ये रुम ठीक नहीं है। उनको रुम बदल कर दे दिया गया। फ़्रेश होकर भोजन के लिए रेस्टोरेंट में पहुंचे वहाँ काफ़ी गहमा-गहमी थी। बाहर से पर्यटक आए हुए थे नव वर्ष मनाने के लिए। मेरा मुड उपर के रेस्टोरेंट में खाने का था। लेकिन ये सब नीचे के रेस्टोरेंट में पहुंच गए। अभी खाने का मुड बना था बच्चे सिर्फ़ सूप पीना चाहते थे। जब सूप आया तो उसमें डबल नमक निकला। जब उसे वापस किया गया तो उसने सूप के एक बाऊल को दो बना दिए और बिल देखा तो उसमें सभी का चार्ज जोड़ दिया।

चचा गालिब याद आ रहे थे, हमने जैसे तैसे खाना खाया, अन्य साथियों को यह रेस्टोरेंट पसंद नहीं आया। वे सूप के डबल बिल के नाम से काउंटर भिड़ गए। मुझे भी मैनेजर पर गरम होना पड़ा। काउंटर का लड़का मुझे जाना पहचाना लग रहा था। लेकिन मैने ध्यान नहीं दिया। जब उसने तुम कहकर बात कि मैने उसे कस के डांट दिया और अपने रुम में चला आया। अली सा ने फ़ोन पर बताया कि दंतेवाड़ा जाने के लिए सुबह जल्दी 6 बजे निकल जाएं तो कुटुमसर और तीरथ गढ के साथ चित्रकूट भी देखा जा सकता है। हमने भी रात को आपस में चर्चा कर ली थी कि सुबह जल्दी उठ कर दंतेश्वरी दर्शन के लिए चल पड़ेगें। होटल वाले ने भी सुबह 6 बजे चाय देने की हामी भर ली थी। मैने नेट चालू किया, मेरे डाटा कार्ट की स्पीड अच्छी थी। मैने मेल चेक किया और सोने लगा। मित्र नेट पर ही उलझे रहा जब भी मेरी आँख खुलती तो उसे लैपटाप से ही उलझे देखा। मुझे आभास हो गया था कि अब सुबह जल्दी उठकर दंतेवाड़ा जाना संभव नहीं है। सारा कार्यक्रम अभी से विलंब से चलने लगा है। आखिर मैने यही सोचा कि जो होगा सो देखा जाएगा, रात बड़ी प्यारी चीज है मुंह ढांप कर सोईएगा...............   आगे पढें  

देऊरपारा का कर्णेश्वर महादेव: छत्तीसगढ का कर्ण प्रयाग

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी शुक्रवार, 20 जुलाई 2012 3 टिप्पणियाँ

महानदी उद्गम 
पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खजाने से छत्तीसगढ समृद्ध है। हम छत्तीसगढ में किसी भी स्थान पर चले जाएं, वहां कुछ न कुछ प्राप्त होता है और हमारी विरासत को देख कर गर्व से भाल उन्नत हो जाता है। चित्रोत्पला गंगा (महानदी) भारत की प्रमुख नदियों में से एक है। महाभारत के भीष्म पर्व में चित्रोत्पला नदी को पुण्यदायिनी और पाप विनाशिनी कहकर स्तुति की गयी है - उत्पलेशं सभासाद्या यीवच्चित्रा महेश्वरी। चित्रोत्पलेति कथिता सर्वपाप प्रणाशिनी॥ चित्रोत्पला गंगा के तट पर सभ्यता का विकास हुआ, शासकों ने राजधानी बनाई और समृद्धि पाई। रायपुर से धमतरी होते हुए 140 किलो मीटर पर नगरी-सिहावा है, यहां रामायण कालीन सप्त ॠषियों के प्रसिद्ध आश्रम हैं। नगरी से आगे चल कर लगभग 10 किलोमीटर पर भीतररास नामक ग्राम है। वहीं पर श्रृंगि पर्वत से महानदी  निकली है। यही स्थान महानदी का उद्गम माना गया है। यहीं महेन्द्र गिरि पर्वत है, जहाँ महर्षि परशुराम का आश्रम है। नगरी और सिहावा के मध्य में देऊरपारा कर्णेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर राज्य पुरातत्व के संरक्षण में दर्शनीय स्थल है। यहां छत्तीसगढ पर्यटन विभाग का नव निर्मित रेस्ट हाऊस भी है।

कर्णेश्वर महादेव मंदिर में शिलालेख
नगरी से 6 किलोमीटर पर स्थित है देऊरपारा, इसे छिपली पारा भी कहते हैं। यह गाँव महानदी और बालुका नदी के संगम पर पहाड़ी की तलहटी में बसा है। नदी के एक फ़र्लांग की दूरी पर कर्णेश्वर महादेव का मंदिर है। राम मंदिर में प्रवेश करता हूं तो मुझे यहां स्थित मूर्तियां काफ़ी पुरानी दिखती हैं और मेरी जिज्ञासा बढती है कि इस स्थान के विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करुं। राम मंदिर से लगा हुआ कर्णेश्वर महादेव का मंदिर है। मंदिर के गर्भ गृह का द्वार अलंकृत है। दाहिने हाथ की तरफ़ नागरी लिपि एक शिलालेख लगा हुआ है। शिलालेख देखकर इस मंदिर के एतिहासिक महत्व का दृष्टिगोचर होता है। देऊर पारा के इन मंदिरों का निर्माण कांकेर के सोमवंशी राजाओं ने 12 वीं सदी में कराया था। सपाट बलुआ पत्थर पर अभिलेख अंकित है। कर्णेश्वर महादेव के सम्मुख नंदी भी विराजमान हैं तथा नंदी के मंडप के पीछे गणेश जी का विग्रह स्थापित है। इस स्थान पर गांव के यादव समाज, पटेल समाज, विश्वकर्मा समाज, केंवट समाज, आदि ने भी मंदिर बना रखे हैं। मंदिर प्रांगण में कबीर चौरा भी दिखाई दिया। इससे लगा हुआ सतनामी समाज का जैतखांभ भी है। मंदिर की उत्तर दिशा में एक कुंड बना हुआ है। इसे किसने और कब बनाया, इसकी जानकारी तो नहीं मिली। अनुमान है कि मंदिर बनाने के लिए किए गए पत्थरों के उत्खनन से कुंड का निर्माण हुआ होगा।

राम मंदिर का दृश्य
मंदिर परिसर में मेरी मुलाकात पुजारी राजेन्द्र पुरी गोस्वामी से होती है। मैं उनसे चर्चा करता हूँ एवं इस स्थान के विषय में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करता हूँ। वे बताते है कि जिसे राम मंदिर कहते हैं उसमें विष्णु भगवान की दो मूर्तियाँ एवं एक मूर्ति सूर्य की है। पहले मंदिर नदी के किनारे हुआ करता था। लेकिन कालांतर में समय की मार से वह ध्वस्त हो गया और उसके भग्नावशेष अभी तक नदी में पड़े हैं। वहाँ से इन  मूर्तियों  को कर्णेश्वर महादेव मंदिर के समीप स्थापित किया गया। गणेश जी की मूर्ति को सिहावा के तत्कालीन थानेदार गुप्ता जी ने मंदिर के भग्नावशेष का जीर्णोद्धार करके स्थापित कराया था। गाँव की आबादी अधिक नहीं है लगभग 70 घर हैं। जिनमें 7 घर ब्राह्मण, 15 साहू, 10 गोस्वामी, 7  केंवट, 10 गोंड , 4 राऊत , 1 लोहार, 3 सारथी एवं अन्य निवासी हैं।  गाँव में नाई का एक भी घर नहीं है। वे बताते हैं कि गांव में नाई नदी पार के गांव सिरसिदा से आता है। वही गांव का काम करता है। ग्रामीणों के जीवन यापन का मुख्य साधन खेती है। कुछ लोग नौकरी में भी लगे हैं। रामेश्वरी साहू भूतपूर्व जनपद सदस्य कहती हैं, नदी के किनारे बसे होने पर भी गांव में पीने के पानी की समस्या है। इस सड़क को मैने अपने कार्यक्राल में बनवाया था।हम राजेन्द्र पुरी गोस्वामी के साथ महानदी और बालूका के संगम की ओर चल पड़ते हैं।

राजेन्द्र पुरी गोस्वामी एवं ब्लॉगर
महानदी के तट पर मोती तालाब है, इस तालाब में भी एक कुंड बना हुआ है, इसे अमृत कुंड या औषधि कुंड कहते हैं। राजेन्द्र पुरी बताते हैं कि इस कुंड में नहाने से बड़े से बड़े रोग का शमन हो जाता है, ऐसी मान्यता है। कुंड सूखा पड़ा है, नहाने की बात तो दूर अभी इसमें उतर भी नहीं सकते। कहते हैं कि एक राजा को कोढ हो गया था। वह इस स्थान पर शिकार करने आए थे, एक दिन उसके कुत्ते इस कुंड में नहाकर उसके पास पहुंचे, कुत्तों ने थरथरी लेकर पानी को झाड़ा, वह पानी राजा के शरीर में गिरा। जिससे कुछ दिनों बाद उसका कोढ ठीक गया। तब से मान्यता है कि इस औषधि कुंड में जो भी नहाएगा उसके समस्त रोग ठीक हो जाएगें। कुंड से लगा हुआ नदी किनारे एक आम का वृक्ष है, इसके नीचे की भूमि को लीप-बहार कर बैठने लायक बना दिया है। इस वृक्ष के नीचे लोग अपने मृतकों का संस्कार करते हैं, मुंडन एवं पिंड दान इत्यादि यहीं होता है। डोमार प्रसाद मिश्रा कहते हैं कि यहां पर अस्थि विसर्जन करने के ढाई दिनों के पश्चात अस्थियों के अवशेष नहीं मिलते, यह प्रमाणित है। उड़ीसा, बस्तर कांकेर आदि से लोग अस्थि विर्सजन के लिए आते हैं।

रुपई
डोमार प्रसाद मिश्रा मुझे मोती तालाब के उस स्थान पर ले जाते हैं जहां सोनई और रुपई नामक स्थान है। आम के पेड के एक तरफ़ रुपई एवं दुसरी तरफ़ सोनई है। मोती तालाब के गहरीकरण के समय इस स्थान को नहीं खोदा गया। कहते हैं यहां खजाना गड़ा हुआ है और दैवीय स्थान है। कई बरस पहले कुछ तांत्रिको ने यहां से खजाना (हंडा) निकालने का प्रयास किया था परन्तु वे सफ़ल नहीं हुए। उसके बाद किसी ने इस स्थान पर उत्खनन करने का प्रयास नहीं किया। विशेष पर्व पर इन स्थानों ही होम धूप देकर पूजा की जाती है। (छत्तीसगढ में हंडा (गड़े धन) के विषय में गाँव-गाँव में चर्चाएं चलते रहती हैं, बैगा और तांत्रिक हंडे का लालच दिखा कर लोगों की जेब खाली करवाते रहते हैं, मुझे तो आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने कहा हो कि उसे हंडा मिला है। हाँ, हंडे के पीछे धन सम्पत्ति गंवाकर कंगाल बने लोग यदा-कदा मिल जाते हैं।

समाधियाँ
मोती तालाब से मुझे पहाड़ी की तलहटी में कुछ समाधियां बनी दिखाई देती हैं। हम सड़क के उस पार चल कर समाधियों पास पहुंचे। राजेन्द्र पुरी बताते हैं कि उनके पूर्वज 200 साल पहले इस गाँव में उत्तर प्रदेश से आए थे। उत्तर प्रदेश के किस गाँव से आए थे इसका उन्हे पता नहीं। यहाँ आकर उन्होने मंदिर के भग्नावशेष में शरण ली। उन्हे यहाँ शिव जी मिल गए और उन्होने पूजा शुरु कर दी। उसके पश्चात उनका परिवार यहीं का हो कर रह गया। अब मंदिर में राजेन्द्र पुरी पूजा करते हैं। ये समाधियाँ उनके पूर्वजों की हैं। एक समाधि मौनी महाराज की है, मौनी महाराज लगभग डेढ सौ वर्ष पूर्व हुए हैं, इन्होने 16 साल मौन रह कर तपस्या की। मंदिर के सर्वराकार गणेश महाराज हुए, उन्हे गांव के मालगुजार गोपाल सिंह ने पाँच एकड़ जमीन 1927 मे दी। यह जमीन अब भी मंदिर के नाम से ही है। इस पर गाँव वाले रेग (किराए पर) खेती करते हैं। मंदिर इस जमीन पर ही माघ के महीने में पुन्नी मेला भरता है।

महानदी एवं बालूका नदी का संगम
हम चल कर नदी के संगम पर पहुंचते हैं। यहां पर रेत की बोरियों से पानी रोक कर निस्तारी के लिए उपयोग किया जा रहा है। नदी पर सकरिया गांव दिखाई दे रहा है। उसके दायीं तरफ़ से बालूका नदी आकर महानदी में मिल रही है। राजेन्द्र पुरी कहते हैं, उनके दादा बताते थे कि नदी के तट से एक सुरंग उनके घर तक जाती है। एक दिन कोई मंछन्दर नदी में मछली मारते हुए सुरंग में प्रवेश कर गया और उनके घर के पास जाकर निकला। उन्हे सुरंग दिखाने कहता हूँ तो वे कहते हैं कि उन्होने सुरंग में जाने का कभी प्रयास नहीं किया और न ही किसी गाँव वाले ने डरकर उसमें जाने का प्रयास किया। हम तो बाबू आपको पूर्वजों से सुनी सुनाई बता रहे हैं। ग्रामीण अंचल में पीढी दर पीढी किंवदंत्तियाँ चलते रहती हैं, इनके मूल में कहीं न कहीं सत्य छिपा होता है। जो कालांतर मे प्रकट होता है। हम वापस मंदिर की ओर चल पड़ते हैं।

प्राप्त मूर्तियाँ
डोमार मिश्रा कहते हैं कि पहले हमारा एक ही घर था। परिवार बढने के साथ बंटवारा होता गया, घर भी बढ गए। गाँव की गलियों में चलते हुए मंदिर पहुंचते हैं। वहां राजेन्द्र पुरी नारियल फ़ोड़ कर उसकी गिरी खिलाते हैं। समीप ही बने हुए एक कमरे में इस स्थान से प्राप्त 15 मूर्तियाँ रखी हैं। यहां मुझे संग्रहालय जैसा ही दृश्य दिखाई दिया। वहाँ पर बैठे कुछ ग्रामीणों से चर्चा होती है, मंदिर के संचालन के लिए संचालन समिति बनी हुई है। समिति ही मंदिर की देखरेख करती है। मंदिर के प्रांगण में चंपा (सप्त पर्णी) का पेड़ है, उसके सुंदर सफ़ेद फ़ूल प्रांगण में झर रहे हैं। दर्शनार्थी उन फ़ूलों पर पैर नहीं रखते, उन्हे बचा कर चलते हैं। धूप बढती जा रही है और भूख भी। भोजन का समय होता है। हमारे भोजन का इंतजाम रामेश्वरी साहू के घर पर है। घर पहुंचने पर वे स्नेह से हमें भोजन कराती हैं।

महानदी  का उद्गम
भोजनोपरांत हम सिहावा की ओर चल पड़ते हैं, यहां रामायण कालीन सप्त ॠषियों के नाम से पर्वत हैं। सामने श्रृंगि ॠषि पर्वत सड़क के उस पार है और महानदी का उद्गम सड़क के इस पार। इस पर्वत को श्रृंगि नामक होने की जनश्रुति मिलती हैं। श्रृंगि ऋषि का विवाह रामचन्द्र की बहन शांता से हुआ था। अतः समीप में इसी श्रृंगि पर्वत में शांता गुफा भी हैं। रामायण कालीन प्रसिद्ध सप्त ऋषि-मुनियों ने श्रृंगि ऋषि प्रमुख माने जाते हैं।  कन्क ऋषि के नाम पर कन्क ऋषि पर्वत,  शरभंग ऋषि के नाम से शरभंग पर्वत,  अगस्त्य ऋषि के  नाम पर अगस्त्य पर्वत, मुचकुन्द ऋषि एक प्रमुख ऋषि थे। सप्त ऋषियों में इनका भी नाम है। इन्हीं के नाम पर सिहावा क्षेत्र में मेचका पर्वत अर्थात् मुचकुन्द पहाड़ी, गौतम ऋषि के नाम पर गौतम पर्वत, सप्त ऋषियों में से अंगिरा ऋषि का भी महत्वपूर्ण स्थान हैं। इनके नाम पर सिहावा में पर्वत है, जिसे अंगिरा पर्वत कहा जाता हैं। रामायण काल में भगवान श्रीराम अंगिरा ऋषि से भी भेंट कर उनसे परामर्श लिये थे। यहाँ इन सप्त ॠषियों के आश्रम प्रसिद्ध हैं।

राम मंदिर में नदी तट के मंदिर की स्थापित मूर्तियाँ 
श्रृंगि ॠषि पर्वत से महानदी का उद्गम हुआ हैं। पर्वत से सड़क के नीचे से नदी बहती है। उद्गम स्थल पर दो चट्टानों के बीच सफ़ेद झंडिया लगा रखी हैं। एक बाबाजी नदी के बीच बड़ी सी चट्टान पर बैठे हैं। मैं नदी मे उतरता हूं तो चिकने पत्थरों पर पैर फ़िसल जाता और धड़ाम से नदी में ……… कैमरा संभालने की कोशिश करता हूँ और पानी से कैमरे को बचाने में कामयाब हो जाता हूँ। कुछ चित्र उद्गम के लेता हूँ। मेरी यात्रा का यह महत्वपूर्ण पड़ाव है। उद्गम के चित्र लेने के लिए ही मुझे जंगल में आना पड़ा। यहाँ अपने उद्गम से महानदी विपरीत दिशा में बहती दिखाई देती है। जो वहां से चलकर देऊर पारा होते हुए सिरसिदा ग्राम तक जाती है। सिरसिदा एवं देऊर पारा को नदी विभाजित करती है और यहीं पर बालुका और महानदी का संगम है। नदी के किनारे वन में स्थित होने के कारण स्थान सुरम्य एवं रमणीय है। पर्यटन के लिए उत्तम स्थान है, इस रामायण कालीन प्रसिद्ध स्थान पर समय हो तो एक बार अवश्य आएं।
नोट:-छत्तीसगढ के धमतरी जिले में रायपुर से 110 किलो मीटर की दुरी पर नगरी तहसील स्थित है। नगरी से देऊरपारा 6 किलो मीटर है तथा यहाँ से लगभग 4 किलोमीटर पर सिहावा है। रायपुर से नगरी के लिए बस की सुविधा है। समीपस्थ रेल्वे स्टेशन धमतरी (नेरो गेज) और एयर पोर्ट रायपुर है। रायपुर से टैक्सी या बस द्वारा भी धमतरी होते हुए नगरी-सिहावा पहुंचा जा सकता है। आप यहाँ किसी भी मौसम में आ सकते है। रुकने के लिए नगरी, सिहावा, देऊर पारा में रेस्टहाऊस एवं धमतरी में होटल की सुविधा है। 

सावन में सवनाही तिहार

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी सोमवार, 16 जुलाई 2012 0 टिप्पणियाँ


सवनाही देवी का स्थान गाँव के सियार में
थयात्रा के बाद सावन माह से छत्तीसगढ अंचल में त्यौहारों की झड़ी लग जाती है। छत्तीसगढ के लगभग सभी त्यौहार कृषि कर्म से जुड़े हुए हैं। सावन के महीने में वर्तमान में कांवरियों का जोर रहता है। प्रत्येक सोमवार को कांवरिये श्रद्धानुसार नदियों का जल लाकर समीस्थ शिवमंदिरों में अर्पित करते हैं। जिससे सावन भर पूजा-पाठ की चहल पहल रहती है। सावन के महीने में टोना-टोटका एवं जादू मंतर का भी जोर रहता है। नए जादू-टोना सीखने वाले इस महीने में गुरु बनाकर शिक्षा ग्रहण करते हैं तो गुरु अपने सिद्ध मंत्रों का प्रयोग कर उसको जाँचते भी हैं। मान्यता है भोले बाबा को सुर-असुर दोनो प्रिय हैं। इसलिए सावन के महीने में दोनो शक्तियाँ प्रबल रहती हैं और साधना करने पर शीघ्र फ़ल मिलता है। ग्रामीण अंचल के लोग टोना-टोटका को मानते हैं और इसके दुष्प्रभाव से डरे रहते हैं। जादू-टोना से गाँव के जान-माल की रक्षा के लिए गाँव के देवता की पूजा की जाती है। उसे होम-धूप देकर प्रसन्न किया जाता है और उससे विनती की जाती है कि गाँव में किसी तरह रोग-शोक, बीमारी और विघ्न-बाधा न आए।

नीम की लकड़ी की गाड़ी
सवनाही तिहार परम्परा पर गाँव के इतवारी बैगा ने  बताया कि गाँव के देवी-देवताओं की पूजा के लिए प्रत्येक गाँव में एक बैगा नियुक्त किया जाता है। बैगा की नियुक्ति गुरु-शिष्य परम्परा की गद्दी के हिसाब से तय होती है। जिस तरह किसी अखाड़े का महंत अपने किसी शिष्य को योग्य मानकर अपना उत्तराधिकारी बनाता है ठीक उसी तरह वृद्ध बैगा भी अपने किसी योग्य शिष्य को ही पाठ-पीढा देता है।(उत्तराधिकारी बनाता है) जिसे ग्रामवासी मान्यता देते हैं। त्यौहारों एवं झाड़-फ़ूंक करने पर बैगा को उचित मान-दान दिया जाता है। जिससे उसका निर्वहन होता है। बैगा के हाथों में ही सभी ग्रामीण त्यौहार मनाने की जिम्मेदारी होती है। इसी तरह आषाढ के अंतिम सप्ताह या सावन के प्रथम सप्ताह में आने वाले प्रथम रविवार को "सवनाही तिहार" मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। इस त्यौहार को मनाने के पीछे उद्देश्य है कि जादू-टोना हारी-बीमारी से गाँव के जन, गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ एवं अन्य पालतू जीव जंतुओं की हानि न हो। गाँव में चेचक, हैजा जैसी बीमारियां प्रवेश न करें। सभी सानंद रहें।

सवनाही पुतरी का बंधन
सवनाही तिहार मनाने के लिए पहला रविवार ही निश्चित किया जाता है। गाँव का कोटवार इसकी सूचना हाँका करके समस्त ग्रामवासियों को देता है। इस दिन गाँव में सभी कार्य बंद रहते हैं। गाँव का निवासी यदि कहीं गाँव से बाहर भी काम करने जाता है तो उस दिन उसे भी छुट्टी करनी पड़ती है। खेतों में कोई हल नहीं जोतता, कोई बैलागाड़ी नहीं फ़ांदता। सभी के लिए यह अनिवार्य छुट्टी का दिन होता है। अगर कोई इस आदेश का उल्लंघन करता है तो उसके दंड की व्यवस्था भी है। दंड खिलाने-पिलाने से लेकर आर्थिक भी हो सकता है। इतवारी के दिन सिर्फ़ गाँव के चौकीदार को काम करने की छूट रहती है। सवनाही तिहार मनाने के लिए गाँव में बरार (चंदा) किया जाता है। जिससे पूजा पाठ का सामान खरीदा जाता है और बैगा की दान-दक्षिणा दी जाती है। सवनाही पूजा करने बाद ही गाँव में इतवारी छुट्टी मनाने की परम्परा है। जो 5-7 इतवार तक मानी जाती है। अधिकतर गांवों में पाँच इतवार ही छुट्टी की जाती है।

सवनाही पूजा
शनिवार की रात में बैगा के साथ प्रमुख किसान गाँव के समस्त देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। इस रात बैगा के साथ जाने वाले समस्त लोग रात भर घर नहीं जाते और सोते भी नहीं। गाँव के किसी सार्वजनिक स्थान (मंदिर, देवाला, स्कूल) में रात काट देते हैं। फ़िर रविवार को पहाती (सुबह) होते ही चरवाहे गाँव के सभी मवेशियों को को चारागन में इकट्ठा कर देते हैं, उसके बाद मवेशियों के मालिक अपने घर से पलाश के पत्ते में कोड़हा (धान का चिकना भूसा) से बनी हुई अंगाकर रोटी के साथ कुछ द्रव्य लाकर राऊत और बैगा को देते हैं। जिसे लेकर बैगा और राऊत मवेशियों के साथ गाँव की पूर्व दिशा में सरहद (सियार) पर जाते हैं। वहाँ स्थित सवनाही देवी की पूजा की जाती है। पूजा के लिए एक जोड़ा नारियल, सिंदूर, नींबू, श्रृंगार का सामान, काले, सफ़ेद, लाल झंडे, टुकनी, सुपली, चूड़ी, रिबन, फ़ीता के साथ काली मुर्गी एवं कहीं-कहीं दारु का इस्तेमाल भी किया जाता है। पूजा के लिए नीम की लकड़ी की छोटी सी गाड़ी बनाई जाती है। जिसे लाल-काले और सफ़ेद ध्वजाओं से सजाया जाता है।

गाँव के सियार में सवनाही 
बैगा अपने साथ लाया हुआ पूजा का सामान देवी को अर्पित करता है और समस्त ग्राम देवी-देवताओं का स्मरण कर गाँव की कुशलता की प्रार्थना करता है। इसके बाद देवी की सात बार परिक्रमा करके कोड़हा की रोटी का देवी को भोग लगाकर सियार के उस पार रख देता है। इसके पश्चात काली मुर्गी के सिर पर सिंदूर लगा कर उसे सियार के उस पार भुत-प्रेत-रक्सा की भेंट के लिए छोड़ दिया जाता है। फ़िर बैगा वहां से चल पड़ता है, इस समय उपस्थित लोगों के लिए पीछे मुड़ कर देखना वर्जित होता है। ऐसी मान्यता है कि पीछे मुड़ कर देखने से सवनाही देवी नाराज होकर सभी भूत-प्रेतों को सियार (सरहद) पर ही छोड़ कर चली जाती है। सभी जानवरों को वापस गाँव में लाया जाता है। नारियल फ़ोड़ कर प्रसाद बांटा जाता है, यह प्रसाद सिर्फ़ उन्हे ही दिया जाता है जो बैगा के साथ पूजा-पाठ में सम्मिलित रहते हैं। भोग लगाने के बाद बची हुई कोड़हा की रोटी को मवेशियों को खिलाया जाता है।

सवनाही पुतरी
सवनाही तिहार के दिन लोग घरों में गाय के गोबर से हाथ की 4 अंगुलियों द्वारा घर के दरवाजे पर आदिम आकृति बनाई जाती है। जो कहीं मनुष्याकृति होती है तो कहीं शेर इत्यादि बनाने की परम्परा है। इन आकृतियों से जोड़ कर चार अंगु्लियों की गोबर की रेखा घर के चारों तरफ़ बनाई जाती है। जैसे गोबर की रेखा से घर को चारों तरफ़ से बांध दिया गया हो। इस बंधने का उद्देश्य यही है कि कोई भूत प्रेत या गैबी शक्ति घर के निवासियों को परेशान न करे। अगर गैबी ताकतें आती भी हैं तो बंधन होने से घर में प्रवेश नहीं कर पाएगीं जिससे परिवार हानि से बचा रहेगा। यह टोटका गाँव के कच्चे पक्के घरों में दिखाई देता है। घरों के बाहर गोबर की लकीरें खींची हुई दिखाई देती है। वर्तमान युग में भले ही यह कार्य आदिम लगता हो, लेकिन गाँव में अभी तक प्रचलित है और ग्रामवासियों को संतुष्टि देता है। जिससे वे साल भर अपना कृषि कार्य निर्बाध होकर करते हैं। छत्तीसगढ के लगभग सभी जिलों में यह त्यौहार मनाया  जाता है।

(सुबह की सैर के दौरान गाँव के सियार (सीमा) पर सवनाही पूजा की हुई दिखाई दी। सोचा कि एक पोस्ट ही लिख दी जाए सवनाही पर, जिससे छत्तीसगढ की संस्कृति से पाठक परिचित होगें)

छत्तीसगढ: एक सैलानी की कलम से ………

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी गुरुवार, 21 जून 2012 17 टिप्पणियाँ

दिम मनुष्य भोजन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकता था, जब उसने भोजन का प्रबंधन सीख लिया तो स्थायी निवास बना कर रहने लगा। उसकी जिज्ञासा लगातार भ्रमण, देशाटन, तीर्थाटन, पर्यटन की बनी रही, जो आज तक जारी है। पहले सिर्फ़ दो तरह के घुमंतु यात्री थे, पहले वे जिन्हे व्यापार करके कुछ कमाना है, ये सिर्फ़ व्यापार के उद्देश्य से यात्राएं करते थे। दूसरे वे जिनको चौथापन लग चुका था, ऐसे लोग तीर्थ धामों के दर्शन कर पूण्य लाभ कमाने यात्रा करते थे। वर्तमान में लोग प्रकृति की छटाओं का आनंद लेने एवं दुनिया को जानने के लिए देश देशांतर की यात्रा करते हैं। सच तो यह है कि दुनिया बहुत बड़ी है, जिसे सम्पूर्ण जीवन में भी देख पाना किसी के बस की बात नहीं। वर्तमान आधुनिक युग में मनुष्य अपने काम से थक जाता है तो मनोरंजन करने एवं शारीरिक तथा मानसिक थकान उतारने घूमना चाहता है। इसी घूमने को वर्तमान में पर्यटन का रुप दिया गया। घूमना भी दो तरह का होता है, पहला घुमक्कड़ी - इसमें कम से कम खर्च कर अधिक से अधिक दुनिया देखने की प्रवृति होती है। दूसरा पर्यटक - जो खर्च करके वे सारी सुविधाएं लेना चाहता है जो उसे घर पर उपलब्ध हैं। इस धरती पर देखने एवं जानने वालों  के लिए सभी तरह का खजाना भरा पड़ा है।

हमारा भारत ही इतना विशाल है कि यहाँ बारहों महीने भिन्न-भिन्न प्रातों में हम अलग-अलग मौसम का मजा ले सकते हैं। एक ही समय में कहीं 48 डिग्री टेम्परेचर की गर्मी पड़ रही होती है तो कहीं बर्फ़बारी तो कहीं भीषण वर्षा होती है। सभी तरह के मौसम हमें देखने मिल जाते हैं। "छत्तीसगढ: एक सैलानी की कलम से" से ब्लॉग का उद्देश्य है कि हम पर्यटकों एवं घुमक्कड़ों को छत्तीसगढ की सांस्कृतिक विरासत एवं पुराधरोहरों से परिचित कराएं। उन स्थानों की जानकारी हम पर्यटकों तक पहुंचाए जहाँ वे जाना और घूमना पसंद करेगें। सप्ताह भर की छुट्टियाँ कहाँ और किस तरह बिताएं। जिस स्थान पर आप जा रहे हैं वहां तक जाने, रुकने एवं खाने के साधन क्या है? इसकी जानकारी भी दें। जिससे छुट्टियां बीता कर तरोताजा हो उर्जा ग्रहण करे। देखने एवं समझने के लिए छत्तीसगढ में अनेकों ऐसे स्थान है जहाँ व्यक्ति सपरिवार अपनी छुट्टी बिता सकता है। घूम सकता है, प्रागैतिहासिक काल के अवशेषों से लेकर मध्यकाल के मंदिरों एवं भवनों के साथ सुरम्य वादियों, घने वनों से समृद्ध छत्तीसगढ भारत के नक्शे में नि:संदेह सिरमौर है। यहाँ विभिन्न संस्कृतियों एवं भाषाओं के बोलने वाले लोग मिल जाएगें। यही भिन्नता छत्तीसगढ की अभिन्नता है।

कुटुमसर जाने का मार्ग (फ़ोटो -ललित शर्मा)
हमारे छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। प्रदेश ऊँची-नीची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ घने वनों वाला राज्य है। इन वनों में साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्ष बहुतायत में है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा (धान की कोठी) भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत श्रृंखला है। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है । पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार छत्तीसगढ के यह तीन प्रकृति निर्मित खंड हैं। महानदी, शिवनाथ, खारुन, पैरी तथा इंद्रावती प्रमुख नदियाँ हैं।

महानदी का उद्गम (फ़ोटो -ललित शर्मा)
वनों में सभी प्रकार वनौषधियाँ पाई जाती हैं। यहाँ के वनवासी चिकित्सा के लिए इनका प्रयोग करते हैं। छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोसल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोसल' और 'दक्षिण कोसल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोसल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। छत्तीसगढ में प्रवाहित महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला गंगा' था) का मत्स्य पुराण, महाभारत के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख हुआ है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। तुरतुरिया लवकुश की जन्म भूमि मानी जाती है, जनश्रुति है कि यहाँ वाल्मीकि  आश्रम था। महानदी के उद्गम स्थल सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्रयेष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्रीराम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे। इसका प्रमाण यहाँ के सप्त ॠषि पर्वतों के रुप में मौजूद हैं।

रामगढ: कालिदास ने मेघदूत रचा (फ़ोटो-ललित शर्मा)
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ सरगुजा अंचल के रामगढ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।

सिरपुर का सुरंग टीला (फ़ोटो-ललित शमा)
माता कौशल्या का जन्म स्थान चंद्रपुरी (चंदखुरी) कहलाता है। शबरी का शिवरी नारायण महानदी के तट पर विराजमान है। राजीवलोचन का प्रसिद्ध मंदिर जहाँ प्रतिवर्ष माघ माह की पूर्णिमा से शिवरात्रि तक कुंभ मेला लगता है। एतिहासिक पृष्ठ भूमि एवं सांस्कृतिक पुरातात्विक धरोहरें अद्वितीय हैं।सभी जिलों में स्थित  पुरातात्विक धरोहरें छत्तीसगढ की गौरव गाथा कहती हैं। बस्तर का चित्रकूट जलप्रपात नियाग्रा से टक्कर लेता है। मेरी रुचि पर्यटन स्थलों का भ्रमण करने तथा उनके विषय में लिख कर पर्यटकों एवं घुमक्क्ड़ों तक पहुचाने में है। जिससे जब वे छत्तीसगढ भ्रमण करने आएं तो उन्हे  एक स्थान पर ही समस्त जानकारी प्राप्त हो जाए। इस ब्लॉग पर आपको छत्तीसगढ के पर्यटन से संबंधित जानकारियाँ पढने मिलेगीं। यदि आपकी यात्रा में यह ब्लॉग मार्ग दर्शक का कार्य करता है मेरे लिए खुशी की बात होगी। ब्लॉग पढ कर आप मुझे टिप्पणियों के माध्यम से अपनी राय दे सकते हैं। जिससे मुझे खुशी होगी। तो साथियों अब चलिए एक सैलानी के साथ छत्तीसगढ की यात्रा पर, सैलानी ने अपनी यात्रा में जो देखा है वह आपके लिए प्रस्तुत है अगले अंक अगली पोस्ट पर……… जय जोहार, जय छत्तीसगढ

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