राजिम: आस्था का केन्द्र पाँचवा कुंभ

प्रस्तुतकर्ता एक सैलानी बुधवार, 6 फ़रवरी 2013


छत्तीसगढ़  की राजधानी रायपुर से दक्षिण दिशा में 45 किमी की दूरी पर चित्रोत्पला गंगा (महानदी), सोंढूर एवं पैरी नदी के संगम तीर पर स्थित राजिम नगरी का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व सर्वविदित है। प्रत्येक माघ मास की पूर्णिमा से फ़ाल्गुन मास की शिवरात्रि अनादि काल से यहाँ मेले का आयोजन होता रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण होने के पश्चात मेले का विस्तार करने के दृष्टि से इसका आयोजन सरकारी तौर पर किया जाने लगा। भाजपा सरकार द्वारा सन 2005 से मेले को राजिम कुंभ का नाम देकर विस्तार दिया गया। सम्पूर्ण भारत से साधु सन्यासी एवं तीर्थ यात्री त्रिवेणी संगम पर पहुंच कर पवित्र तीर्थ नगरी में स्नान  पुण्यार्जन एवं ज्ञानार्जन के लिए पहुंचने लगे। वर्तमान में राजिम कुंभ भूलोक में विख्यात हो चुका है तथा प्रतिवर्ष कुंभ का विशाल आयोजन किया जा रहा है। राजिम कुंभ साधु संतों  के प्रवचन, शंकराचार्यों के आगमन द्वारा हरिद्वार, नासिक, इलाहाबाद व उज्जैन के चार कुंभों के पश्चात पाँचवे कुंभ के रुप में प्रचारित  हो रहा है।
राजीव लोचन मंदिर
वर्तमान में राजिम कुंभ क्षेत्र महानदी, सोंढू एवं पैरी के त्रिवेणी संगम पर स्थित होने के साथ तीन जिलों रायपुर, गरियाबंध एवं धमतरी, तीन विधानसभा क्षेत्रों राजिम, अभनपुर, कुरुद की सीमा में सम्मिलित है। राजिम के त्रिवेणी संगम नदी में पूरे प्रदेशभर से लोग पुण्य स्नान, तर्पण, मुंडन, दर्शन पूजन इत्यादि संस्कारों एवं धार्मिक कर्मों को सम्पन्न करने के लिए आते हैं। अनुमान है कि माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक चलने वाले राजिम कुंभ में 30 लाख श्रद्धालु मेला क्षेत्र में एकत्रित होते हैं। श्रद्धालुओं के बड़ी संख्या में आगमन को देखते हुए लगभग 5 किमी के क्षेत्र में मेला की व्यवस्था की जाती है। राजिम क्षेत्र का पौराणिक महत्व है। यह पद्म क्षेत्र के साथ पद्मावती नगरी के नाम से शास्त्र वर्णित है। 
अलंकृत मंडप द्वार
 राजिम कुंभ क्षेत्र का मुख्य मंदिर राजीव लोचन मंदिर है। इसके ईर्द-गिर्द व्यावसायियों ने कब्जा करके मुल रुप को छुपा दिया था।। दुकानों के बीच से होकर मंदिर में प्रवेश करना पड़ता था। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। इस मंदिर परिसर से अवैध कब्जा हटाने का एतिहासिक कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल के तत्कालीन अधीक्षण डॉ प्रवीणकुमार मिश्रा ने किया। आज राजीव लोचन मंदिर अपने पुराने रूप के करीब पहुँच चुका है। राजीव लोचन मंदिर महानदी (चित्रोत्पला गंगा) के पूर्वी तट  पर स्थित है। लोक मान्यता है कि  महानदी के त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से मनुष्य के सारे कष्ट मिट जाते हैं और वह मृत्युपरांत विष्णु लोक को प्राप्त करता है। यहाँ का कुम्भ मेला जग प्रसिद्ध हो चुका है, यह मेला माघ मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। मान्यता है कि  जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक राजिम की यात्रा न कर ली जाए।
त्रिवेणी संगम स्थित कुलेश्वर महादेव
महाशिव तीवरदेव के ताम्रपत्र एवं राजीव लोचन मंदिर से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि  राजिम के विष्णु मंदिर (राजीव लोचन) का निर्माण 8 वीं सदी में नलवंशी राजा विलासतुंग ने कराया था। शिलालेख में रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजल्यदेव प्रथम और रत्नदेव द्वितीय की कुछ विजयों का उल्लेख है। उनके सामंत (सेनापति) जगतपालदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर क्षेत्र में पश्चिम दिशा से प्रवेश करने पर सबसे पहले राजेश्वर एवं दानेश्वर मंदिर दिखाई देते हैं। इन मंदिरों के सामने राजीवलोचन का भव्य प्रवेश द्वार महामंडप है। इसकी चौखट के शीर्ष भाग में शेषशैया पर विष्णु भगवान विराजमान हैं लतावल्लरियों के मध्य विहाररत यक्षों की विभिन्न भाव भंगिमाओं एवं मुद्राओं में प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गयी हैं। बायीं दीवाल के स्तम्भ पर एक पुरुष की खड़ी प्रतिमा है, जिसका एक हाथ ऊपर है तथा दूसरा हाथ ह्रदय को स्पर्श कर रहा है। कमर पर कटार एवं यज्ञोपवित धारण किए हुए है। 
राम मंदिर की मिथुन मूर्तियाँ
पुरुष मूर्ति के दोनों तरफ नारियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। एक मूर्ति स्त्री और पुरुष की युगल है। इसमें पुरुष स्त्री से छोटा दिखाया गया है, वह हाथ में सर्प धारण किये हुए है। लोग इसे सीता की प्रतिमा मानते हैं पर सर्प के साथ पुरुष काम का प्रतीक है, इसलिए इसे रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका की प्रतिमा माना जा सकता है। इसके साथ ही यहाँ पर आकर्षक मिथुन मूर्तियाँ भी दिखाई देती है। इनके वस्त्र अलंकरण भी नयनाभिराम हैं। अंतराल में ललाट बिम्ब पर गरुडासीन विष्णु की प्रतिमा है। महामंडप एवं मुख्य मंदिर के बीच अन्तराल है। यह मंदिर पंचायतन द्वविड़ शैली में बना हुआ है। विशाल प्रांगण के चारों  कोनो में अन्य मंदिर भी स्थापित हैं।
राजिम कुंभ
मुख्य मंदिर आयताकार प्रकोष्ट के बीच में निर्मित है। भू विन्यास योजना में राजिम का मंदिर महामंडप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा मार्ग में बंटा हुआ है। गर्भ गृह में प्रवेश करने के लिए पैड़ियों पर चढ़ना पड़ता है। सामने ही एक स्तम्भ पर पूर्वाभिमुख गरुड़ विराजमान है। सामने काले पत्थर की बनी चतुर्भुजी विष्णु की मूर्ति है। जिसके हाथो में शंख, गदा, चक्र एवं पद्म दिखाई देते है। इसे ही भगवान राजीवलोचन के नाम से जाना जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। बायीं भीत पर दो शिलालेख लगे है, इनसे ही इस मंदिर के निर्माताओं एवं जीर्णोद्धारकर्ताओं की जानकारी मिलती है। राजीव लोचन की नित्य पूजा क्षत्रिय करते है, विशेष अवसरों पर ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है। इस मंदिर के उत्तर में जगन्नाथ मंदिर है। इसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के वामन अवतार की प्रतिमा लगी है। जिसमें तीसरा पग राजा बलि पर के शीश पर रखते हुए विष्णु को दिखाया है। राजीवलोचन मंदिर के महामंडप में बायीं तरफ़ बुद्ध की प्रतिमा है जो वर्तमान में  सामंत जगतपाल के रुप में पुजित है।
नागा साधु
राजीव लोचन मंदिर से बस्ती के बीच 50 कदम की दूरी पर राम मंदिर है। यह मंदिर भी ईंटों का बना है, इसके स्तम्भ पत्थरों के हैं।अधिलेखों से प्राप्त जानकारी के आधार पर इस पूर्वाभिमुख मंदिर का निर्माण भी कलचुरी नरेशों के सामंत जगतपालदेव ने कराया था। मंदिर के महामंडप में प्रस्तर स्तंभों पर प्राचीन मूर्तिकला के श्रेष्ठतम उदहारण है। इन स्तंभों पर आलिंगनबद्ध मिथुन मूर्तियों के साथ शालभंजिका, बन्दर परिवार, माँ और बच्चा तथा संगीत समाज का भावमय अंकन है। मकरवाहिनी गंगा,  राजपुरुष, अष्टभुजी गणेश, अष्टभुजी नृवाराह की मूर्ति है। मिथुन मूर्तियाँ का शिल्प उत्तम नहीं है। जैसे नौसिखिये मूर्तिकार ने इसे बनाया हो। राम मंदिर के प्रदक्षिणापथ से सम्बंधित प्रवेश द्वार शाखाओं से युक्त है, इनके अधिभाग पर गंगा-यमुना नदी देवियों की मूर्तियाँ हैं, राजिम के किसी भी मंदिर के प्रवेश द्वार में नदी देवियों की मूर्तियाँ नहीं है। राजिम के मंदिरों का शिल्प सर्वोत्तम भव्य एवं बहुत ही सुन्दर है। 
भभूत लगाए नागा साधू
राजिव लोचन दर्शन करने के पश्चात कुलेश्वर महादेव के दर्शन न हो तो राजिम यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। पुराविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार कुलेश्वर महादेव का प्राचीन नाम उत्पलेश्वर महादेव था जो कि अपभ्रंश के रूप में कुलेश्वर महादेव कहलाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर नदियों के संगम पर स्थित है। यह अष्टभुजाकार जगती पर निर्मित है। नदी के प्रवाह को ध्यान में रखते हुए वास्तुविदों ने इसे अष्टभुजाकार बनाया। इसकी जगती नदी के तल से 17 फुट की ऊंचाई पर है। कुल 31 सीढियों से चढ़ कर मंदिर तक पंहुचा जाता  है। कहते हैं कि मंदिर के शिवलिंग को माता सीता ने बनाया था। मंदिर में कार्तिकेय एवं अन्य देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं। किंवदंती है की नदी के किनारे पर स्थित संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम से कुलेश्वर मंदिर तक सुरंग जाती है। सुरंग का प्रवेश द्वार संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम में है। जिसके मुख को अब बंद कर दिया गया है।
कुंभ स्थल
राजिम क्षेत्र पंच कोसी क्षेत्र के अंतर्गत आता है। पंचकोसी यात्रा का प्रारम्भ भगवान श्री राजीव लोचन की नगरी युगो-युगो से ॠषि मुनियों, महात्माओं द्वारा सृजित आध्यात्मिक उर्जा से सम्पन्न पतित पावन राजिम नगरी से होता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने गोलोक से सूर्य के समान प्रकाशित पांच पंखुडियों से युक्त कमल पृथ्वी पर गिराया था । पांच कोस के विस्तार से युक्त उक्त कमल के परिधि क्षेत्र के अन्तर्गत भगवान शिव के पांच अधिवास है, जो पंचकोसी के नाम से विख्यात है । राजिम क्षेत्र को पद्म क्षेत्र भी कहा जाता है। पद्म क्षेत्र राजिम स्थित पंचकोसी क्षेत्र की परिक्रमा पवित्र अगहन एवं माघ माह में प्रारंभ होती है । यात्रा का प्रारंभ ब्रम्हचर्य आश्रम के समीप स्वर्ण तीर्थ घाट के समीप चित्रोत्पला में स्नान करने के पश्चात पद्म क्षेत्र के स्वामी राजीव लोचन भगवान के मंदिर जाकर पूजन से होता है । वहां से संगम पर स्थित उत्पलेश्वर शिव (कुलेश्वर नाथ) दर्शन पूजन करके पटेश्वर महादेव के दर्शन करने पटेवा ग्राम की ओर प्रस्थान करते हैं यह यात्रा का प्रथम पड़ाव है ।
छत्तीसगढ़ भंडारण निगम का स्टाल
द्वितीय पड़ाव के रूप में चम्पेश्वर महादेव चंपारण (चंपाझर) ब्रह्मिकेश्वर (बम्हेश्वर) महादेव फणीकेश्वर महादेव, फिंगेश्वर तथा यात्रा के अंतिम पड़ाव के रूप में कर्पूरेश्वर महादेव कोपरा के दर्शन पूजन होता है। यात्री राजिम आकर सोमेश्वर महादेव का दर्शनोपरांत यात्रा का समापन कुलेश्वर महादेव की पूजा अर्चना से करते है । ये पांचो शिव मंदिर कुलेश्वर से 5 कोस की दूरी पर स्थित है । इसीलिए ये पंचकोसी परिक्रमा के नाम से जाने जाते हैं । मान्यता है कि दंडकारण्य प्रवास के दौरान माता सीता ने स्वयं अपने हाथों से इस शिवलिंग का निर्माण कर भगवान शिव की पूजा की थी। 
पंचकोसी में शामिल फ़णीकेश्वर महादेव फ़िंगेश्वर
कुलेश्वर महादेव सोंढूर, पैरी एवं महानदी के त्रिवेणी संगम पर स्थित हैं। इस मंदिर का अधिष्ठान अष्टकोणीय है। मंदिर निर्माण करने वाले वास्तुकार ने नदी के प्रवाह को देखते हुए इसे अष्ट कोण का निर्मित किया। जिससे नदी के प्रवाह से मंदिर को कोई हानि न पहुचे। मंदिर की जगती तल से 17 ऊँची है तथा इसके निर्माण में छोटे आकार के प्रस्तर खण्डों का प्रयोग हुआ है। जगती पर पूर्व दिशा में सती स्मारक है जिसका वर्तमान में साक्षी गोपाल के नाम से पूजन हो रहा है। नदी के तल से मंदिर में पहुचने के लिए 22 पैड़ियाँ थी, कुछ वर्ष पूर्व नीचे दबी 9 पैड़ियाँ और प्रकाश में आने पर अब कुल 31 पैड़ियाँ हो गयी है। यहाँ एक शिलालेख भी लगा है।
कर्पुरेश्वर (कोपेश्वर) महादेव ग्राम कोपरा

फणीकेश्वर महादेव के दर्शन पंचकोसी यात्रा के दौरान फ़िंगेश्वर में होते हैं । श्रीमद राजीवलोचन महात्म्य में लिखा है - महानदी देवधुनी पवित्रप्राची तटे विश्रुतनामधेया। फिनगेश्वरारव्या नगरी विभाति फणीश्वरो यत्र गणैर्विभाति ।।२।। फ़णीकेश्वर का मंदिर 10 वीं शताब्दी का है। शिल्प की दृष्टि से भी उत्तम है। मंदिर के गर्भ गृह में महादेव विराजमान हैं। बाँई तरफ गणेश जी एवं चामुंडा की प्रस्तर प्रतिमाएं विराजमान हैं। दाईं तरफ  प्रस्तर का निर्मित एक कलश रखा हुआ है। मान्यता है कि छैमासी रात में इस मंदिर का निर्माण हुआ था। जब कलश चढ़ने का समय हुआ तो दिन निकल आया और कलश नहीं चढ़ सका। तब से इसका कलश भूमि पर ही रखा हुआ है। 
चम्पारण स्थित चम्पेश्वर महादेव
मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्रस्तर मूर्तियाँ लगी हैं, जिनमे रामायण, महाभारत के दृश्यों के साथ विष्णु अवतार प्रदर्शित है।  राम द्वारा शिला बनी अहिल्या उद्धार का भी सुन्दर चित्रण किया गया है। इस मंदिर की बाहरी भित्तियों पर मिथुन मूर्तियों की प्रधानता है। अभी तक देखे हुए छत्तीसगढ़ के मंदिरों में से सबसे अधिक मिथुन मूर्तियाँ इसी मंदिर में दिखाई देती हैं। यहाँ की मूर्तियों के समक्ष खजुराहो का मिथुन मूर्ति शिल्प भी फीका दिखाई देता है। मैथुनरत युगल कामसूत्र के विभिन्न आसनों को प्रगट करते हैं। मंदिर की भित्तियों पर लालित्यपूर्ण मिथुन मूर्तियों का प्रदर्शन दर्शनीय है। ये मूर्तियाँ मंदिर की तीन दीवारों पर लगायी गयी हैं।राजिम महात्म्य में कोपरा के महादेव को बाणेश्वर से कर्पुरेश्वर नाम से जाना जाता है। कोपरा गाँव के अंतिम छोर पर श्मशान के किनारे पर तालाब के बीच में कर्पुरेश्वर महादेव का मंदिर बना है। यह मंदिर पंचकोसी यात्रा में शामिल है। मंदिर में शिवजी विराजमान हैं। गणेश की भी प्राचीन मूर्ति रखी हुयी है। 
त्रिवेणी संगम में मित्रों के साथ ब्लॉगर
राजिम से लगभग 5 किमी की दूरी पर पटेवा ग्राम के अंतिम छोर पर एक बड़ा तालाब है, इसके पार पर पाटेश्वर महादेव विराजे हैं। अनुमान है कि पटेवा का तालाब प्राचीन है, इसका निर्माण भी 10 वीं शताब्दी के आस-पास ही हुआ होगा। कुर्रा-पटेवा से चम्पेश्वर (चम्पारण) 17 किलोमीटर है। चम्पेश्वर महादेव चम्पारण में विराजमान हैं। चम्पारण क्षेत्र पुष्टिकर सम्प्रदाय के परिवर्तक वल्ल्भाचार्य की जन्म भूमि है। यहाँ प्रतिवर्ष हजारों विदेशी यात्री दर्शनार्थ आते है।
आगामी राजिम कुंभ 25 फ़रवरी 2013 (माघ पूर्णिमा) से प्रारंभ हो रहा है, जो 10 मार्च 2013 (शिवरात्रि) तक सतत चलेगा। कुंभ की तैयारियाँ जोर शोर से प्रारंभ हैं। संतों का आगमन निश्चित है साथ ही नागाओं के अखाड़े भी कुंभ स्नान के लिए पहु्चेगें। प्रतिदिन संझा की गंगा आरती के साथ राजिम कुंभ की धूम  रहेगी। यही सुअवसर है पद्मक्षेत्र में त्रिवेणी स्नान कर पुण्यलाभ अर्जित करने का।

2 टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्दर सचित्र वर्णन...

     
  2. ज्ञानवर्द्धक पोस्‍ट ..

     

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