छत्तीसगढ: एक सैलानी की कलम से ………

प्रस्तुतकर्ता Unknown गुरुवार, 21 जून 2012

दिम मनुष्य भोजन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकता था, जब उसने भोजन का प्रबंधन सीख लिया तो स्थायी निवास बना कर रहने लगा। उसकी जिज्ञासा लगातार भ्रमण, देशाटन, तीर्थाटन, पर्यटन की बनी रही, जो आज तक जारी है। पहले सिर्फ़ दो तरह के घुमंतु यात्री थे, पहले वे जिन्हे व्यापार करके कुछ कमाना है, ये सिर्फ़ व्यापार के उद्देश्य से यात्राएं करते थे। दूसरे वे जिनको चौथापन लग चुका था, ऐसे लोग तीर्थ धामों के दर्शन कर पूण्य लाभ कमाने यात्रा करते थे। वर्तमान में लोग प्रकृति की छटाओं का आनंद लेने एवं दुनिया को जानने के लिए देश देशांतर की यात्रा करते हैं। सच तो यह है कि दुनिया बहुत बड़ी है, जिसे सम्पूर्ण जीवन में भी देख पाना किसी के बस की बात नहीं। वर्तमान आधुनिक युग में मनुष्य अपने काम से थक जाता है तो मनोरंजन करने एवं शारीरिक तथा मानसिक थकान उतारने घूमना चाहता है। इसी घूमने को वर्तमान में पर्यटन का रुप दिया गया। घूमना भी दो तरह का होता है, पहला घुमक्कड़ी - इसमें कम से कम खर्च कर अधिक से अधिक दुनिया देखने की प्रवृति होती है। दूसरा पर्यटक - जो खर्च करके वे सारी सुविधाएं लेना चाहता है जो उसे घर पर उपलब्ध हैं। इस धरती पर देखने एवं जानने वालों  के लिए सभी तरह का खजाना भरा पड़ा है।

हमारा भारत ही इतना विशाल है कि यहाँ बारहों महीने भिन्न-भिन्न प्रातों में हम अलग-अलग मौसम का मजा ले सकते हैं। एक ही समय में कहीं 48 डिग्री टेम्परेचर की गर्मी पड़ रही होती है तो कहीं बर्फ़बारी तो कहीं भीषण वर्षा होती है। सभी तरह के मौसम हमें देखने मिल जाते हैं। "छत्तीसगढ: एक सैलानी की कलम से" से ब्लॉग का उद्देश्य है कि हम पर्यटकों एवं घुमक्कड़ों को छत्तीसगढ की सांस्कृतिक विरासत एवं पुराधरोहरों से परिचित कराएं। उन स्थानों की जानकारी हम पर्यटकों तक पहुंचाए जहाँ वे जाना और घूमना पसंद करेगें। सप्ताह भर की छुट्टियाँ कहाँ और किस तरह बिताएं। जिस स्थान पर आप जा रहे हैं वहां तक जाने, रुकने एवं खाने के साधन क्या है? इसकी जानकारी भी दें। जिससे छुट्टियां बीता कर तरोताजा हो उर्जा ग्रहण करे। देखने एवं समझने के लिए छत्तीसगढ में अनेकों ऐसे स्थान है जहाँ व्यक्ति सपरिवार अपनी छुट्टी बिता सकता है। घूम सकता है, प्रागैतिहासिक काल के अवशेषों से लेकर मध्यकाल के मंदिरों एवं भवनों के साथ सुरम्य वादियों, घने वनों से समृद्ध छत्तीसगढ भारत के नक्शे में नि:संदेह सिरमौर है। यहाँ विभिन्न संस्कृतियों एवं भाषाओं के बोलने वाले लोग मिल जाएगें। यही भिन्नता छत्तीसगढ की अभिन्नता है।

कुटुमसर जाने का मार्ग (फ़ोटो -ललित शर्मा)
हमारे छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। प्रदेश ऊँची-नीची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ घने वनों वाला राज्य है। इन वनों में साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्ष बहुतायत में है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा (धान की कोठी) भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत श्रृंखला है। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है । पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार छत्तीसगढ के यह तीन प्रकृति निर्मित खंड हैं। महानदी, शिवनाथ, खारुन, पैरी तथा इंद्रावती प्रमुख नदियाँ हैं।

महानदी का उद्गम (फ़ोटो -ललित शर्मा)
वनों में सभी प्रकार वनौषधियाँ पाई जाती हैं। यहाँ के वनवासी चिकित्सा के लिए इनका प्रयोग करते हैं। छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोसल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोसल' और 'दक्षिण कोसल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोसल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। छत्तीसगढ में प्रवाहित महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला गंगा' था) का मत्स्य पुराण, महाभारत के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख हुआ है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। तुरतुरिया लवकुश की जन्म भूमि मानी जाती है, जनश्रुति है कि यहाँ वाल्मीकि  आश्रम था। महानदी के उद्गम स्थल सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्रयेष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्रीराम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे। इसका प्रमाण यहाँ के सप्त ॠषि पर्वतों के रुप में मौजूद हैं।

रामगढ: कालिदास ने मेघदूत रचा (फ़ोटो-ललित शर्मा)
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ सरगुजा अंचल के रामगढ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।

सिरपुर का सुरंग टीला (फ़ोटो-ललित शमा)
माता कौशल्या का जन्म स्थान चंद्रपुरी (चंदखुरी) कहलाता है। शबरी का शिवरी नारायण महानदी के तट पर विराजमान है। राजीवलोचन का प्रसिद्ध मंदिर जहाँ प्रतिवर्ष माघ माह की पूर्णिमा से शिवरात्रि तक कुंभ मेला लगता है। एतिहासिक पृष्ठ भूमि एवं सांस्कृतिक पुरातात्विक धरोहरें अद्वितीय हैं।सभी जिलों में स्थित  पुरातात्विक धरोहरें छत्तीसगढ की गौरव गाथा कहती हैं। बस्तर का चित्रकूट जलप्रपात नियाग्रा से टक्कर लेता है। मेरी रुचि पर्यटन स्थलों का भ्रमण करने तथा उनके विषय में लिख कर पर्यटकों एवं घुमक्क्ड़ों तक पहुचाने में है। जिससे जब वे छत्तीसगढ भ्रमण करने आएं तो उन्हे  एक स्थान पर ही समस्त जानकारी प्राप्त हो जाए। इस ब्लॉग पर आपको छत्तीसगढ के पर्यटन से संबंधित जानकारियाँ पढने मिलेगीं। यदि आपकी यात्रा में यह ब्लॉग मार्ग दर्शक का कार्य करता है मेरे लिए खुशी की बात होगी। ब्लॉग पढ कर आप मुझे टिप्पणियों के माध्यम से अपनी राय दे सकते हैं। जिससे मुझे खुशी होगी। तो साथियों अब चलिए एक सैलानी के साथ छत्तीसगढ की यात्रा पर, सैलानी ने अपनी यात्रा में जो देखा है वह आपके लिए प्रस्तुत है अगले अंक अगली पोस्ट पर……… जय जोहार, जय छत्तीसगढ

17 टिप्पणियाँ

  1. एक सैलानी के साथ छत्तीसगढ की यात्रा पर चलने का आनंद जरुर लेंगे हम सब... बहुत -बहुत शुभकामनाये इस ब्लॉग के शुभारम्भ पर

     
  2. sangita puri Says:
  3. नए ब्‍लॉग के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं .. इस पोस्‍ट के माध्‍यम से यह जानकर खुशी हुई कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्‍व वाले प्रदेश छत्‍तीसगढ के बारे में आपसे रोचक जानकारी मिलेगी .. आपके साथ हर जगह की यात्रा में हम बने रहेंगे!!

     
  4. बहुत ही बढ़िया हैं ..इस नए ब्लॉग का रूप और स्वरूप ..जानदार जानकारी मिलने की संभावना लगती है ..और हम हमेशा की तरह तैयार जंग (यात्रा ) पर निकलने के लिए आपके साथ ..तो चलिए छत्तीसगढ़ की संस्कृति देखने ......

     
  5. नए एवं सार्थक ब्लॉग के लिए बहुत बहुत बधाई

     
  6. बहुत बहुत शुभकामनाएं। इस ब्लाग के साथ हमारी भी छत्तीसगढ की यात्रा हो जाएगी।

     
  7. sarthak rachna ..swagat hai ..

     
  8. kunwarji's Says:
  9. राम राम जी,
    नए ब्लॉग के लिए शुभकामनाये....
    बहुत ही सार्थक और उपयोगी प्रयास के लिए बधाई..

    कुँवर जी,

     
  10. pkmgkp Says:
  11. ललित जी, अत्यंत ज्ञानवर्धक लेख-पद्धति की ओर अग्रसर हैं आप.अनुरोध है कि प्रत्येक स्थान के विषय में विस्तृत जानकारी दें .शुभकामनायें!

     
  12. Unknown Says:
  13. ललित शर्मा जी मेरा आमंत्रण स्वीकार करें कोरबा जिला पुरातात्विक महत्व के साथ ,खनिज सम्पदा , अलौकिक प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है , आदरणीय राहुल सिंह और आप से मेरा सविनय निवेदन कि यहाँ हमारे द्वारा चिन्हांकित पर्यटन स्थलों का भ्रमण करें .
    कोरबा जिला खासकर करतला ब्लाक और कुदमुरा ,पसरखेत में विचरण करते जंगली हाथी आपकी प्रतीक्षा में .
    आपका यह लेख यायावरी कि ही निशानी है . खुबसूरत ..............

     
  14. आपके साथ घूमना अच्छा लगा ...

     
  15. एक सैलानी के साथ छत्तीसगढ की यात्रा पर चलने का आनंद जरुर लेंगे हम सब... बहुत -बहुत शुभकामनाये इस ब्लॉग के शुभारम्भ पर

     
  16. Rahul Singh Says:
  17. बधाई और स्‍वागत.

     
  18. आप ऐसे ही घूमते रहे ...और अपने साथ हम सबको ऐसे ही हर छिपी जगह से परिचित करवाते रहे ....सादर

     
  19. Shanti Garg Says:
  20. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

     
  21. बहुत सुन्दर और उपयोगी जानकारी...अपने कार्यकाल में छत्तीसगढ़ में विभिन्न स्थानों, घने जंगलों से लेकर नगरों तक, को देखने का अवसर प्राप्त हुआ जो मेरे लिये एक अमूल्य अनुभव है...बहुत बहुत शुभकामनायें !

     
  22. यायावरी की एक नई दीठ की अनेकानेक शुभकामनायें ! छत्तीसगढ़ को ऐतिहासिक और पुरातात्विक मानचित्र पर एक नया स्थान मिलेगा .
    बहुत बधाई !

     
  23. स्वागत ...अच्छी जानकारी समेटे पोस्ट....

     

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी का स्वागत है,आपकी सार्थक सलाह हमारा मार्गदर्शन करेगी।

Twitter Delicious Facebook Digg Stumbleupon Favorites More