प्राकृतिक सुषमा से भरपूर अद्भुत सौंदर्य एवं प्राचीन गढ़ों के प्रदेश छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने नैसर्गिक रुप से अनुपम शृंगार दिया है। शस्य श्यामला धरा के मनमोहक शृंगार के संग यहाँ के प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों एवं जैन विहारों में मानवकृत अनुपम मिथुन शिल्प सौंदर्य का दर्शन होता है। कलचुरियों, पाण्डूवंशियों एवं नागवंशियों ने अपने कार्यकाल में भव्य मंदिरों एवं विशाल बौद्ध विहारों का निर्माण कराया। इसके साथ ही अन्य शासकों द्वारा निर्मित मंदिर भी मिलते हैं। निर्माण कार्यों में शिल्पकारों ने अपनी कला कौशल का प्रभावी परिचय दिया है। उनके द्वारा उत्कीर्ण शिल्प आज भी दर्शकों का मन मोह लेता है।
आलिंगन - राजीव लोचन मंदिर (राजिम)
मिथुन शिल्प के लिए खजुराहो को अधिक प्रसिद्धि मिली, परन्तु छत्तीसगढ़ के मंदिरों का मिथुन शिल्प भी अनूठा और खजुराहो से कमतर नहीं है। आरंग के भांड देवल जैन मंदिर, सिरपुर के तीवरदेव बौद्ध विहार, कबीर धाम के भोरमदेव, बारसूर के चंद्रादित्य मंदिर, महेशपुर के निशान पखना, नारायणपुर  के महादेव मंदिर, छप्परी के मंड़वा महल, राजिम के राम मंदिर, फ़िंगेश्वर के फ़णीकेश्वर महादेव मंदिर में तथा आंशिक रुप से जांजगीर के नकटा मंदिर, शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर, पाली के शिवालय में शिल्पकारों ने शिल्पशास्त्रों एवं कामशास्त्रों के मानकों के आधार पर मिथुन-मैथुन प्रतिमाओं का निर्माण किया है। ये प्रतिमाएँ अपनी ओर सहज ही दर्शक का ध्यान आकृष्ट कराती है।
चुंबन तीवरदेव बौद्ध विहार ( सिरपुर)
कामसूत्र में उल्लेखित बाभ्रवीय आचार्यों के अनुसार आलिंगन, चुंबन, नखक्षत, दंतक्षत, संवेशन, सीत्कृत, पुरुषायित तथा मुख मैथुन इत्यादि अष्टमैथुन क्रियाएँ होती है। स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में "स्मरण, कीर्तन, केलिः, प्रेक्षणं, गुह्यभाषणम्, सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च ॥" अर्थात स्त्री का स्मरण, स्त्री सम्बन्धी बात चीत करना, स्त्रियों के साथ खॆलना, स्त्री को देखना,  स्त्री से गुप्त भाषण (बात) करना, स्त्री से मिलनें का संकल्प करना, स्त्री की जिज्ञासा करना, स्त्री के साथ रहने को अष्टमैथुन माना है। उपरोक्त विषयों को शिल्पकारों ने अपने शिल्प में स्थान दिया।
मिथुन शिवालय (पाली-बिलासपुर)
कामशास्त्र पर संस्कृत में 'अनंगरंग', 'कंदर्प चूड़ामणि', 'कुट्टिनीमत', 'नागर सर्वस्व', 'पंचसायक', 'रतिकेलि कुतूहल', 'रति मंजरी', 'रति रहस्य', 'रतिरत्न प्रदीपिका', 'स्मरदीपिका', 'श्रृंगारमंजरी' आदि कई ग्रंथ हैं। इसके अतिरिक्त 'कुचिमार मंत्र', 'कामकलावाद तंत्र', 'काम प्रकाश', 'काम प्रदीप', 'काम कला विधि', 'काम प्रबोध', 'कामरत्न', 'कामसार', 'काम कौतुक', 'काम मंजरी', 'मदन संजीवनी', 'मदनार्णव', 'मनोदय', 'रति मंजरी', 'रति सर्वस्व', 'रतिसार', 'वाजीकरण तंत्र' आदि संबंधित ग्रंथ हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ कामसूत्र के हिन्दी टीकाकार डॉ गंगा सहाय शर्मा कहते हैं कि "अत्यंत आश्चर्य होता है कि आज से दो हज़ार वर्ष से भी पहले विचारकों को स्त्री और पुरुषों के मनोविज्ञान का इतना सूक्ष्म ज्ञान था।" 
मिथुन - चंद्रादित्य मंदिर बारसूर
वात्सायान के कामसूत्र में वर्णित अष्ट मैथुन का सजीव चित्रण मंदिरों की भित्तियों पर जीवंत होता हुआ दिखाई देता है। वात्सायन ने कामसूत्र को शब्दों में रचा और शिल्पकारों ने इसका मंदिरों में चित्रिकरण करके स्त्री-पुरुष के मनोविज्ञान को जन-जन तक शिक्षा की दृष्टि से पहुंचाया। मैथुन मूर्तियों को बौद्ध, शैव, वैष्णवों, जैनों आदि सभी पंथों ने अपने मंदिरों में स्थान दिया। बारसूर के चंद्रादित्य मंदिर स्थित एक प्रतिमा में प्रसव को भी उत्कीर्ण किया गया है। पुराविद डॉ शिवाकांत बाजपेयी कहते हैं "नवीं शताब्दी से 13 वीं शताब्दी के मध्य सामंतवादी शक्तियों ने अपने मनोरंजनार्थ मैथुन प्रतिमाओं को मंदिर की भित्तियों में स्थान दिया।"  
मिथुन - भांडदेवल जैन मंदिर (आरंग)
मैथुन प्रतिमाओं के निर्माण के पीछे एक कारण यह भी बताया जाता है कि उस समय गृहस्थ धर्म से विमुख होकर अधिकतर युवा ब्रह्मचर्य और सन्यास की ओर अग्रसर हो रहे थे, उन्हें गृहस्थ धर्म समझाने के लिए इन प्रतिमाओं को मंदिरों में स्थान दिया गया। आचार्य रजनीश कहते हैं "यदि काम, मन से बाहर रहेगा तभी हृदय में राम (ईश्वर) का निवास होगा। जन मानस को यही शिक्षा देने के लिए मंदिरों के गर्भ गृह में भगवान की प्रतिमा स्थापित करने के साथ बाहरी भित्तियों पर मैथुन प्रतिमाओं की स्थापना की जाती थी। अर्थात ईश्वर से अगर मिलन करना हो तो काम से तृप्त हो उसे बाहर ही छोड़ कर आना होगा। तभी ईश्वर तत्व की प्राप्ति होगी।" 
मिथुन - फ़णिकेश्वर महादेव (फ़िंगेश्वर जिला गरियाबंद)
मैथुन प्रतिमा निर्माण के एक पक्ष को उद्धृत करते हुए उदयपुर के डॉ श्री कृष्ण जुगनु कहते हैं "मंदिरों में कार्य करने वाले शिल्पकार बरसों यौनाचरण से वंचित रहते थे, उन्होनें यौन कुंठाएँ शांत करने की दृष्टि से भी इन प्रतिमाओं का निर्माण कर मैथुनानंद प्राप्त किया होगा।" साथ ही मिथक है कि आकाशीय बिजली से मंदिर को सुरक्षा देने की दृष्टि से भी मंदिरों में मिथुन प्रतिमाओं का निर्माण किया गया, उस काल में मान्यता थी कि यदि मंदिरों में मिथुन प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी तो उन्हें आकाशीय बिजलियों से सुरक्षा मिलेगी। इसलिए कई मंदिर परिसरों में सिर्फ़ एक-दो मिथुन प्रतिमाएँ ही दिखाई देती हैं। 
मिथुन - शिवालय (पाली-बिलासपुर)
कामग्रंथों में वर्णित अष्ट मैथुन को मंदिरों की भित्तियों स्थान देने के साथ ही नारी नखशिख शृंगार को भी प्रमुखता से अभिव्यक्त किया गया। उस जमाने में समाज में इतना खुलापन नहीं था जो अष्ट मैथुन जैसे विषय पर सार्वजनिक चर्चा कर सकें। इसे मंदिरों में उत्कीर्ण करवाने पर लोगों ने अवश्य ही इसका लाभ उठाया। मैथुन जैसे गोपनीय कार्य को सावर्जनिक करने पर इसे कौतुहल की दृष्टि से देखा गया और लोग मंदिरों की ओर आकृष्ट हुए। वे पर्यटक जो खजुराहो में मिथुन सौंदर्य देखने जाते हैं उनके लिए छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिरों में दर्शनीय सामग्री भरी पड़ी है। पर्यटकों के लिए मिथुन-मैथुन सर्वकालिक कौतुहल का विषय था और रहेगा। इससे कोई बिरला ही अछूता हो सकता है।

डिस्क्लैमर :- कई पाठकों ने मंदिरों में मिथुन मूर्तियों के निर्माण का उद्देश्य जानना चाहा था, इस आलेख में पाठकों की मंदिरों में मिथुन मूर्तियों के निर्माण के उद्देश्यों के प्रति जिज्ञासा शांत कराने एवं छत्तीसगढ़ के मिथुन शिल्प की जानकारी देने का प्रयास किया गया है। 

कुरुद अंचल का मधुबन धाम

प्रस्तुतकर्ता Unknown मंगलवार, 24 जून 2014 0 टिप्पणियाँ

छत्तीसगढ़ अंचल में फ़सल कटाई और मिंजाई के उपरांत मेलों का दौर शुरु हो जाता है। साल भर की हाड़ तोड़ मेहनत के पश्चात किसान मेलों एवं उत्सवों के मनोरंजन द्वारा आने वाले फ़सली मौसम के लिए उर्जा संचित करता है। छत्तीसगढ़ में महानदी के तीर राजिम एवं शिवरीनारायण जैसे बड़े मेले भरते हैं तो इन मेलों के सम्पन्न होने पर अन्य स्थानों पर छोटे मेले भी भरते हैं, जहाँ ग्रामीण आवश्यकता की सामग्री बिसाने के साथ-साथ खाई-खजानी, देवता-धामी दर्शन, पर्व स्नान, कथा एवं प्रवचन श्रवण के साथ मेलों में सगा सबंधियों एवं इष्ट मित्रों से मुलाकात भी करते है तथा सामाजिक बैठकों के द्वारा सामाजिक समस्याओं का समाधान करने का प्रयास होता है। इस तरह मेला संस्कृति का संवाहक बन जाता है और पीढी दर पीढी सतत रहता है।
मधुबन धाम का गुगल मैप
कुछ स्थानों पर मेले स्वत: भरते हैं तो कुछ स्थानों पर ग्रामीणों के प्रयास से लघु रुप में प्रारंभ होकर विशालता ग्रहण कर लेते हैं। ऐसा ही एक स्थान छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले स्थित कुरुद तहसील अंतर्गत रांकाडीह ग्राम हैं। यहाँ 35 वर्षों से मधुबन धाम मेला फ़ाल्गुन शुक्ल पक्ष की तृतीया से एकादशी तक भरता है। मधुबन धाम रायपुर व्हाया नवापारा राजिम 61 किलोमीटर एवं रायपुर से व्हाया कुरुद मेघा होते हुए 69 किलोमीटर तथा ग्लोब पर  20040’4986” उत्तर एवं 81049’4262” पूर्व पर स्थित है।
मधुबन धाम का रास्ता और नाला
मधुबन लगभग 20 हेक्टेयर भूमि पर फ़ैला हुआ है। इस स्थान पर महुआ के वृक्षों की भरमार होने के कारण मधुक वन से मधुबन नाम रुढ हुआ होगा। यह स्थान महानदी एवं पैरी सोंढूर के संगम स्थल राजिम से पहले नदियों के मध्य में स्थित है। राजिम कुंभ स्थल से हम नयापारा से भेंड्री, बड़ी करेली होते हुए मधुबन धाम पहुंचे। यहाँ पर छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मेले के दौरान संतों के निवास के लिए संत निवास नामक विश्राम गृह बनाया हुआ है। आस पास के क्षेत्र में चूना से चिन्ह लगाए होने अर्थ निकला कि मेले की तैयारियाँ प्रारंभ हो गई हैं।
बोधन सिंह साहू खैरझिटी वाले
विश्राम गृह का अवलोकन करने के पश्चात मेरी मुलाकात खैरझिटी निवासी 82 वर्षीय बोधन सिंह साहू से होती है। राम-राम जोहार के पश्चात उन्हें कुर्सी देने पर वे कहते हैं - 35 वर्षों से मैं मधुबन क्षेत्र में कुर्सी तख्त इत्यादि पर नहीं बैठता। भूमि पर ही बैठता हूँ और नंगे पैर ही चलता हूँ। ईश्वरीय कृपा से आज तक मेरे पैर में एक कांटा भी नहीं गड़ा है।" वे ईंट की मुंडेर पर बैठ जाते हैं और हमारी चर्चा शुरु हो जाती है। मेला जिस जमीन पर भरता है वह जमीन रांकाडीह गाँव की है। मेरे पूछने पर वो कहते हैं कि इस गाँव में कोई भी डीही नहीं है। जिसके कारण इस गांव का नाम रांकाडीह पड़ा हो।
संत निवास मधुबन धाम
मेले के विषय में मेरे पूछने पर कहते हैं कि - " मेरा गांव खैरझिटी नाले के उस पार है। हमारे गांव में गृहस्थ संत चरणदास महंत रहते थे। वे तपस्वी एवं योगी थे। उनके मन आया कि मधुबन में मंदिर स्थापना होनी चाहिए, रांकाडीह के जमीदार से भूमि मांगने पर उसने इंकार कर दिया। इसके पश्चात वे घर लौट आए। एक दिन उनकी पत्नी ने चावल धो कर सुखाया था और गाय आकर खाने लगी। महंत ने गाय को नहीं भगाया और उसे चावल खाते हुए देखते रहे। यह दृश्य देखकर उनकी पत्नी आग बबूल होकर बोली - आगि लगे तोर भक्ति मा। तो महंत ने कहा कि - मोर भक्ति मा आगि झन लगा। मैं हं काली रात 12 बजे अपन धाम म चल दुहूँ। (मेरी भक्ति में आग मत लगा, मैं कल रात 12 बजे अपने धाम को चला जाऊंगा। अगले दिन रात 12 बजे बाद महंत ने बैठे हुए प्राणोत्सर्ग कर दिया। बात आई गई हो गई।
मधुबन धाम के मधुक वृक्ष
बोधन सिंह आगे कहते हैं कि - पहले यह घना जंगल था तथा जंगल इतना घना था कि पेड़ों के बीच से 2 बैल एक साथ नहीं निकल सकते थे। महंत के जाने के बाद यहां पर कुछ लोगों को बहुत बड़ा लाल मुंह का वानर दिखाई दिया। वह मनुष्यों जैसे दो पैरों पर खड़ा दिखाई देता था। देखने वालों ने पहले उसे रामलीला की पोशाकधारी कोई वानर समझा, लेकिन वह असली का वानर था। उसके बाद हम सब गांव वालों ने इस घटना पर चर्चा की। खैरझिटी गाँव में अयोध्या से बृजमोहन दास संत पधारे। उन्होने यहाँ यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की। हम सबने जाकर रांकाडीह के गौंटिया से यज्ञ में सहयोग करने का निवेदन किया तो उन्होने पूर्व की तरह नकार दिया। लेकिन हम सब ने जिद करके यहाँ यज्ञ करवाया जो 9 दिनों तक चला। तब से प्रति वर्ष यहाँ यज्ञ के साथ मेले का आयोजन हो रहा है।
मधुबन धाम के विभिन्न समाजों के मंदिर
रांकाडीह निवासी शत्रुघ्न साहू बताते हैं कि "इस मेले में 11 ग्रामों खैरझिटी, अरौद, गिरौद, कमरौद, सांकरा, भोथीडीह, रांकाडीह, चारभाटा, कुंडेल, मोतिनपुर, बेलौदी के निवासी हिस्स लेते हैं। मेला स्थल पर विभिन्न समाजों के संगठनों ने निजी मंदिर एवं धर्मशाला बनाई हैं। साहू समाज का कर्मा मंदिर, देशहा सेन समाज का गणेश मंदिर, निषाद समाज का राम जानकी मंदिर, आदिवासी गोंड़ समाज का दुर्गा मंदिर, निर्मलकर धोबी समाज का शिव मंदिर, झेरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कोसरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, लोहार समाज का विश्वकर्मा मंदिर,  कंड़रा समाज का रामदरबार मंदिर, मोची समाज का रैदास मंदिर, कबीर समाज का कबीर मंदिर, गायत्री परिवार का गायत्री मंदिर, कंवर समाज का रामजानकी मंदिर, मधुबन धाम समिति द्वारा संचालित उमा महेश्वर एवं हनुमान मंदिर, लक्ष्मीनारायण साहू बेलौदी द्वारा निर्मित रामजानकी मंदिर, स्व: मस्त राम साहू द्वारा निर्मित हनुमान मंदिर स्थापित हैं।"
सरोवर में विराजे हैं भगवान कृष्ण
मधुबन में मेला आयोजन के लिए मधुबन धाम समिति का निर्माण हुआ है, यही समिति विभिन्न उत्सवों का आयोजन करती है। फ़ाल्गुन मेला के साथ यहां पर चैत नवरात्रि एवं क्वांर नवरात्रि का नौ दिवसीय पर्व धूमधाम से मनाया जाता है तथा दीवाली के पश्चात प्रदेश स्तरीय सांस्कृति मातर उत्सव मनाया जाता है, जिसकी रौनक मेले जैसी ही होती है। चर्चा आगे बढने पर बोधन सिंह बताते हैं कि - मधुबन की मान्यता पांडव कालीन है, पाँच पांडव में से सहदेव राजा ग्राम कुंडेल में विराजते हैं और उनकी रानी सहदेई ग्राम बेलौदी में विराजित हैं, यहाँ से कुछ दूर पर महुआ के 7 पेड़ हैं , जिन्हें पचपेड़ी कहते हैं। इन पेड़ों को राजा रानी के विवाह अवसर पर आए हुए बजनिया (बाजा वाले) कहते हैं तथा मधुबन के सारे महुआ के वृक्षों को उनका बाराती माना जाता है।
हनुमान मंदिर एवं यज्ञ शाला
ऐसी मान्यता भी है कि भगवान राम लंका विजय के लिए इसी मार्ग से होकर गए थे। इस स्थान को राम वन गमन मार्ग में महत्वपूर्ण माना जाता है। मेला क्षेत्र के विकास के लिए वर्तमान पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर ने अपने पूर्व विधायक काल विशेष सहयोग किया है। तभी इस स्थान पर शासकीय राशि से संत निवास का निर्माण संभव हुआ। मधुबन के समीप ही नाले पर साप्ताहिक बाजार भरता है। सड़क के एक तरफ़ शाक भाजी और दूसरी मछली की दुकान सजती है। होटल वाले ने बताया कि मेला के दिनों में यहां पर मांस, मछरी, अंडा, मदिरा आदि का विक्रय एवं सेवन कठोरता के साथ वर्जित रहता है। यह नियम समस्त ग्रामवासियों ने बनाया है। यदि कोई इस स्थान पर इनका सेवन करता है तो उसे बजरंग बली के कोप का भाजन बनना पड़ता और विक्रय करने वाले को पुलिस पकड़ लेती है।
शत्रुघ्न साहू मधुबन धाम समिति पदाधिकारी
आस पास से सभी ग्राम साहू बाहुल्य हैं, गावों की कुल आबादी में 75% तेली जाति की हिस्सेदारी है। हम मंदिरों के चित्र लेते हैं, बाजार क्षेत्र में मेले में दुकान लगाने के लिए आबंटन होने से काफ़ी शोर गुल हो रहा था। हनुमान मंदिर एवं यज्ञ शाला के चित्र लेने के पश्चात हम तालाब में स्थित कालिया मर्दन करते हुए श्रीकृष्ण की प्रतिमा का चित्र लेते पहुंचते हैं, तभी वहाँ पर गायों का झुंड आ जाता है, इससे हमारी फ़ोटोग्राफ़ी में चार चाँद लग जाते हैं, कृष्ण प्रतिमा के पार्श्व में गायें चरती हुई दिखाई देती हैं। कृष्ण का गायों के साथ जन्म जन्म का संबंध है। इसलिए गायें भी अपनी भूमिका निभाने चली आती हैं। तालाब में पचरी बनाने का कार्य जारी है। मेले को देखते हुए तैयारियाँ युद्ध स्तर पर हो रही हैं। आगामी फ़ाल्गुन शुक्ल की तृतीया (3 मार्च) से एकादशी (11 मार्च) तक मेला सतत चलेगा। हम मधुबन की सैर करके वापस राजिम कुंभ होते हुए घर लौट आए। 

(डिस्क्लैमर - सभी चित्र एवं लेखन सामग्री लेखक की निजी संपत्ति हैं, इनका बिना अनुमति उपयोग करना कापीराईट के अधीन अपराध माना जाएगा।)

नागमाड़ा सरगुजा : रहस्यमय गुफ़ा

प्रस्तुतकर्ता Unknown शुक्रवार, 20 जून 2014 0 टिप्पणियाँ

लखनपुर/ छत्तीसगढ़ राज्य का सरगुजा अंचल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ अपने गर्भ में ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व के अनेक रहस्य छुपाए हुए है। जो क्रमश: प्रकाश में आते दिखाई देते हैं। ऐसा ही एक स्थान है लखनपुर ब्लॉक के नागमाड़ा की गुफ़ा। लखनपुर से उत्तर पश्चिम दिशा में गुमगरा-भरतपुर मार्ग पर 15 किलोमीटर की दूरी पर सागौन, साल, शीशम, धौरा एवं अन्य प्रजातियों से आच्छादित गुमगरा वन क्षेत्र के सघन वन मध्य नागमाड़ा का प्राकृतिक अनुपम सौंदर्य दिखाई देता है।
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धरती में गुफ़ा की मानिंद एक बड़ी खोह है जिसके ईर्द-गिर्द वृक्षों की लताओं ने अपना मायाजाल रचा है। वृक्षों की जड़ें सर्पाकृति में होने के कारण अदभुत दृश्य उत्पन्न करती हैं। इस गुफ़ा का मुहाना लगभग 7-8 फ़ुट की गोलाई लिए हुए है। इस गुफ़ा में उतरने के लिए वृक्षों की जड़ों का सहारा लेना पड़ता है। वृक्षों की जड़ों से शीतल जल धारा बहती है। जन मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर आता है उसे इस निर्मल जल धारा का जल ग्रहण करना अनिवार्य है। अन्यथा अनिष्ट की आशंका रहती है। अनिष्ट की आशंका के कारण इस स्थान पर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यहाँ की जल धारा का जल ग्रहण करना ही पड़ता है। नागमाड़ा सदियों से आधुनिक मानवों की नजरो से ओझल होकर वनवासियों की धार्मिक आस्था का केन्द्र बना हुआ है। इस गुफ़ा में विभिन्न प्रजातियों के सर्प दिखाई देते हैं, जिनमें, अजगर, नाग (कोबरा) करैत, अहिराज, चिंगराज एवं अन्य जहरीले सर्प प्रमुख हैं। इस गुफ़ा में स्थिल बिलों से ये सर्प झांकते हुए दिखाई देते हैं। जीवन में सुख-शांति एवं समृद्दि की कामना लिए वनवासी यहाँ सर्पों की पूजा करते हैं। शिवरात्रि के विशेष पर्व में वनवासी मेले की शक्ल में यहाँ उपस्थित होकर आराधना करते हैं और नाग देवता को प्रसन्न करते हैं।
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वनवासी कहते हैं कि धार्मिक त्यौहारों के अवसरों पर नागमाड़ा में मुहरी, चांग, एवं डफ़ला प्राचीन वाद्ययंत्र बजने की आवाजें सुनाई देती है, इन वाद्ययंत्रों का उपयोग उनके पूर्वज धार्मिक अनुष्ठानों के अवसरों पर किया करते थे। यह रहस्य है कि इन वाद्ययंत्रों को कौन बजाता है और उनकी आवाज कहाँ से आती है? वाद्ययंत्रों की ये आवाजें वनवासियों में कौतुहल जगा कर अज्ञात की ओर उन्हें खींचती हैं तथा इसी के फ़लस्वरुप यह गुफ़ा धार्मिक आस्था का केन्द्र बनी हुई है।मान्यता है कि इस गुफ़ा में सच्चा एवं शुद्ध प्रकृति का व्यक्ति ही प्रवेश कर सकता है वरना यहाँ निवास करने वाले देव कुपित हो जाते हैं।सदियों से जनमान्यता है इस गुफ़ा में रजस्वला स्त्री के प्रवेश नहीं करना चाहिए। रजस्वला स्त्री के गुफ़ा में प्रवेश करने पर यह जलप्लावित हो जाती है। माड़ा में जल का भराव हो जाता है और गुफ़ा शुद्ध होने पर जल स्वत: ही उतर जाता है। इसलिए वनवासी इस बात का ध्यान रखते हैं उनकी कोई भी परिजन स्त्री माहवारी के समय में नागमाड़ा क्षेत्र में प्रवेश न करे। इस तरह की रोक-टोक वन क्षेत्रों में अन्य दैवीय स्थानों पर सुनाई देती है।
nagamada_lakhanpur
नागमाड़ा की सतह के साथ ही एक लम्बी प्राकृतिक सुरंग है। वनवासी बताते हैं कि उनके पूर्वज एवं बैगा लोग लगभग 1 किलोमीटर लम्बी इस सुरंग के माध्यम से पैदल ही गुमगरा तक का सफ़र तय कर लेते थे। वर्तमान में इस सुरंग में कोई भी प्रवेश नहीं करता क्योंकि जहरीले सर्पों की अधिकता होने से उनके दंश का खतरा हमेशा बना रहता है। क्षेत्रिय जनों की माँग है कि इस महत्वपूर्ण स्थान का संरक्षण एवं संवर्धन होना चाहिए। वनक्षेत्र में और अधिक पौधा रोपण एवं बाड़ इत्यादि से घेरा करके इस प्राकृतिक दर्शनीय स्थल का सौंदर्यवर्धन किया जा सकता है।
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त्रिपुरारी पाण्डेय
(पत्रकार लखनपुर सरगुजा)

राजिम कुंभ में सैलानी

प्रस्तुतकर्ता Unknown सोमवार, 24 फ़रवरी 2014 0 टिप्पणियाँ

चित्रोत्पला गंगा महानदी, सोंढूर और पैरी नदी के त्रिवेणी संगम पर माघ पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मेला भरता है तथा इस मेले का समापन शिवरात्रि को होता है। भारत में तीन नदियों के संगम स्थल को पवित्र माना जाता है, यहाँ लोकमान्यतानुसार धार्मिक कर्मकांड सम्पन्न कराए जाते हैं। राजिम त्रिवेणी संगम में मेले का आयोजन कब से हो रहा है इसकी कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती पर सन 2000 में इसका सरकारीकरण हो गया। फ़िर 2004 में भाजपा की सरकार सत्ता में आने के बाद इसे कुंभ का नाम दे दिया गया। जिससे स्वस्फ़ूर्त पारम्परिक आयोजन सरकारी आयोजन में बदल गया। इसके साथ ही माने हुए साधू संतों का आगमन प्रारंभ हो गया। धार्मिक कथा-प्रवचनों के आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी जन मनोरंजार्थ होने लगा। धीरे-धीरे राजिम मेला कुंभ में परिवर्तित हो गया।
राजिम कुंभ समिति सचिव गिरीश बिस्सा
कुंभ के आयोजन की तैयारियाँ एक माह पूर्व प्रारंभ हो जाती हैं, कुंभ में समन्वय स्थापित करने के लिए शासन के अधिकारियो के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों को मिलाकर एक आयोजन समिति का निर्माण किया जाता है। कुंभ का संचालन एवं आगतों की आवास, भोजन एवं सुरक्षा की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है। कुंभ में हजारों साधू-संत जुटते हैं जिनकी व्यवस्था करने के लिए समिति वालों को दिन रात एक करना पड़ता है साथ ही विशेष ध्यान रखा जाता है कि कहीं अव्यवस्था न फ़ैले। लोग मेला देखने जाते हैं और घूम फ़िर कर मनोरंजन करके चले आते हैं पर उन्हें पता नहीं रहता कि इस भव्य आयोजन के पार्श्व में दिन-रात मेहनत करने वाले कौन लोग हैं। राजिम कुंभ के सचिव के रुप में गिरीश बिस्सा 10 वर्षों से आयोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, सहयोग करने के लिए इनके साथ कर्मचारियों का बड़ा अमला है, जिससे कार्यों का निष्पादन होता है।
राजिम कुंभ में उदय भैया
बचपन में देखा था कि मेला प्रारंभ होने के एक सप्ताह पहले से ही बैल गाड़ियों का रेला प्रारंभ हो जाता है। लोग अपना खाना दाना लेकर हफ़्ते या पखवाड़े भर मेले में ठहरने की व्यवस्था करके आते थे। अब वे बैलगाड़ियां कहीं दिखाई नहीं देती, वर्तमान में आवागमन के आधुनिक साधन होने के कारण लोग सुबह मेले में आते और रात तक लौट जाते हैं। मैने मेले का पैदल ही भ्रमण किया। मेले में मनोरंजन से लेकर खाने-पीने की वस्तुओं की दुकानों के साथ खिलौने, दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं तथा महिलाओं द्वारा खरीदी जाने वाली श्रृंगार सामग्री का विशेष आकर्षण दिखाई दिया। नदी  की रेत में मुरम की अस्थाई सड़क बना कर तत्कालिक नगर बसाया गया है। 
संत नगर
लोमश ॠषि आश्रम में गत वर्ष नागा साधुओं एवं स्थानीय साधुओं के बीच मारपीट और हंगामें की खबर सामने आई थी। इस वर्ष नागाओं को लोमश ॠषि आश्रम में स्थान नहीं दिया गया। सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस की व्यवस्था की गई थी। लोमश ॠषि आश्रम से मेले का विशाल दृश्य दिखाई देता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर में दर्शनार्थियों की लाईन लगी हुई थी। मंदिर के समीप ही नागलोक की प्रदर्शनी लगाई गई है। इसके साथ ही इस तरह की अन्य पाँच प्रदर्शनियाँ भी लगी हैं, इनको जंगल सफ़ारी, स्वर्ग नर्क इत्यादि नाम दिए गए हैं। 
नाग लोक की झांकी
हम नागलोक की प्रदर्शनी देखने पहुंचे। प्रदर्शनी में लाईट एवं साऊंड के संयोजन से जीवंत प्रभाव उत्पन्न किया गया है, द्वार टिकिट लेने वालों की लाईन लगी हुई थी। प्रवेश द्वार पर चिखली दुर्ग निवासी प्रकाश वैष्णव से मुलाकात होती है, इस प्रदर्शनी के वे मालिक हैं। पूछने पर कहते हैं कि - इस वर्ष मेलें कम ही लोग आए, उम्मीद से कम कमाई हो रही है। प्रदर्शनी बनाने में 1 लाख रुपया लग जाता है, फ़िर कर्मचारियों एवं बिजली का खर्च अलग देना पड़ता है साथ ही ट्रांसपोर्टिंग का खर्च पहले से अधिक हो गया है। ऐसी स्थिति में अगर 3 लाख रुपए से कम आवक हुई तो खा-पीकर सब बराबर हो जाता है।" इस कुंभ में वे 10 वर्षों से लगातार झांकी लगा रहे हैं, पहले एक ही झांकी होने से अच्छी आमदनी हो जाती थी, लेकिन अब झांकियों की संख्या बढने से आमदनी में कमी हो गई।
नाग लोक में नाग कन्याओं का सुवा नृत्य 
झांकियों का विषय धार्मिक रखा जाता है। जिसमें देवी देवताओं की फ़ाईवर की मूर्तियाँ लगाई जाती हैं, जिसे बिजली की मोटरों द्वारा संचालित करके झांकियों में जीवंत प्रभाव उत्पन्न किया जाता है। इसके बाद हमने जंगल सफ़ारी नामक झांकी का अवलोकन किया। जिसमें जंगल के जानवरों को दिखाया गया है। कहानी में जंगल के जानवर बैठक करके सशरीर स्वर्ग जाना चाहते हैं तथा इसके लिए वे गणेश जी एवं महादेव से विनती करते हैं। इसके पश्चात अनुमति मिलने पर वे स्वर्ग पहुंच कर मेनका, रंभा, उर्वशी नामक अप्सराओं के संग नृत्य करते दिखाई देते हैं। ग्रामीणों के स्वस्थ मनोरंजन का यह उत्तम उपाय है तथा इसे देख कर बच्चे भी रोमांचित होते हैं।
मुफ़्त में तारामंडल दर्शन
कुलेश्वर मंदिर के समीप ही एक स्थान पर लम्बी लाईन लगी हुई थी, देखने पर पता चला कि संस्कृति विभाग की तरफ़ से यहाँ पर मुफ़्त तारामंडल दिखाया जा रहा है। बड़ी संख्या में महिलाएं सौंदर्य प्रसाधन के सामान खरीदती दिखाई दे रही थी। मुख्य मंडप की तरफ़ बढने पर चश्मे की दुकान लगाए सुनील वंशकार से मुलाकात होती है। ये जबलपुर से मेले में दुकानदारी करने आए हैं। पूछने पर बताया कि - इस वर्ष मेले में कम लोग आए हैं, आसाराम बापू का कार्यक्रम होता था तो मेले में उनके शिष्यों की अधिक भीड़ होने से अच्छी कमाई हो जाती थी। उनके जेल जाने की वजह से कार्यक्रम नहीं हो पाया।" आगे कहते हैं कि -" वो अपराधी है कि नहीं यह तो न्यायालय तय करेगा, परन्तु उनके समर्थकों के आगमन से हमारी तो अच्छी कमाई हो जाती थी।"
गोदना गोदवा ले न……
चश्मे वाले समीप ही गोदना की दुकान सजी हुई है, यहाँ भिन्न-भिन्न तरह के गोदने के डिजाईन दिखाई दे रहे थे। इस दुकान के मालिक कलीम हैं। पूछने पर पहले तो अपना नाम लल्लू बताते हैं फ़िर कहते हैं कि "मेरा नाम कलीम है। फ़ाफ़ामऊ से आया हूँ और राजिम कुंभ में सन 2000 से प्रतिवर्ष आ रहा हूँ।" आमदनी के विषय पर पूछने पर कहते हैं कि "अबकि बार आमदनी कुछ कम ही है, ले-देकर दैनिक खर्च निकल रहा है।" गोदना करना इनका पारम्परिक पेशा है, पहले इनके पिता जी करते थे 1991 से अब इन्होने अपना पुस्तैनी धंधा अपना लिया। ये वर्ष भर मेलों में घूम कर रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। जिससे बच्चों का लालन पालन हो सके। इनका सारा समय मेलों और यात्राओं में बीत जाता है। दो महीने बस घर में रहते हैं।
मुख्य मंच राजिम कुंभ
मेलों के विषय में पूछने पर ये बताते हैं कि " हमारी यात्रा जेठ के महीने में अभार माता छतरपुर मेले से प्रारंभ होती है, फ़िर मंडौर ललितपुर का मेला करते हैं। सावन में सोनभ्रद शिवद्वार का मेला 1 महीने चलता है, भादो में काशी धाम बनारस चले जाते हैं। कार्तिक में रायपुर बंजारीधाम,  अगहन में बाराबंकी का महादेवा मेला, पूष में गोरखनाथ का मेला गोरखपुर, मकर संक्राति के खिचरी तिहार के बाद छत्तीसगढ़ आ जाते हैं जिसमें राजिम कुंभ, शिवरीनारायण मेला के पश्चात चैत्र नवरात्र में कामाख्याधाम गाजीपुर चले जाते हैं, यह मेला नवरात्र में एक महीने चलता है फ़िर दो महीना आराम करते हैं और फ़िर यही कार्यक्रम शुरु हो जाता है।
खैनी बनाओ और खाओ
गोदना से रक्त जनित बीमारियाँ फ़ैलने के विषय में कहते हैं कि - मैं पूरा ध्यान रखता हूँ कि इसके द्वारा एच आई वी न फ़ैले। गोदना से पहले डेटाल लगाता हूँ, एक गोदना गोदने के बाद मशीन की सुईयां बदल देता हूँ तथा रीगल कम्पनी की सुइयों का ही प्रयोग करता हूँ, इस मशीन से गोदना करने पर खून नहीं निकलता है, स्याही सिर्फ़ त्वचा की पहली परत के नीचे तक ही जाती है। साथ ही गोदना करने के बाद हल्दी लगा दी जाती है। हल्दी सबसे बड़ी एन्टीबायोटिक है। यह हमारा खानदानी पेशा है, इसलिए सारी सावधानी बरती जाती है। इस बातचीत के मध्य एक लड़की गोदना गोदाने के लिए आ जाती है। वह अपने हाथ में सिर्फ़ अंग्रेजी के दो अक्षर "P k" लिखवाती है और पुरा नाम लिखवाने की बजाए संकेत से ही काम चलाती है।
उखरा वाली
राजिम के मेले में "उखरा" बेचने वाले प्रतिवर्ष आते हैं, मेले की यही खई-खजानी है। धान की लाई को गुड़ या गन्ना रस में सान कर उसे मीठा कर दिया जाता है, पहले तो आठ आने में बहुत सारी मिल जाती थी। लेकिन अब इसका छोटा पैकेट 10 रुपए और बड़ा पैकेट 20 रुपए में मिलता है। शकुंतला ने उखरा की दुकान लगा रखी है। कहती है कि - मंहगाई बहुत बढ गई है। इसलिए उखरा का भी दाम बढाना पड़ा। वरना मुद्द्ल भी निकालना कठिन है। उसके बच्चे दुकान के आस पास ही घूम रहे हैं। साथ ही एक ढिमरिन चना बेच रही है। कुल्फ़ी, आईसक्रीम, गन्ना रस, चाट पकौड़ी, मिठाई, खिलौनों इत्यादि की दुकाने सजी हुई है। सभी को मेले से आमदनी की प्रतीक्षा है।
खिलौनों की दुकान
पहले मेले में गिलट के आभुषणों की दुकाने खूब दिखाई देती थी। लेकिन अब दिखाई नहीं दी, लगता है अब इनका चलन कम हो गया है। इनका स्थान आर्टिफ़िसियल ज्वेलरी ने ले लिया है। लोहार के बनाए हुए खेती एवं घरेलू उपरकर्णों की दुकाने भी नदारत हो गई है। सिर्फ़ चौकी बेलना बेचता हुआ एक बढई दिखाई दिया। एक स्थान पर दारु पीकर झगड़ा करता हुआ रामकंद बेचने वाला दिखाई दिया। आस पास के दुकानदारों ने कहा कि इससे वे बहुत परेशान हैं। सुबह से शाम तक पिए रहता है और दुकानदारों से रार करते रहता है।
डोर पर जिन्दगी
अब हम संतों के मंडप की तरफ़ पहुंचे, यहाँ पर एक लड़की रस्सी पर चलकर संतुलन साधने वाला खेल दिखा रखी थी। नटों का यह परम्परागत पेशा है। तरह तरह के करतब दिखा कर जीविकोपार्जन करते हैं। हजारों साल से ये कौतुक दिखाने का पेशा चला आ रहा है। राजे रजवाड़ों के खत्म होने के बाद इन्हें मेले-ठेलों में प्रदर्शन करना पड़ता है, वरना इन नटों को राजाश्रय प्राप्त होता था और राजपरिवार के मनोरंजन के लिए सदैव उपलब्ध रहते थे। छोटी सी लड़की बांस को गले में लटकाए सिर पर कलश रखे रस्सी पर चलकर संतुलन साध रही थी, नीचे बिछे हुए तौलिए पर लोग इच्छानुसार पैसे डाल रहे है जिन्हें उसकी माँ सकेल रही थी।
व्यवस्थाओं में व्यस्थ प्रताप पारख
संतों के कुंभ स्नान करने के लिए नदी की रेत को हटा कर विशाल जल कुंड तैयार किया गया है। इसके प्रवेश द्वार पर मंत्री द्वय के फ़्लेक्स लगे हैं। कुछ स्नान कर रहे थे तो कुछ लोग किनारे बैठ कर खैनी घिस रहे थे। अखाड़ों के संतों महंतो को डोम बना कर दिए गए हैं, जिसके पास जितनी बड़ी फ़ौज है, उसके डोम उतने ही बड़े हैं। संस्कृति विभाग के कर्मचारी इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में लगे हुए दिखाई दिए। एक स्थान पर प्रताप पारख से मुलाकात होती हैं। संतों के अस्थाई नगर के बीच कुंभ में आने वाली विशिष्ट लोगों के लिए चायपानी की व्यवस्था की गई है। इसकी जिम्मेदारी शिवनंदन दूबे मुस्तैदी से निभा रहे हैं। मंच पर कार्यक्रम प्रस्तुति की जिम्मेदारी राकेश तिवारी, युगल तिवारी संभाल रहे हैं तथा सतपाल, समीर टल्लू, सुधीरे दुबे, प्रमोद पाण्डे कुंभ की व्यवस्था संभालने में सक्रीय हैं।
शंकराचार्य मंडप
लोमश ॠषि आश्रम के पास ही नागा साधुओं का डेरा लगा हुआ है, भभूत रमाए नंग धंड़ग साधू मेलार्थियों को आकर्षित करते हैं। धूने की अग्नि सिलगाए चिलम से धुंआ उड़ाते दिखाई देते हैं। मै जब इनके टोले में पहुंचा तो एक युवा नागा साधू ने करतब दिखाना शुरु किया। पहले अपने लिंग को एक डंडे पर लपेट लिया फ़िर उस डंडे पर दोनो तरफ़ एक एक साधू को खड़ा कर दिया, लोग दांतों तले अंगुली दबा कर इस कौतुक को देख रहे थे। फ़िर कहने लगा कि - इसे कहते हैं पावर, है कोई जो यह कर सके। इस तरह उसने कई करतब दिखाई और इसके बाद उदय मुझसे कई तरह के सवाल करता और रास्ते भर पैदल चलते हुए मैं उसकी शंकाओं का समाधान करते रहा। इसके पश्चात हम चाय की तलब पूरी करने टेंट में आ गए।
कुलेश्वर महादेव में दर्शनार्थी एवं पुलिस व्यवस्था
चाय पानी के पश्चात दिन ढलने लगा, मौसम भी कुछ नरम बना हुआ था, बदलियों से लग रहा था कि कभी भी बरस सकती हैं। अगर बरसात होती है तो इतने सारे लोगों को सिर छुपाने के लिए जगह तलाशनी पड़ेगी। मुख्य प्रवेश द्वार के समीप गीता प्रेस गोरखपुर वालों का स्टाल लगा है। साथ ही आर्युवेदिक दवाई वाले तथा ज्योतिष भी मेले का लाभ उठा रहे हैं। पुलिस की पैट्रोलिंग करती गाड़ियाँ एवं बैरिकेट के समीप कंट्रोम रुम से सुरक्षा पर नजर गड़ाए अधिकारी दिखाई देते हैं। इस बीच संतों की कलश यात्रा आती दिखाई देती हैं, मैं कैमरे से 2-4 चित्र लेता हूँ, एक परसुधारी संत मुझे फ़ोटो लेते हुए देखकर अपने मंडप में मिलने के लिए कहते हैं, शायद उन्हें फ़ोटुओं की जरुरत होगी। लेकिन मेरे पास इतना समय नहीं था कि उनसे मंडप में मिलने जाऊं।
कुछ माला मुंदरी हो जाए मेला कि निशानी
पूजा की सामग्री बेचने वालों की दुकाने सजी हैं, इसमें कुछ लोग इलाहाबाद, प्रयाग, मालवाचंल के खंडवा निमाड़ क्षेत्र, बनारस इत्यादि से आए हुए हैं। राजिम कुंभ विशेषता यह है कि जिस स्थान पर लगता है वहां तीन जिलों की सीमाएं मिलती हैं, एक तरफ़ लोमश ॠषि आश्रम धमतरी जिले में है तो दूसरी तरफ़ राजीव लोचन मंदिर गरियाबंद जिले में आता है और नयापारा नगर रायपुर जिले में। तीन जिलों के प्रशासन के संयुक्त प्रयास से ही राजिम कुंभ का सफ़ल आयोजन होता है। संस्कृतियों, धर्मों, पंथों एवं मेलानुरागियों का मिलन क्षेत्र अब राजिम कुंभ बन गया है। समन्वित सहयोग एवं प्रयास से ही यह भगीरथ कार्य सम्पन्न होता है।

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सिंघा धुरवा

प्रस्तुतकर्ता Unknown बुधवार, 3 अप्रैल 2013 4 टिप्पणियाँ


बार-नवापारा के जंगल में कांसा पठार एवं रमिहा पठार के बीच में हटवारा पठार स्थित है। इस पठार को सिंघाधुरवा कहा जाता है। मान्यता है कि जंगल में स्थित पठार पर वन देवी चांदा दाई का वास है। यहाँ तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक रास्ता ग्राम अवंरई होकर जाता है तथा दूसरे रास्ते से सघन वन से होकर नाले को 7 बार पार करने के पश्चात पहुंचा जाता है। इस पहाड़ी पर प्राचीन किले के अवशेष मिलते हैं तथा वन में बस्ती के अवशेष मिलते हैं। जहाँ पर प्राचीन ईंटों से बनी संरचना धरती की सतह पर दिखाई देती है। हो सकता है कि यहाँ प्राचीन काल में कोई नगर या बसाहट रही होगी। ईंटों का आकार वही है जैसा सिरपुर में उत्खनन  के दौरान प्राप्त हुई हैं। यहाँ की भौगौलिक स्थिति से प्रतीत होता है कि यह कोई राजधानी रही होगी। जो वर्तमान में प्रकाश में नहीं आई है।
सिंघा धुरवा  का गुगल चित्र
ग्रामीणों से सिंघा धुरवा के विषय में चर्चा करने पर एक किंवदंती सुनने  में आई। कहते हैं  कि इस किले में कोई "चोरहा राजा" निवास करता था। जो अमीरों को लूटकर उनका माल-असबास और धन गरीबों में बांटता था। अर्थात राबिन हुड जैसा ही कोई पात्र था। "चोरहा राजा" की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वह पाँव-पाँव जाता था और पाँव-पाँव ही लौटता था। उसके पैरों के चिन्ह आते हुए के तो दिखते थे परन्तु लौटते हुए के पद चिन्ह नजर नहीं आते थे। वह इतना सिद्धहस्त था कि अपने पैरों के पड़े हुए चिन्हों पर उल्टा लौटता था, जिसके कारण उसके लौटते हुए के पदचिन्ह नजर नहीं आते थे और पकड़ा नहीं जाता था। किंवदंतियों के मूल में भी कुछ सच होता है बस जरुरत होती है सच पर सदियों के लगे गर्द को झाड़ने की।
सिरपुर का गुगल दृश्य
इसके लिए हमें इतिहास की ओर मुड़ना होगा। वर्तमान छत्तीसगढ याने प्राचीन दक्षिण कोसल के इतिहास में शरभपुरीय वंश का जिक्र आता है। शरभपुरियों की 8 पीढियों ने 11 दशकों तक शासन किया था। इन्होने अपने अधिकांश ताम्रपत्र शरभपुर से जारी किए हैं। जाहिर है कि शरभपुर इनकी राजधानी रही होगी। लेकिन अभी तक शरभपुर की पहचान नहीं हो पाई है कि शरभपुर कहाँ पर स्थित था। शरभपुरियों का शासन का सही काल निर्धारण नहीं हो पा रहा है क्योंकि इन्होने अपने ताम्र अभिलेखों में सन् या संवत का प्रयोग नहीं किया है। इन्होने न ही अपना नया संवत जारी किया और न ही गुप्त संवत का प्रयोग किया। शरभपुरीयों की यह बहुत बड़ी चूक है जिसके कारण उनका काल निर्धारण नहीं हो पा रहा है। प्रसिद्ध इतिहासकार स्व: श्याम कुमार पाण्डेय इनका शासनकाल 342 ईं से प्रारंभ मानते वहीं पी.एल.मिश्रा 470 ईं वी मानते हैं।

सिंघा धुरवा के द्वार का पुराना चित्र  
शरभवंश का संस्थापक शरभराज को माना जाता है। कहते हैं ये स्थानीय थे, जो पहले वाकाटक राजाओं के अधीन सामंत रहे। फ़िर वाकाटक राजाओं के आपसी झगड़े का लाभ उठाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफ़ल रहे। शरभपुरीय वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, ताम्रपत्र में इन्होने ने स्वयं को परमभागवत अंकित किया है। शरभपुरियों की राजमुद्रा गजलक्ष्मी थी, इसे ताम्रपत्रों एवं सिक्कों में अंकित किया गया है। ताम्रपत्रों के माध्यम से राजा दान देता था जिससे इनके इतिहास का पता चलता है। शरभपुरीय शासक जयराज ने अपने नाम के आगे "महा" लगाकर "महागजराज" नाम का प्रयोग किया। इसके बाद के शासकों ने अपने नाम के साथ "महा" शब्द का प्रयोग किया। यथा महादुर्गराज, महासुदेवराज, महाप्रवरराज, आदि आदि।
सिंघा धुरवा की पहाड़ी पर ब्लॉगर
शरभपुरीय वंश के शासक नरेन्द्र का ताम्रपत्र पीपरदुला (सारंगढ) से प्राप्त होता है जिससे ज्ञात होता है कि वह शरभराज का पुत्र था। यह दान पत्र शरभपुर से जारी किया गया है। शरभपुरीय राजवंश के शासकों द्वारा अधिकांश ताम्रपत्र, सिक्के शरभपुर से जारी किए गए हैं। इनके सिक्कों पर प्राकृत भाषा के स्थान पर संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। नरेन्द्र ने अपने शासन काल में कुरुद (महासमुंद) से अपने शासन काल के 24 वें वर्ष में ताम्रपत्र जारी किया। इससे प्रतीत होता है कि इसने दीर्घकाल तक समृद्धिपूर्वक शासन किया। इसका शासन छत्तीसगढ के विशाल भू-भाग के अलावा वर्तमान उड़ीसा के कुछ भू-भाग पर भी था। नरेन्द्र  के पश्चात प्रसन्न मात्र गद्दी पर बैठा। इसका नरेन्द्र से संबंध ज्ञात नहीं होता। उड़ीसा के कटक क्षेत्र से लेकर महाराष्ट्र के चांदा तक प्रसन्न मात्र के सोने के सिक्के प्राप्त होते हैं।
सिंघा धुरवा के द्वार की वर्तमान स्थिति
प्रसन्न मात्र की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र जयराज सिंहासनारुढ हुआ। इसके बाद मानमात्र गद्दी पर बैठा। इसके पुत्र महासुदेवराज के ही सबसे अधिक 8 ताम्रपत्र प्राप्त होते हैं। जिनमें 6 शरभपुर से और 2 सिरपुर से जारी किए गए हैं। अनुमान है कि शरभपुरियों ने शरभपुर के पश्चात अपनी राजधानी सिरपुर विस्थापित की हो। सुदेवराज का आरंग पर अधिकार था इसलिए राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से सिरपुर को दूसरी राजधानी बनाया गया  हो।  सुदेवराज के पश्चात उसका छोटा भाई प्रवरराज शासक हुआ। उसने शरभपुर के स्थान पर अपने भाई द्वारा स्थापित सिरपुर को राजधानी बनाया। उसने ताम्रपत्रों में अपने को  मानमात्र का पुत्र बताया है। इसने अपने भाई व्याघ्रराज को  सिरपुर में सर्वराकार  के रुप में नियुक्त कर दिया। डॉ श्याम कुमार पाण्डेय के अनुसार 510 से 515 ईस्वी के बीच शरभपुरीय राजवंश का अवसान हो गया। पाण्डुवंशियों से शरभपुरियों के निर्णायक युद्ध में कोसल से इनका शासन समाप्त हो गया।
सिंघा धुरवा पर प्रतिमावशेष
शरभपुर की पहचान पर इतिहासकार एक मत नहीं हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम ने प्रथम महाराष्ट्र के वर्धा जिले आर्वी को फ़िर सम्बलपुर को शरभपुर माना। रायबहादुर हीरालाल ने श्रीपुर को ही शरभपुर बताया। पं लोचनप्रसाद पाण्डेय ने इसे उड़ीसा के शरभगढ से जोड़ा। एम जी दीक्षित इसे सिरपुर के समीप ही मानते हैं। डॉ श्याम कुमार पाण्ड़ेय के अनुसार मल्हार ही  शरभपुर है। डॉ पीएल मिश्रा सिरपुर के आस-पास ही शरभपुर मानते हैं। डॉ विष्णु सिंह ठाकुर सिरपुर के पास ही शरभपुर मानते हैं। अरुण कुमार शर्मा ने गत वर्ष संस्कृति विभाग द्वारा  आयोजित सेमिनार में कहा था कि हमने शरभपुर ढूंढ लिया है वह सिरपुर के पास ही जंगलों में है। सिंघाधुरवा को डॉ एल एस निगम शरभपुर नहीं मानते।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के साथ प्रसन्नता के पल
सिंघाधुरवा के शरभपुर होने न होने पर विद्वानों में मत भिन्नता है। लेकिन इस इलाके की भौगौलिक स्थिति एवं वहाँ बिखरी हुई पुरातात्विक सामग्री को देखते हुए यह तो तय है कि यह कोई महत्वपूर्ण प्राचीन नगरी रही होगी। इसके साथ ही किंवदंतियों एवं ग्रामीणों द्वारा सिंघाधुरवा की पहाड़ी के नीचे की संरचनाओं को हटवारा एवं किसबिन डेरा कहना यह साबित करता है  कि कभी यह इलाका आबाद था। जहाँ बाजार लगता था और गृहस्थी के उपयोग की वस्तुओं की खरीदी बिक्री होती थी। सिंघा धुरवा की पहाड़ी पर स्थित द्वार इसका प्रमाण हैं कि कभी यहाँ पर किसी ने अपनी सुरक्षा के लिए गढ का निर्माण किया था। उस काल में गढ का निर्माण भी वही करेगा जो शासक होगा। जिस तरह से शरभपुरियों  ने सिरपुर एवं शरभपुर दोनो स्थानों से ताम्रपत्र जारी किए उसे देखते हुए  अनुमान है कि यही शरभगढ हो सकता है। इसकी प्रमाणिकता उत्खनन में प्राप्त सामग्री एवं अभिलेखों से ही सिद्ध होगी। तब तक शरभपुर इतिहास के नक्शे से गायब ही रहेगा। पर्यटन की दृष्टि से यह स्थान मनोरम है, एक बार यहाँ पंहुचने पर बार बार आने को मन करता है।

राजिम: आस्था का केन्द्र पाँचवा कुंभ

प्रस्तुतकर्ता Unknown बुधवार, 6 फ़रवरी 2013 2 टिप्पणियाँ


छत्तीसगढ़  की राजधानी रायपुर से दक्षिण दिशा में 45 किमी की दूरी पर चित्रोत्पला गंगा (महानदी), सोंढूर एवं पैरी नदी के संगम तीर पर स्थित राजिम नगरी का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व सर्वविदित है। प्रत्येक माघ मास की पूर्णिमा से फ़ाल्गुन मास की शिवरात्रि अनादि काल से यहाँ मेले का आयोजन होता रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण होने के पश्चात मेले का विस्तार करने के दृष्टि से इसका आयोजन सरकारी तौर पर किया जाने लगा। भाजपा सरकार द्वारा सन 2005 से मेले को राजिम कुंभ का नाम देकर विस्तार दिया गया। सम्पूर्ण भारत से साधु सन्यासी एवं तीर्थ यात्री त्रिवेणी संगम पर पहुंच कर पवित्र तीर्थ नगरी में स्नान  पुण्यार्जन एवं ज्ञानार्जन के लिए पहुंचने लगे। वर्तमान में राजिम कुंभ भूलोक में विख्यात हो चुका है तथा प्रतिवर्ष कुंभ का विशाल आयोजन किया जा रहा है। राजिम कुंभ साधु संतों  के प्रवचन, शंकराचार्यों के आगमन द्वारा हरिद्वार, नासिक, इलाहाबाद व उज्जैन के चार कुंभों के पश्चात पाँचवे कुंभ के रुप में प्रचारित  हो रहा है।
राजीव लोचन मंदिर
वर्तमान में राजिम कुंभ क्षेत्र महानदी, सोंढू एवं पैरी के त्रिवेणी संगम पर स्थित होने के साथ तीन जिलों रायपुर, गरियाबंध एवं धमतरी, तीन विधानसभा क्षेत्रों राजिम, अभनपुर, कुरुद की सीमा में सम्मिलित है। राजिम के त्रिवेणी संगम नदी में पूरे प्रदेशभर से लोग पुण्य स्नान, तर्पण, मुंडन, दर्शन पूजन इत्यादि संस्कारों एवं धार्मिक कर्मों को सम्पन्न करने के लिए आते हैं। अनुमान है कि माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक चलने वाले राजिम कुंभ में 30 लाख श्रद्धालु मेला क्षेत्र में एकत्रित होते हैं। श्रद्धालुओं के बड़ी संख्या में आगमन को देखते हुए लगभग 5 किमी के क्षेत्र में मेला की व्यवस्था की जाती है। राजिम क्षेत्र का पौराणिक महत्व है। यह पद्म क्षेत्र के साथ पद्मावती नगरी के नाम से शास्त्र वर्णित है। 
अलंकृत मंडप द्वार
 राजिम कुंभ क्षेत्र का मुख्य मंदिर राजीव लोचन मंदिर है। इसके ईर्द-गिर्द व्यावसायियों ने कब्जा करके मुल रुप को छुपा दिया था।। दुकानों के बीच से होकर मंदिर में प्रवेश करना पड़ता था। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। इस मंदिर परिसर से अवैध कब्जा हटाने का एतिहासिक कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल के तत्कालीन अधीक्षण डॉ प्रवीणकुमार मिश्रा ने किया। आज राजीव लोचन मंदिर अपने पुराने रूप के करीब पहुँच चुका है। राजीव लोचन मंदिर महानदी (चित्रोत्पला गंगा) के पूर्वी तट  पर स्थित है। लोक मान्यता है कि  महानदी के त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से मनुष्य के सारे कष्ट मिट जाते हैं और वह मृत्युपरांत विष्णु लोक को प्राप्त करता है। यहाँ का कुम्भ मेला जग प्रसिद्ध हो चुका है, यह मेला माघ मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। मान्यता है कि  जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक राजिम की यात्रा न कर ली जाए।
त्रिवेणी संगम स्थित कुलेश्वर महादेव
महाशिव तीवरदेव के ताम्रपत्र एवं राजीव लोचन मंदिर से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि  राजिम के विष्णु मंदिर (राजीव लोचन) का निर्माण 8 वीं सदी में नलवंशी राजा विलासतुंग ने कराया था। शिलालेख में रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजल्यदेव प्रथम और रत्नदेव द्वितीय की कुछ विजयों का उल्लेख है। उनके सामंत (सेनापति) जगतपालदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर क्षेत्र में पश्चिम दिशा से प्रवेश करने पर सबसे पहले राजेश्वर एवं दानेश्वर मंदिर दिखाई देते हैं। इन मंदिरों के सामने राजीवलोचन का भव्य प्रवेश द्वार महामंडप है। इसकी चौखट के शीर्ष भाग में शेषशैया पर विष्णु भगवान विराजमान हैं लतावल्लरियों के मध्य विहाररत यक्षों की विभिन्न भाव भंगिमाओं एवं मुद्राओं में प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गयी हैं। बायीं दीवाल के स्तम्भ पर एक पुरुष की खड़ी प्रतिमा है, जिसका एक हाथ ऊपर है तथा दूसरा हाथ ह्रदय को स्पर्श कर रहा है। कमर पर कटार एवं यज्ञोपवित धारण किए हुए है। 
राम मंदिर की मिथुन मूर्तियाँ
पुरुष मूर्ति के दोनों तरफ नारियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। एक मूर्ति स्त्री और पुरुष की युगल है। इसमें पुरुष स्त्री से छोटा दिखाया गया है, वह हाथ में सर्प धारण किये हुए है। लोग इसे सीता की प्रतिमा मानते हैं पर सर्प के साथ पुरुष काम का प्रतीक है, इसलिए इसे रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका की प्रतिमा माना जा सकता है। इसके साथ ही यहाँ पर आकर्षक मिथुन मूर्तियाँ भी दिखाई देती है। इनके वस्त्र अलंकरण भी नयनाभिराम हैं। अंतराल में ललाट बिम्ब पर गरुडासीन विष्णु की प्रतिमा है। महामंडप एवं मुख्य मंदिर के बीच अन्तराल है। यह मंदिर पंचायतन द्वविड़ शैली में बना हुआ है। विशाल प्रांगण के चारों  कोनो में अन्य मंदिर भी स्थापित हैं।
राजिम कुंभ
मुख्य मंदिर आयताकार प्रकोष्ट के बीच में निर्मित है। भू विन्यास योजना में राजिम का मंदिर महामंडप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा मार्ग में बंटा हुआ है। गर्भ गृह में प्रवेश करने के लिए पैड़ियों पर चढ़ना पड़ता है। सामने ही एक स्तम्भ पर पूर्वाभिमुख गरुड़ विराजमान है। सामने काले पत्थर की बनी चतुर्भुजी विष्णु की मूर्ति है। जिसके हाथो में शंख, गदा, चक्र एवं पद्म दिखाई देते है। इसे ही भगवान राजीवलोचन के नाम से जाना जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। बायीं भीत पर दो शिलालेख लगे है, इनसे ही इस मंदिर के निर्माताओं एवं जीर्णोद्धारकर्ताओं की जानकारी मिलती है। राजीव लोचन की नित्य पूजा क्षत्रिय करते है, विशेष अवसरों पर ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है। इस मंदिर के उत्तर में जगन्नाथ मंदिर है। इसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के वामन अवतार की प्रतिमा लगी है। जिसमें तीसरा पग राजा बलि पर के शीश पर रखते हुए विष्णु को दिखाया है। राजीवलोचन मंदिर के महामंडप में बायीं तरफ़ बुद्ध की प्रतिमा है जो वर्तमान में  सामंत जगतपाल के रुप में पुजित है।
नागा साधु
राजीव लोचन मंदिर से बस्ती के बीच 50 कदम की दूरी पर राम मंदिर है। यह मंदिर भी ईंटों का बना है, इसके स्तम्भ पत्थरों के हैं।अधिलेखों से प्राप्त जानकारी के आधार पर इस पूर्वाभिमुख मंदिर का निर्माण भी कलचुरी नरेशों के सामंत जगतपालदेव ने कराया था। मंदिर के महामंडप में प्रस्तर स्तंभों पर प्राचीन मूर्तिकला के श्रेष्ठतम उदहारण है। इन स्तंभों पर आलिंगनबद्ध मिथुन मूर्तियों के साथ शालभंजिका, बन्दर परिवार, माँ और बच्चा तथा संगीत समाज का भावमय अंकन है। मकरवाहिनी गंगा,  राजपुरुष, अष्टभुजी गणेश, अष्टभुजी नृवाराह की मूर्ति है। मिथुन मूर्तियाँ का शिल्प उत्तम नहीं है। जैसे नौसिखिये मूर्तिकार ने इसे बनाया हो। राम मंदिर के प्रदक्षिणापथ से सम्बंधित प्रवेश द्वार शाखाओं से युक्त है, इनके अधिभाग पर गंगा-यमुना नदी देवियों की मूर्तियाँ हैं, राजिम के किसी भी मंदिर के प्रवेश द्वार में नदी देवियों की मूर्तियाँ नहीं है। राजिम के मंदिरों का शिल्प सर्वोत्तम भव्य एवं बहुत ही सुन्दर है। 
भभूत लगाए नागा साधू
राजिव लोचन दर्शन करने के पश्चात कुलेश्वर महादेव के दर्शन न हो तो राजिम यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। पुराविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार कुलेश्वर महादेव का प्राचीन नाम उत्पलेश्वर महादेव था जो कि अपभ्रंश के रूप में कुलेश्वर महादेव कहलाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर नदियों के संगम पर स्थित है। यह अष्टभुजाकार जगती पर निर्मित है। नदी के प्रवाह को ध्यान में रखते हुए वास्तुविदों ने इसे अष्टभुजाकार बनाया। इसकी जगती नदी के तल से 17 फुट की ऊंचाई पर है। कुल 31 सीढियों से चढ़ कर मंदिर तक पंहुचा जाता  है। कहते हैं कि मंदिर के शिवलिंग को माता सीता ने बनाया था। मंदिर में कार्तिकेय एवं अन्य देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं। किंवदंती है की नदी के किनारे पर स्थित संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम से कुलेश्वर मंदिर तक सुरंग जाती है। सुरंग का प्रवेश द्वार संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम में है। जिसके मुख को अब बंद कर दिया गया है।
कुंभ स्थल
राजिम क्षेत्र पंच कोसी क्षेत्र के अंतर्गत आता है। पंचकोसी यात्रा का प्रारम्भ भगवान श्री राजीव लोचन की नगरी युगो-युगो से ॠषि मुनियों, महात्माओं द्वारा सृजित आध्यात्मिक उर्जा से सम्पन्न पतित पावन राजिम नगरी से होता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने गोलोक से सूर्य के समान प्रकाशित पांच पंखुडियों से युक्त कमल पृथ्वी पर गिराया था । पांच कोस के विस्तार से युक्त उक्त कमल के परिधि क्षेत्र के अन्तर्गत भगवान शिव के पांच अधिवास है, जो पंचकोसी के नाम से विख्यात है । राजिम क्षेत्र को पद्म क्षेत्र भी कहा जाता है। पद्म क्षेत्र राजिम स्थित पंचकोसी क्षेत्र की परिक्रमा पवित्र अगहन एवं माघ माह में प्रारंभ होती है । यात्रा का प्रारंभ ब्रम्हचर्य आश्रम के समीप स्वर्ण तीर्थ घाट के समीप चित्रोत्पला में स्नान करने के पश्चात पद्म क्षेत्र के स्वामी राजीव लोचन भगवान के मंदिर जाकर पूजन से होता है । वहां से संगम पर स्थित उत्पलेश्वर शिव (कुलेश्वर नाथ) दर्शन पूजन करके पटेश्वर महादेव के दर्शन करने पटेवा ग्राम की ओर प्रस्थान करते हैं यह यात्रा का प्रथम पड़ाव है ।
छत्तीसगढ़ भंडारण निगम का स्टाल
द्वितीय पड़ाव के रूप में चम्पेश्वर महादेव चंपारण (चंपाझर) ब्रह्मिकेश्वर (बम्हेश्वर) महादेव फणीकेश्वर महादेव, फिंगेश्वर तथा यात्रा के अंतिम पड़ाव के रूप में कर्पूरेश्वर महादेव कोपरा के दर्शन पूजन होता है। यात्री राजिम आकर सोमेश्वर महादेव का दर्शनोपरांत यात्रा का समापन कुलेश्वर महादेव की पूजा अर्चना से करते है । ये पांचो शिव मंदिर कुलेश्वर से 5 कोस की दूरी पर स्थित है । इसीलिए ये पंचकोसी परिक्रमा के नाम से जाने जाते हैं । मान्यता है कि दंडकारण्य प्रवास के दौरान माता सीता ने स्वयं अपने हाथों से इस शिवलिंग का निर्माण कर भगवान शिव की पूजा की थी। 
पंचकोसी में शामिल फ़णीकेश्वर महादेव फ़िंगेश्वर
कुलेश्वर महादेव सोंढूर, पैरी एवं महानदी के त्रिवेणी संगम पर स्थित हैं। इस मंदिर का अधिष्ठान अष्टकोणीय है। मंदिर निर्माण करने वाले वास्तुकार ने नदी के प्रवाह को देखते हुए इसे अष्ट कोण का निर्मित किया। जिससे नदी के प्रवाह से मंदिर को कोई हानि न पहुचे। मंदिर की जगती तल से 17 ऊँची है तथा इसके निर्माण में छोटे आकार के प्रस्तर खण्डों का प्रयोग हुआ है। जगती पर पूर्व दिशा में सती स्मारक है जिसका वर्तमान में साक्षी गोपाल के नाम से पूजन हो रहा है। नदी के तल से मंदिर में पहुचने के लिए 22 पैड़ियाँ थी, कुछ वर्ष पूर्व नीचे दबी 9 पैड़ियाँ और प्रकाश में आने पर अब कुल 31 पैड़ियाँ हो गयी है। यहाँ एक शिलालेख भी लगा है।
कर्पुरेश्वर (कोपेश्वर) महादेव ग्राम कोपरा

फणीकेश्वर महादेव के दर्शन पंचकोसी यात्रा के दौरान फ़िंगेश्वर में होते हैं । श्रीमद राजीवलोचन महात्म्य में लिखा है - महानदी देवधुनी पवित्रप्राची तटे विश्रुतनामधेया। फिनगेश्वरारव्या नगरी विभाति फणीश्वरो यत्र गणैर्विभाति ।।२।। फ़णीकेश्वर का मंदिर 10 वीं शताब्दी का है। शिल्प की दृष्टि से भी उत्तम है। मंदिर के गर्भ गृह में महादेव विराजमान हैं। बाँई तरफ गणेश जी एवं चामुंडा की प्रस्तर प्रतिमाएं विराजमान हैं। दाईं तरफ  प्रस्तर का निर्मित एक कलश रखा हुआ है। मान्यता है कि छैमासी रात में इस मंदिर का निर्माण हुआ था। जब कलश चढ़ने का समय हुआ तो दिन निकल आया और कलश नहीं चढ़ सका। तब से इसका कलश भूमि पर ही रखा हुआ है। 
चम्पारण स्थित चम्पेश्वर महादेव
मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्रस्तर मूर्तियाँ लगी हैं, जिनमे रामायण, महाभारत के दृश्यों के साथ विष्णु अवतार प्रदर्शित है।  राम द्वारा शिला बनी अहिल्या उद्धार का भी सुन्दर चित्रण किया गया है। इस मंदिर की बाहरी भित्तियों पर मिथुन मूर्तियों की प्रधानता है। अभी तक देखे हुए छत्तीसगढ़ के मंदिरों में से सबसे अधिक मिथुन मूर्तियाँ इसी मंदिर में दिखाई देती हैं। यहाँ की मूर्तियों के समक्ष खजुराहो का मिथुन मूर्ति शिल्प भी फीका दिखाई देता है। मैथुनरत युगल कामसूत्र के विभिन्न आसनों को प्रगट करते हैं। मंदिर की भित्तियों पर लालित्यपूर्ण मिथुन मूर्तियों का प्रदर्शन दर्शनीय है। ये मूर्तियाँ मंदिर की तीन दीवारों पर लगायी गयी हैं।राजिम महात्म्य में कोपरा के महादेव को बाणेश्वर से कर्पुरेश्वर नाम से जाना जाता है। कोपरा गाँव के अंतिम छोर पर श्मशान के किनारे पर तालाब के बीच में कर्पुरेश्वर महादेव का मंदिर बना है। यह मंदिर पंचकोसी यात्रा में शामिल है। मंदिर में शिवजी विराजमान हैं। गणेश की भी प्राचीन मूर्ति रखी हुयी है। 
त्रिवेणी संगम में मित्रों के साथ ब्लॉगर
राजिम से लगभग 5 किमी की दूरी पर पटेवा ग्राम के अंतिम छोर पर एक बड़ा तालाब है, इसके पार पर पाटेश्वर महादेव विराजे हैं। अनुमान है कि पटेवा का तालाब प्राचीन है, इसका निर्माण भी 10 वीं शताब्दी के आस-पास ही हुआ होगा। कुर्रा-पटेवा से चम्पेश्वर (चम्पारण) 17 किलोमीटर है। चम्पेश्वर महादेव चम्पारण में विराजमान हैं। चम्पारण क्षेत्र पुष्टिकर सम्प्रदाय के परिवर्तक वल्ल्भाचार्य की जन्म भूमि है। यहाँ प्रतिवर्ष हजारों विदेशी यात्री दर्शनार्थ आते है।
आगामी राजिम कुंभ 25 फ़रवरी 2013 (माघ पूर्णिमा) से प्रारंभ हो रहा है, जो 10 मार्च 2013 (शिवरात्रि) तक सतत चलेगा। कुंभ की तैयारियाँ जोर शोर से प्रारंभ हैं। संतों का आगमन निश्चित है साथ ही नागाओं के अखाड़े भी कुंभ स्नान के लिए पहु्चेगें। प्रतिदिन संझा की गंगा आरती के साथ राजिम कुंभ की धूम  रहेगी। यही सुअवसर है पद्मक्षेत्र में त्रिवेणी स्नान कर पुण्यलाभ अर्जित करने का।

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