बस्तर: अजूबों की धरती

प्रस्तुतकर्ता Unknown मंगलवार, 29 जनवरी 2013 0 टिप्पणियाँ


ढोकरा कला कृतियाँ
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जयदेव जी के घर से निकले ही थे कि बहन का फ़ोन आ गया। उसने बताया कि खाना बनकर तैयार है विलंब न करें। दो शिल्प खरीदे गए थे, बिजली न होने के कारण उन पर पालिश नहीं हो पाई, जयदेव जी के पुत्र ने पालिश के लिए बिजली आने का इंतजार करने कहा। तब तक हमने भोजन करना ही जरुरी समझा। बहन के घर पहुंचे, वह बेताबी से इंतजार कर रही थी। बहनोई भी मधूक रस लाकर तैयार थे। उन्हे दो दिन पहले ही आर्डर कर दिया था। थोड़ा स्वाद चख कर भोजन किया। कोण्डागाँव में हरिहर वैष्णव जी रहते हैं। इन्होने हल्बी भाषा पर बहुत काम किया है। अभी बस्तर के परम्परागत संगीत पर कार्य कर रहे हैं। इनसे भी मिलना था, मैं और मनोज जी, हरिहर वैष्णव जी के घर पहुंचे। इनका घर सरगी पाल मोहल्ले में है। मनोज जी को घर का पता था इसलिए सीधे इनके घर ही पहुंच गए।

श्री हरिहर वैष्णव जी
फ़ोन लगाने पर उनका बालक बाहर निकला। हमें बैठक में बिठाया, थोड़ी देर में हरिहर वैष्णव जी पटका पहने उपस्थित हो चुके थे। मेरी उनसे पहली भेंट थी। चलभाष पर चर्चा तो होते रहती है पर रुबरु अभी ही हुए। इन्होने 12 किताबें बस्तर पर लिखी हैं, और विदेशी शोध कर्ता इनके सम्पर्क में रहते थे। मैने इन्हे "मोहनी" को लेकर फ़ोन किया था। अगर कोई मोहनी बनाने वाला मिले तो उसके विषय में कुछ सत्यान्वेषण किया जाए। मोहनी के विषय में चर्चा करने वे ठठा कर हँस पड़ते हैं। बोले कि-एक व्यक्ति मेरे साथ काम करता है। उसने पूछा किसके लिए बनाना है? तो मैने उसे टाल दिया। मैने कहा कि कभी समय मिला तो उनसे सम्पर्क करेगें। "मोहनी" के विषय में बचपन से सुनता आया हूँ लेकिन जिज्ञासा अभी तक शांत नहीं हुई है। अभी तक इसकी खोज में हूँ। कहीं उचित माध्यम मिले तो बताऊंगा। छत्तीसगढी का गीत भी है "का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फ़ूल" और भी कई गीत मोहनी को लेकर रचे गए हैं।

दंतेवाड़ा मंदिर में फ़ोटो ग्राफ़र का कलर प्रिंटर
नेट के विषय में वैष्णव जी से चर्चा होती है कि वे अपने काम को ऑन लाईन करें, जिससे उनका काम दुनिया तक पहुंचे। वे कहते हैं कि मैं वन विभाग में एकाऊंटेंट था, सेवानिवृति के 4 वर्ष पूर्व ही वी आर एस ले लिया। वी आर एस लेने का कारण यह था कि मेरे पास शोध कार्य के लिए समय कम है और काम अधिक है। नौकरी में रहते हुए इस कार्य को नहीं कर सकता था। इसलिए मुझे वी आर एस लेना पड़ा। उनके पास कम्पयुटर एवं नेट की सुविधा है, वे अपना लेखन कार्य कम्पयुटर पर ही करते हैं। छोटी सी मुलाकात के दौरान दो बार साथियों के फ़ोन आ जाते हैं कि अब चलना चाहिए। मैं उनसे इजाजत लेता हूँ तो वे चाय का आग्रह करते हैं। मैं चाय के लिए मना करता हूँ, लेकिन वे नहीं मानते। तो लाल चाय बनाने के लिए कहता हूँ। थोड़ी देर में लाल चाय बन कर आ जाती है। चाय पीकर हम उनसे विदा लेते हैं, वे आग्रह करते है पुन: भेंट के लिए। हम चल पड़ते है।

बहन के घर वह बार-बार मेरे दोहरे से इकहरे होने का राज जानना चाहती है। मैं कहता हूँ राज को राज ही रहने दो तो ठीक है। फ़िर आने का आश्वासन देकर वहाँ से चल पड़ते हैं। बारिश फ़िर शुरु हो चुकी है। चित्रकूट आते हुए भीगे होने के कारण हमने गाड़ी के काँच बंद कर लिए थे तो सांसों की भाप से विंड स्क्रीन के अंदर की तरफ़ भाप जम जाती थी। उसे लगातार साफ़ करना पड़ता था। हीटर चलाने पर और बढ जाती थी। आज हमने काँच खुले रखे, इससे विंड स्क्रीन पर भाप नहीं जमी। जगदपुर के रास्ते में कोण्डागाँव से केसकाल के बीच में कुछ वृक्ष सड़क के किनारे ही हैं और डामर रोड़ से सटे हुए। मैने कई वृक्षों पर दुर्घटना के चिन्ह देखे। अगर आपने अपनी लैन थोड़ी सी भी छोड़ी तो इन वृक्षों से टकरा कर दुर्घटना ग्रस्त हो सकते हैं। मैने इस मार्ग पर पेड़ों से टकरा कर कई गाड़ियाँ दुर्घटना ग्रस्त होते देखी है। इस रास्ते पर गाड़ी संभाल के ही ड्राईव करनी पड़ती है।

पुन: केसकाल घाट पहुंचते है, बादलों और बारिश के कारण दिन ढलने का पता ही नहीं चल रहा। धीरे-धीरे घाट से गाड़ी उतारते हैं। ड्रायवर को बताते जा रहा हूँ कैसे चलना है और घाट पर गाड़ी कैसे उतारना है। घाट पार करके हम कांकेर पहुंचते है, फ़िर वही बायपास पकड़ लेते है। शहर के बीच नहीं जाना पड़ता। पिछली बार जब बरसात के समय कांकेर आया था तो नदी के पुल पर भीड़ लगी थी। देखने के लिए रुका तो नदी में अठखेलियाँ करता एक बड़ा अजगर साँप दिखाई दिया। इतना बड़ा अजगर मैने अपनी आँखों से नहीं देखा था। वह कभी नदी के इस किनारे पर जाता कभी उस किनारे पर। थोड़ी देर बाद मैं आगे बढ लिया। लेकिन दूसरे दिन नई दुनिया समाचार पत्र में उसकी फ़ोटो और समाचार छपा था। वन विभाग वालों ने बड़ी मशक्कत से उसे पकड़ा था। कांकेर से आगे माकड़ी ढाबे में पुन: खीर खाने की योजना बन जाती है। लेकिन मैं खीर की बजाए सिर्फ़ चाय ही लेता हूं। क्योंकि मेरी भी जासूसी हो रही है जासूसों द्वारा। मीठा नहीं खाना चाहिए। चाहे हमारे जासूस रोज हलवा खाएं चोरी छुपे।

पोखरा (कमलगट्टा)
कांकेर से चारामा के आगे छोटा सा घाट पड़ता है। अंधेरा हो चुका था, गाड़ी की लाईटें रोशन कर ली गयी। हम चलते रहे चारामा घाट का मुझे ध्यान नहीं रहा। जगदलपुर से घाट शुरु होते ही घाट के पहले मोड़ को चौड़ा कर दिया गया है और उसके बीच में सीमेंट के ब्लॉक रख कर डिवाईडर बना दिया गया। अचानक गाड़ी डिवाईडर पर चढते दिखाई देती है। पीछे से आवाज आई "बचा लो भगवान, बचा लो भगवान।" गाड़ी डिवाईडर पर चढ गयी लेकिन थोड़ी देर में संभलने के बाद एक जगह के निकले हुए ब्लॉक से फ़िर रास्ते पर आ गयी। चालक के होश गुम हो चुके थे। गाड़ी साईड में रुकवा कर मैने टार्च से गाड़ी के नीचे देखा। सामने से चेचिस तगड़ी रगड़ खा गया था। दाहिने तरफ़ की लाईट बंद हो गयी थी। अभी पता न था कि गाड़ी चलने की स्थिति में है या नहीं। थोड़ी देर गाड़ी को अच्छे से देखा, तभी छोटे भाई का फ़ोन आया। उसने हाल चाल पूछा और कहा कि -मैने सोचा आप गाड़ी ड्राईव कर रहे होगें इसलिए फ़ोन नहीं किया।

उदय नई यूनिफ़ार्म में
अब मित्र ने गाड़ी संभाली, धीरे-धीरे गाड़ी चलाते हुए बातें शुरु हो गयी। उन्होनें चालक को कहा कि दुर्घटनाएं सीख देती हैं। अब तुम बिना कहे की संभल कर चलोगे। सही है जब तक स्वयं गड्ढे में न गिरे तब तक गड्ढे का पता नहीं चलता। घर फ़ोन करके खाने की सूचना दी, हम लगभग 9 बजे घर पहुंचे। बच्चों को एक साल बाद देखते ही रौनक आ गयी। सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएं दी, उदय ने पूछा कि उसकी स्कूल यूनिफ़ार्म बनी कि नहीं? जिस दर्जी को उसकी यूनिफ़ार्म दी गई लगता है वह एक साल में ही सी कर लाएगा। मैने उसे आश्वासन दिया कि 2012 में पक्की मिल जाएगी। अभी तो तुम्हारे पास है ही काम चलाने के लिए। भोजनोपरांत मित्र का कारवां आगे बढ गया और बच्चों के साथ मशगुल हो गए। मैं सोच रहा था कि दर्जी के लिए कौन सा फ़ार्मुला फ़िट किया जाए जिससे वह उदय की स्कूल यूनिफ़ार्म सिल कर ले आए। आखिर कपड़े दिए 4 महीने हो गए, हद है भाई............आगे पढें......


जयदेव बघेल जी के घर (चित्र राहुल सिह जी के सौजन्य से)
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बस्तर, भानपुरी से चल कर हम कोण्डागाँव पहुंचे, नाके के पास गाड़ी रोक कर एक पान वाले से जयदेव बघेल जी का घर पूछते हैं। तो वह कहता है कि सीधे हाथ की तरफ़ जो रास्ता जा रहा है उस पर चले जाईए। उनके नाम का बोर्ड लगा है। हम रास्ते पर आगे बढते हैं, गली में दोनो तरफ़ टेराकोटा के बने हुए शिल्प रखे हुए दिखते हैं। एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर अंगेजी में Dr. Jaydev Baghel लिखा दिखाई देता है, साथ उन्हे प्राप्त सम्मान भी लिखे हैं। सीमेंट की चार दीवारी पर टेराकोटा एवं पत्थर से बनी विभिन्न आकृतियाँ लगी दिखाई देती हैं। घर देखने से ही लगता है कि यह किसी शिल्पकार का घर है। गाड़ी की आवाज सुनकर नीले रंग के पेंट से पुता हुआ परम्परागत छत्तीसगढी नौबेड़िया दरवाजा खुलता है और एक नवयुवक बाहर आता है, मैं कहता हूँ, जय देव बघेल जी से मिलना है। वह बैठक का दरवाजा खोलता है और हमें बैठने को कहता है। बरसात के कारण आंगन में कीचड़ हो गया। मैं भीतर बैठक में पहुंचता हूँ तो सामने की दीवाल पर उन्हे प्राप्त सम्मान पत्र लगे हैं। इंदिरा जी से लेकर बड़े-बड़े नेताओं से सम्मान पाते उनके चित्र एवं 2003 में रविशंकर विश्वविद्यालय से डी लिट की मानद उपाधि प्राप्त करते हुए भी एक चित्र लगा है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
थोड़ी देर में भीतर से कुर्ता और धोती पहने एक वृद्ध आते हैं, उन्होने स्टीक का सहारा ले रखा है। पहचान जाता हूँ यही जयदेव बघेल जी हैं। राम राम जोहार के पश्चात स्नेह से मुझे अपने समीप बैठाते हैं और आने का कारण पूछते हैं। मैं कहता हूँ कि ईश्वर ने नए साल में आपसे मिलने लिखा था, इसलिए चला आया। अन्यथा सैकड़ों बार इस रास्ते से गुजरना हुआ, पहुंच नहीं पाया। सरल मृदू भाषी जयदेव जी को देख कर कोई नहीं कह सकता कि ये वही जयदेव बघेल हैं जिनके ढोकरा शिल्प का डंका पूरे विश्व में बजता है। वे मुझसे स्नेह के साथ चर्चा करते हैं। अपने पुत्र एवं नाती से परिचय करवाते हैं। पुत्र भी इनकी विरासत को आगे बढा रहा है। कुछ माह पहले साउथ अफ़्रीका में 3 माह तक शिल्प का प्रशिक्षण देकर आया है। सच में इनसे मिलना मुझे आल्हादित कर गया। उनका पुत्र सहयात्रियों को घड़वा शिल्प दिखाता है और मैं जयदेव जी के संस्मरण सुनने में व्यस्त हूँ। वे बताते जा रहे हैं और मैं सुनता जा रहा हूँ।  उनका सारा जीवन योगी की तरह शिल्प साधना को समर्पित है।

घर में लगे सम्मान पत्र
चर्चा करते हुए वे पुरानी यादों में खो जाते हैं, कहते हैं कि उनका परिवार अबुझमाड़िया है और हम घड़वा जाति के हैं। पिताजी अबुझमाड़ से आकर इस जगह पर बसे थे। इस जगह को भेलवांपदर पारा कहते हैं यह पारा मेरे पिताजी ने ही बसाया है। हम परम्परागत शिल्पकार हैं। मेरे पिताजी और माता जी ढोकरा शिल्प का कार्य करते थे। 1960 के सर्वे में मेरे पिताजी पूरे बस्तर जिले में वरिष्ठ शिल्पी थे। उसी समय बंगाल की प्रथम राज्यपाल पद्मजा नायडू ने पिताजी सम्मान किया और नेहरु जी को बताया कि घड़वा शिल्पी बस्तर में हैं। प्रख्यात मूर्ति शिल्पी मीरा मुखर्जी जर्मनी में शिल्प कला सीख रही थी। उसके बाद किसी के कहने से मेरे पिताजी के पास मूर्ति शिल्प सीखने आई। 1961 से 64 तक प्रत्येक वर्ष 2 महीना पिताजी के पास रहकर काम सीखती थी। फ़िर वह बड़ा काम करने लगी। 10-20 फ़िट की बड़ी मुर्तियाँ बनाने लगी। मोरारजी देसाई के समय 1977 में मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तो मै पुरस्कार पाने वालों में सबसे कम उम्र का था, मेरी उम्र 24 साल थी, उस समय 40 से लेकर 80-85 साल के लोगों को ही सभी राज्यों में से चयन करके राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाता था।

मुरिया मारिन (ढोकरा शिल्प)
मैं युरोप में बहुत घूमा हूँ सबसे पहले 1977 में मास्को के शिल्पमेला में भारत सरकार ने भेजा। उस समय लता मंगेश्कर ने वहाँ रशिया नाईट में गाया था, वे हमारे ग्रुप में ही गई थी। भारत से 4 लोगों को भेजा गया था। उनका संगीत का काम था इसलिए वे जल्दी आ गई और मैं 3 महीना मास्को में रहा। क्योंकि मुझे अपना काम दिखाना था। उसके बाद से मैं यूरोप में बहुत रहा। लंदन में 4 बार चार-चार महीने तक रहा। ग्लास्गो स्कूल ऑफ़ आर्टस में 3 बार चार-चार महीने तक वहाँ के विद्यार्थियों को काम सिखाया। स्विटजरलैंड में 3 माह रहा। जर्मनी की हेडनवर्ग युनिर्वसिटी में 3 माह रहा। आस्ट्रेलिया के सिडनी, मेलबोर्न, केनबरा में 2 साल तक 2-2 महीना तक, इटली, पेरिस, नीदरलैंड,सिंगापुर, थाईलैंड आदि स्थानों पर लम्बे समय तक रहा। इसके पश्चात लांसएजिल्स में 4 महीने रहा। उस समय वहाँ कबीर बेदी रहते थे। वे मेरी प्रदर्शनी में भी आए। सब चित्र मेरे पास याददास्त के तौर पर हैं। बैठक को पक्का बनाऊंगा तब सब दीवालों पर वे चित्र सजाऊंगा।

शेर (ढोकरा शिल्प)
जिस समय मैं लांसएंजिल्स में था उस समय ही रजनीश को अमेरिका से निकाला जा रहा था। वहां रजनीश ने रजनीशपुरम बसा रखा था और विनोद खन्ना वहीं मुझसे मिले थे। मेक्सिकों में 15 दिन रहा। सभी जगह काम के सिलसिले में ही गया। नीदरलैंड और इटली से आने के बाद डायबिटिज के कारण मेरा पैर कट गया। ये जयपुर वाला पैर लगाया हूँ। अब शुगर डाऊन हो जाती है। कभी 200 रहती है तो कभी 50-40 तक हो जाती है।जापान के ओसाका क्वेटो नारा में तीन बार दो-दो माह तक रहा। जापान की पुरानी राजधानी नारा है। वहाँ नदी के किनारे ढाई तीन हजार हिरण बैल-कुत्ते जैसे घुमते रहते थे। जो जापानी दोस्त हैं वो मेरे घर आकर ठहरते हैं। बहुत सारे विदेश मित्र आकर यहाँ काम सीखते हैं।

नंदी बैल (ढोकरा शिल्प)
टोकियों  के म्युजियम का नाम नेशनल शतग्या म्युजियम है। वहाँ म्युजियम में काम किया। मैं हर जगह ही म्यूजियम जाकर काम करता था। जब 1987 में स्विटजरलैंड के बाजल शहर के म्युजियम में गया तो वहां पर पिताजी के 35 काम रखे थे 87 के 50 साल पहले के। मैने जब उन्हे कहा कि यह मेरे पिताजी का काम है तो उन्हे विश्वास नहीं हुआ। वहाँ पर मेरे पिताजी की फ़ोटो भी लगी हुई है। जब मैने अपने पिताजी की एलबम रखी हुई फ़ोटो दिखाया तब उन्हे विश्वास हुआ। फ़िर वहाँ के बाजल टाईम्स में मेरे उपर जर्मनी भाषा में आर्टिकल लिखा गया। उसकी प्रति मेरे पास है। मेरे पिताजी द्वारा किया लगभग 75 साल पुराना काम बाजल के म्युजियम में रखा है। ब्रिटेन के एल्बर्ट म्युजियम में हमारे ढोकरा शिल्प का काम रखा हुआ है। उनका कहना है कि यह काम ढाई हजार साल पुराना है।

 काम करते हुए एक पु्राना चित्र
म्युजियम ऑफ़ मेन्स ने मेरा एक साढे चार फ़िट का काम 2500 पौंड में खरीदा। लेकिन वह रुपया मुझे इसलिए नहीं मिला कि मैं उस काम को 5000 में गर्वमेंट को बेच चुका था। वह रुपया गर्वमेंट के खाते में गया। मैं सरकार की ओर से गया था इसलिए उस पैसे पर मेरा हक भी नहीं बनता था। मैं इतनी जगह गया, कहीं भी गड़बड़ नहीं किया। अपने देश का नाम नहीं डुबाया, देश की बदनामी नहीं किया। देश का नाम ऊंचा ही करके आया। डांसिग फ़िगर सैकड़ों सालों से हमारे पूर्वज बनाते आ रहे हैं। मोहन जोदरो और हड़प्पा में भी ढोकरा शिल्प जैसा शिल्प ही मिला है। इससे जाहिर होता है कि ढोकरा शिल्प हमारी प्राचीन कला है। अखबारों में सिरपुर के विषय में पढता हूँ पता चला है कि वहाँ भी कुछ कांस्य शिल्प मिला है। मै एक बार वहाँ जाना चाहता हूँ। पैर कटने के कारण गाड़ी में ही जाना पड़ेगा।

पारम्परिक कारीगर
1982 में मैने एक आलेख ढोकरा शिल्प पर लिखा था। जिसका अंग्रेजी अनुवाद एक किताब में छपा है। टाटा पब्लिकेशन ने भी परम्पराग शिल्पकार नामक किताब में हम 4 शिल्पियों के विषय में प्रकाशन किया है। जिसमें सबसे पहले मेरे विषय में लिखा है फ़िर श्री काला हस्ती की कलम कारी के विषय में, बिहार की मधुबनी पेंटिंग के विषय में और एक लेख पॉटरी पर लिखा गया है। जिसका एक-एक लाख हम चारों को दिया था और बाकी पैसा हम लोगों ने चैरिटी में दे दिया। यह किताब 1500 रुपए की है। 1992 में माधवराव सिंधिया जी बुलवा कर यहीं शिल्पग्राम का उद्घाटन करवाया था। यहाँ सभी तरह के शिल्प लकड़ी, टेराकोटा, मैटल पत्थर, बुनकरी, पेंटिग, बांस शिल्प आदि 10 तरह के शिल्प कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था। फ़िर जितना भी शिल्प का कार्य था मैने उसे पूरे घर में लगा दिया। दूर से ही पता चल जाता है कि एक शिल्पकार का घर है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
जयदेव बघेल जी से चर्चा के दौरान चाय के लिए कहते हैं और मै मना करता हूँ। मुझे अभी बहुत दूर जाना था। खपरैल  की बैठक में कवेलु से पानी चूह रहा था। वे कहते हैं कि मेरे पिताजी की बनाई हुई निशानी है इसलिए तोड़कर बनाना  नहीं चाहता। घर तो इसके पीछे बना लिया पर इसे ज्यों का त्यों ही रख दिया। इस साल इसे भी पक्का कर दुंगा। उनकी कार्यशाला भी देखता हूँ जहाँ पर ढलाई का कार्य किया जाता है। जीवन भर इतना बड़ा काम करने के बाद भी उन्हे घमंड रत्ती भर भी नहीं छू पाया। जब उनका पैर कटा तो स्थानीय सरकार के संस्कृति विभाग ने इलाज के लिए उनकी आर्थिक सहायता की। जयदेव बघेल जी जैसी हस्ती से मिलकर अच्छा लगा। वे मुझे छोड़ने गेट तक आते हैं और मेरा कारवां आगे बढ जाता है।---------- आगे पढें

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चित्रकुट जलप्रपात रात का दृष्य (मेरे मोबाईल से)
हम अब चित्रकूट जाना चाहते थे, शाम के 5 बज रहे थे। हमारी मंजिल 66 किलोमीटर दूर थी। सपाटे से चल पड़े क्योंकि थोड़ी देर में अंधेरा होने को था। जगदलपुर से 6 किलोमीटर पहले अंकल की सीमेंट ब्लॉक फ़ैक्टरी है। गेट खुला देखकर भीतर प्रवेश कर गए। वे फ़ैक्टरी में ही मिल गए। चाय पीते हुए पौन घंटा बीत गया। वहाँ पता चला कि चित्रकूट जलप्रपात रात में भी देखा जा सकता है। वहाँ शासन ने बिजली की सुविधा कर रखी है। यह हमारे लिए अच्छा हुआ। नहीं तो सुबह उठकर जाना पड़ता। रात को जलप्रपात देखना अच्छा रहेगा। हमने चित्रकूट का रास्ता पकड़ लिया। बरसात लगातार जारी थी। हम कुछ भीगे हुए थे। इसी चित्रकूट रोड़ पर अली सा का घर भी है। रास्ते में देखने पर समझ नहीं आया। हम आगे बढते गए। एक जगह चित्रधारा प्रपात का बोर्ड भी लगा था। यह चित्रकूट से अलग झरना है। पर हमें तो चित्रकूट जाना था। चित्रकूट का असली नाम चित्रकोट है, पर चित्रकूट ही बोला जाता है। गांव में पहुंचने से पहले देखा कि बिजली की अच्छी रोशनी की गयी है। सड़क पर बत्तियाँ लगी हुई है।


चित्रकुट जलप्रपात रात का दृष्य (मेरे मोबाईल से)
रास्ता एक गेट के सामने जाकर खत्म होता है, गेट बंद था, इसलिए हमने दायीं तरफ़ एक मार्ग देखा तो उधर चल पड़े। यह रास्ता चित्रकूट के रिसोर्ट को जाता है। हम जल प्रपात की जगह रिसोर्ट में पहुंच गए। वहाँ पूछने पर जल प्रपात उस गेट के समीप ही बताया गया। हम वापस आए, बरसात जारी रही, सड़क पर ही गाड़ी लगाकर जलप्रपात देखने उतर गए। जल प्रपात के सामने एक बड़ी फ़ोकस लाईट लगी हुई है, जिसमें पर्याप्त रोशनी नहीं है। फ़िर भी नजारा बहुत अच्छा था। गरजती हुई नदी खड्ड में गिर रही थी। दूधिया फ़ूहार खड्ड में छाई  हुई थी। मैने अपने मोबाईल से 2 चित्र लिए। पर मोनु का हैंडी कैम काम नहीं कर पाया। उसका कहना था कि अगर जल्दी आते तो एक विडियो बन ही जाता। लेकिन समय हमारे पास इतना था। मित्र का कहना था अगर होट्ल से सामान साथ ले आते तो यहीं रिसोर्ट में रुक जाते और सुबह जलप्रपात देखकर वापस चले जाते। यहाँ रुकना अब संभव नहीं था। इसलिए हमें जगदलपुर ही वापस लौटना था।

चित्रकूट जलप्रपात (राजतंत्र के सौजन्य से)
चित्रकूट जल प्रपात को नियाग्रा प्रपात की संज्ञा दी गयी है। यहां इंद्रावती नदी ऊंचाई से नीचे गिरती है और इसकी धूंध में बहुत ही सुंदर इंद्रधनुष बनता है। पर हम रात में पहुचे थे, इसलिए इंद्रधनुष दिखना संभव नही था, नदी अनवरत गर्जना कर रही थी। कुछ देर तक हम प्रपात के किनारे चट्टानों पर खड़े होकर उसका अदभूत रुप निहारते रहे। अधिक देर खड़े रहते तो बरसात में पूरे ही भीग जाते। वापस आते हुए जलप्रपात के किनारे एक जगह पर महादेव जी भी विराजमान हैं। बरसात के कारण पत्थरों पर फ़िसलन हो गयी थी इसलिए अधिक खतरा उठाना ठीक नहीं था। चित्रकूट जलप्रपात भारत में नियाग्रा के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है। यहाँ स्वयं के वाहन एवं बस से आया जा सकता है। रुकने लिए रिसोर्ट की व्यवस्था है, हम चूक गए, लेकिन आप चूक न जाना। दुबारा आने पर यहीं रिसोर्ट में रुकने का कार्यक्रम जरुर बनाएगें। यहाँ पर एक हैलीपैड भी है जो सिर्फ़ सरकारी कार्यक्रमों में उपयोग में लाया जाता है। जलप्रपात दर्शन का आनंद लेकर हम जगदलपुर चल दिए।

जगदलपुर महल में दंतेश्वरी मंदिर (रात का दृश्य)
हम जगदलपुर लगभग आठ बजे पहुंच चुके थे। रास्ते में मुझे एन्थ्रोपोलाजी म्युजियम दिखाई दिया। यह म्युजियम गुगल पर सर्च होने पर दिखाई दिया। लेकिन हमारे पहुंचने तक बंद हो चुका था। पिछली बार जब आया था तब भी इस म्युजियम में बिजली बंद थी और मैं देख नहीं पाया था। ध्यान आया कि यहीं पर आन्ध्रसमाजम का बालाजी मंदिर भी है। बालाजी मंदिर को यहाँ बहुत ढंग से बनाया गया है। शिल्पकारों ने दक्षिण शैली में मूर्तियाँ गढने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हम बालाजी मंदिर में दर्शन करने पहुंचे। एन्थ्रोपोलाजी म्युजियम के आगे ही अली सा दौलत खाना है। इनको मंदिर दर्शन के लिए छोड़ कर अली सा से मिलने पहुंचे। अली सा से मिलकर अच्छा लगा। एक और अच्छी बात हैं उनमें किसी सी विषय में पूछने पर विस्तार से समझाते हैं कि आप भूल ही नहीं सकते। समयाभाव के कारण हम चाय पीकर वहाँ से विदा हुए। अली सा ने बताया कि उन्होने अपने मछली पालन टैंक के पानी को कुछ कम कर दिया है। उसमें मछलियाँ भी है काम की।

दुधिया रोशनी में चमकता राजमहल
बालाजी मंदिर से आकर बाकी साथियों को साथ लेकर हम शहर में पहुचे। जगदलपुर में मुझे सारे चौक एक से ही दिखाई देते हैं। जब भी आता हूँ भटक जाता हूँ। अपना होटल ढूंढते हुए हम सीरासार चौक याने राजमहल के सामने पहुंच गए। राजमहल दूधिया प्रकाश में दूर से ही चमक रहा था। राजमहल के भीतर भी दंतेश्वरी माई का मंदिर है। नव वर्ष पर देवी दर्शन करने वालों की लाईन लगी थी। हम भी पहुचे दर्शन हेतू, पता चला कि महल का राजकक्ष बंद हो चुका है। उसे हम नहीं देख पाए। साढे नौ बज चुके थे। रेनबो में कल रात को खाए खाने का अनुभव ठीक नहीं था। तो हमने बाहर ही खाने का विचार किया। अली सा ने आकांक्षा होटल का पता दिया था। इस आकांक्षा होटल में 1990 में एक बार रुक चुका था। लेकिन मुझे तो नया साल सेलीब्रेट करना था। इसलिए मैने कहा कि मुझे अपने होटल तक छोड़ दो, फ़िर सारे आकांक्षा होटल में जाकर भोजन कर आओ।

ढलता सूरज अस्ताचल को
काऊंटर पर आते ही एक लम्बा आर्डर मार दिया और अपने रुम में पहुच गया। टीवी पर समाचार जारी थे, मित्रों के फ़ोन आने लगे। पता चला कि बरसात पूरे छत्तीसगढ में हो रही है। मैने सोचा था कि वन होने के कारण बस्तर में ही हो रही होगी। मेरा कयास गलत निकला। मंदरस के सिप के साथ नए वर्ष के आगमन का आनंद आने लगा। कुछ मित्रों को फ़ोन लगा कर नव वर्ष की शुभकामनाएं दी। कभी मित्रों के साथ नया साल मनाते थे, पिछले कुछ सालों में घर पर बच्चों के साथ मनाते हैं। घर फ़ोन लगाया तो पता चला कि भारी बरसात के कारण बिजली रानी रुठ गयी है, केक यूँ ही पड़ा है टेबल पर, बच्चे इंतजार करके सो चुके हैं। हम इधर अकेले बैठ कर नव वर्ष का इंतजार कर रहे थे। कब आए और उसका स्वागत करें। गुगल, ब्लॉग, मेल-फ़ीमेल सब भूल गए। सूर्य के क्षितिज से मिलन के पश्चात नव वर्ष की वेला में बाहें फ़ैलाए यामिनी स्वागत के लिए तैयार थी। कितनी देर तक उसके आग्राह को टालता, आगोश में समा ही गया।

एक रात में ही एक साल बीत गया, पलक खुलते ही 2012 सामने था। कितना कुछ बदल गया, सुहानी सुबह हो गई। बीते हुए पलों के निशान कमरे में यत्र-तत्र बिखरे थे। अब समेटना था उन्हे, जाने का समय आ गया। सुबह के 7 बज रहे थे, बीती रात की खुमारी से सूर्यदेवता नहीं उबरे थे, वे भी ड्यूटी भूल कर 2012 के प्रथम रविवार को देर तक बिस्तर पर थे। अंधेरा कायम था, हमें तो चलना था इसलिए ठंडे पानी में ही डुबकी लगाई। रंगोली के कार्यक्रम में ए आर रहमान स्पेशल चल रहा था और हम थे लाईफ़ जैकेट लेकर जादू वाले नयनों में डूबने को बेताब, चैनल बदलना पड़ा। हमारे मन माफ़िक गाने चलने लगे। ये जिन्दगी उसी की है.........., हमे पता है भाई, ये जिन्दगी उसी की है। जैसे सूदखोर लाला रोज चौखट पर आकर बता जाता है ब्याज कितना हुआ है वैसे ही तुम भी रोज याद दिला जाते हो कि ये जिन्दगी उसी की है। सच है उधार कभी चैन नहीं लेने देती। सूरज रात भर चले न चले पर तुम्हारा सूद 24X7 कल्लाक चलता है। इसीलिए कबीर ने जस की तस धर दीनी चदरिया। हम जब भी जाएगें तुम्हारा मूल सूद समेत चुका कर जाएगें।


किर्रर्र किर्रर्र, किर्रर्र किर्रर्र की आवाज के साथ दरवाजा खुला तो बैरा नजर आया। "सर सामान नीचे गाड़ी में रखना है।" मन ही मन सोचता हूँ कि चैन के दो पल भी कोई लेने नहीं देता। सूद काफ़ी बढ चुका है मूल अब चुका ही देना चाहिए। सामान नीचे गाड़ी में पहुंचता है, मै नए साल की सुबह की शुरुआत दही और शक्कर से करता हूँ। बिल काऊंटर पर थोड़ी सी गहमा गहमी के बाद मामला फ़िट हो जाता है और हम चल पड़ते हैं अपने गंतव्य की ओर। बस्तर का गढवा शिल्प बहुत प्रसिद्ध हो चुका है। सागौन की लकड़ी में बस्तर की सांस्कृतिक विरासत की शिल्पकारी की देश भर में मांग है। इन्हे बड़े अधिकारियों के घर में ड्राईंग रुम की शोभा बढाते देखता हूँ। आज कल गिफ़्ट के रुप में इनका प्रचलन खूब बढ रहा है। हमारे मन में आता है कि कुछ खरीदना चाहिए। हमें जगदलपुर से जल्दी बाहर निकलना था इसलिए मैने कहा कि कोन्डागाँव में ले लेगें। कोंडागाँव बस्तर जिले का ही एक ब्लॉक है, जिस दिन हम कोण्डागाँव पहुंच रहे थे उसी दिन यह जिला बन रहा है। 1 जनवरी 2012 को कोण्डागाँव ने विधिवत जिले का रुप ले लिया और हम उसके साक्षी बने...............आगे पढें

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तीरथगढ कुटुमसर (गुगल  के सौजन्य से)
कांगेर घाटी में स्थित तीरथगढ़ दक्षिण पश्चिम दिशा में जगदलपुर से केशलुर 18 किलोमीटर और फ़ारेस्ट नाका 18 किलोमीटर फ़िर तीरथगढ 6 किलोमीटर है। कुटुमसर गुफ़ा यहाँ से 12 किलो मीटर है। अगर तीरथगढ जाना है तो जगदलपुर से 42 किलो मीटर जाना होगा और कुटुमसर जाना है तो 48 किलोमीटर जाना होगा। फ़ारेस्ट नाका में कुटुमसर जाने के लिए लाईट और गाईड का इंतजाम होता है उसके लिए अलग से चार्ज देना पड़ता है। तीरथगढ जाने के लिए प्रतिव्यक्ति 25 रुपए की टिकिट और वाहन के लिए 50 रुपए अलग से देय है। टिकिट लेकर हम तीरथगढ चल पड़े। तीरथगढ के लिए घुमावदार घाट वाला रास्ता घने जंगल से होकर जाता है। कई जगह अंधे मोड़ हैं, 5 किलोमीटर चलने पर रास्ते में एक स्कार्पियो गाड़ी खड़ी थी, दो लोग चेहरे खून पोंछ रहे थे। उनकी गाड़ी पहाड़ से टकरा गयी थी। तीरथगढ के रास्ते में बटरफ़्लाई जोन भी पड़ता है। वहाँ रंग-बिरंगी तितलियाँ देखी जा सकती हैं। बरसात होने के कारण हम वहाँ रुके नहीं और तीरथगढ पहुंच गए। हमने नदी पार करने की बजाए पुल के पहले ही गाड़ी रोक ली और वहीं से जलप्रपात की ओर बढ गए।

सामने तीरथगढ मार्ग
तीरथगढ जल प्रपात मुंगाबहार नदी से बनता है, यहाँ शिवरात्रि का मेला भी लगता है। यहाँ पहुंचने पर प्रकृति के मनोरम स्वरुप के दर्शन हुए। काफ़ी उंचाई से गिरने के कारण झरने की कल कल की आवाज दहाड़ में बदल गयी। जहाँ मैं खड़ा था वहाँ से झरने की गहराई लगभग 300 फ़िट है। उपर से झरना देखना खतरनाक भी कई लोग यहां अपने प्राण गंवा चुके हैं। हल्की हल्की बरसात हो रही थी। बूंदा-बांदी के बीच सैलानीयों की भीड़ खूब थी। लोग वहीं पर नव वर्ष मना रहे थे। टूरिस्ट बसों की लाईन लगी हुई थी। हमें रास्ते में हाट बाजार में बेचने के लिए बकरे और मुर्गे ले जाते लोग मिले। कर्ण ने कहा कि अंकल जैसे ही कोई त्यौहार आता होगा तो बकरे और मुर्गे सहम जाते होगें। त्यौहार इंसान मनाता है और शामत इन मूक पशुओं की आ जाती है। मुझे भी सोचने पर मजबूर होना पड़ा। पर बस्तर की यही संस्कृति है, मुर्गा, बकरा और महुआ की दारु के बिना यहाँ त्यौहार और पर्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसी तरीके यहां भी नव वर्ष का स्वागत किया जा रहा था।

डिस्कवरी फ़ोटोग्राफ़र मोनु
मोनु अपने हैंडी कैम से तस्वीरें लेने लगी। पेड़ की डाल पर बैठा लाल मुंह का बंदर पहले डालियाँ हिला रहा था फ़िर नीचे उतरकर मोनु के तरफ़ बढा, वह सहम गयी, मैने बंदर को भगाया। अगर बंदर के डर से पीछे भागी तो सीधे 300 फ़िट गहरी खाई में। हड्डी पसली भी नहीं मिलने वाली। झरने की गहराई देखकर तो दिल के कमजोर आदमी के पैरों की पिंडलियाँ कांपने लगती हैं। अदभूत दृश्य था झरने का। प्रकृति से बड़ा कोई शिल्पकार नहीं। उसने जो गढा अदभुत ही गढ़ा। इन जगहों को देखने के बाद प्रकृति की ताकत और निर्माण के आगे नतमस्तक होना पड़ता है। बड़े से बड़ा नास्तिक भी प्रकृति में छिपे ईश्वरीय तत्व को मानने लगता है। 300 फ़िट की उंचाई से गिरता दूधिया जल सहज ही आकर्षित करता है। अगर पंख होते तो घाटी में उड़ कर देखता उसके अदभुत सौंदर्य को। आज यहाँ पर खड़े हुए मन की उड़ान के साथ उड़ रहा था। मन की उड़ान के लिए पंखों की आवश्यकता नहीं होती। बिना पंखों के लिए परवाज किया जा सकता है। 

तीरथगढ झरना
झरने में नीचे उतरने के लिए सीढियाँ बनी हुई हैं। पहले जब आया था नीचे उतर कर झरने में नहाया था। बड़ी फ़िसलन थी झरने के नीचे। एक दो लोग तो गिरे भी थे। जगह खरतनाक है, सभल कर ही चलना चाहिए, जहां झरने का पानी गिरता है वहाँ 40 फ़िट की गहराई का कुंड बन गया है। मतलब थाह भी लेना मुस्किल है। कुंड से एक झरना फ़िर नीचे गिरता है और उसके बाद एक झरना और है जो नीचे घाटी में गिरता है। इस प्रकार उपर से देखने पर तीनों झरने दिखाई देते हैं। घाटी के उपर में एक विव प्वाईंट भी बना है जिससे देखने पर तीनों झरने दिखाई देते हैं। इस झरने में असावधानी के कारण इंजिनियरिंग कालेज के कुछ लड़के बह भी चुके हैं। हमने समयाभाव के कारण नीचे उतरने का मोह त्याग दिया। क्योंकि चढने उतरने में ही दो घंटे लग जाते। आगे कुटुमसर भी जाना था इसलिए कुछ चित्र लेकर हमने कुटुमसर की ओर चल पड़े। प्लास्टिक की थैलियों एवं डिस्पोजल बर्तनों ने यहाँ भी कहर ढा रखा था। जंगल में भी प्रदूषण फ़ैल रहा है। फ़ारेस्ट वालों को चाहिए कि नाके पर ही चेता दें कि जो खाने का सामान अपने साथ ले जा रहे हैं उसकी पैकिंग और प्लास्टिक का सामान अपने साथ वापस लाएं। जिससे पर्यावरण प्रदूषित न हो सके।

तीरथगढ़ का विहंगम दृश्य
वर्तमान में लोग नेट से ही सूचना लेकर अपने घूमने का कार्यक्रम बनाते हैं। मोनु ने अपने मोबाईल पर सर्च किया तो बहुत सारे स्थान बस्तर पर्यटन में दिख रहे थे। वह बताती जाती थी  लेकिन सभी जगह जाना संभव नहीं था। उसने बारसूर की रट लगा रखी थी। बारसूर में प्रस्तर की विशाल गणेश प्रतिमाएं हैं। हमने अगली बार देखेंगे कह कर टाल दिया। जब कुटुमसर कांगेर वेली के गेट पर पहुंचे तो उन्होने बताया कि बरसात होने के कारण कुटुमसर बंद कर दिया है। अगर कल बरसात नहीं होगी तो खोला जा सकता है। यहाँ से हमे मायूस होकर लौटना पड़ा। क्योंकि यात्रा के लिए प्लान बनाकर चलना चाहिए। कहाँ क्या देखना है और कहाँ रुकना है। पर इधर घुमने का कार्यक्रम अचानक ही बना था और सभी स्थान देखने के लिए कम से कम एक सप्ताह का समय होना चाहिए बस्तर कोई छोटा सा स्थान नहीं है जहाँ दो दिन में घूम लिया जाए। 

कुटुमसर बंद होने पर मुंडा खराब
रास्ते में साप्ताहिक हाट बाजार लगे थे। जहाँ ग्रामीण अपनी आवश्यकता की चीजें खरीदने एवं बेचने आते हैं। बस्तर के हाट में घर गृहस्थी का सभी सामान मिलता है। महुआ मंद से लेकर नमक तक, इलेक्ट्रानिक के सामान से लेकर कपड़े तक। यहाँ आम के पेड़ पर रहने वाले माटरा (लाल मकोड़े, चापड़ा, माटा) अंडे सहित बेचे जाते हैं। जिसे दो रुपया दोना के हिसाब से बेचा जाता है। आदिवासी इसे अंडो समेत खाते हैं, टमाटर और मिर्च डालकर इसकी चटनी भी बनाई जाती है। इसका कभी स्वाद लेने का मौका तो मिला नहीं पर खाते हुए देखा है। हाट में केकड़े, मुर्गे, मछली, बकरा, महुआ की मंद, सल्फ़ी, ताड़ी, कंद इत्यादि मिलते है। मंद, सल्फ़ी और ताड़ी को दोने (पत्ते के कटोरा) में पीया जाता है। हम भी ताड़ी का स्वाद लेना चाहते थे। लेकिन समय अधिक हो गया था। बताते हैं कि ताड़ी को सुर्योदय से पहले ही पीना चाहिए, सुर्य की किरणे पड़ने के बाद उसमें खट्टापन आ जाता है। ताड़ी सेवन फ़िर कभी पर टाल कर हम आगे की यात्रा पर बढ लिए। अब हमें जाना था चित्रकूट जलप्रपात.............आगे पढें............

बस्तर का दशहरा पर्व

प्रस्तुतकर्ता Unknown बुधवार, 24 अक्टूबर 2012 1 टिप्पणियाँ

बस्तरराज की कुलदेवी दंतेश्वरी माई 
छत्तीसगढ़ में बस्तर का दशहरा पर्व प्रसिद्ध है। 75 दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार को आदिवासियों के साथ सारा बस्तर मनाता है। यहाँ दशहरे में रावण का पुतला फूंकने की परम्परा नहीं है। यह देवी दंतेश्वरी की आराधना का त्यौहार है। चलिए आपको बस्तर के दशहरा की सैर कराते हैं। दशहरा का प्रारंभ पाट जात्रा से होता है। पाटजात्रा का अर्थ है लकड़ी की पूजा। बस्तर के आदिवासी अंचल मे लकड़ी को अत्यंत पवित्र माना जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक लकड़ी मनुष्य के काम आती है इसलिए आदिवासी संस्कृति मे इसका विशिष्ट स्थान है। हरेली अमावश को लकड़ी के एक बड़े तने को महल के सिंह द्वार पर लाकर पूजा जाता है। इसे पाटजात्रा कहते हैं। 

पाटजात्रा के बाद रथ निर्माण 
इसके बाद डेरी गढ़ई होती है। भादो मास के शुक्ल पक्ष के द्वादशी को लकड़ी के एक स्तंभ को सीरसार अर्थात जगदलपुर के टाउन हाल में स्थापित किया जाता है। सीरसार चौक दशहरा मनाने का केन्द्र स्थल है। दशहरा उत्सव की वास्तविक शुरुवात में एक मिरगन पनिका कुल की एक कन्या पर देवी के रूप में पूजा की जाती है तथा उसे देवी के सिंहासन पर बैठाकर कर झुलाया जाता है. इसके पश्चात कलश स्थापना नवरात्रि के प्रथम दिन की जाती है। फिर जोगी बिठाई का कार्यक्रम सम्पन्न किया जाता है। इस परम्परा के अंतरगत सिरासर चौक में एक व्यक्ति के बैठने लायक गड्ढा खोद कर एक युवा जोगी (पुरोहित) को उसमें बैठाया जाता है जो नौ दिन नौ रात तक वहां पर बैठ कर इस समारोह की सफलता के लिए प्रार्थना करता है, उपरोक्त पूजा कार्यक्रम का प्रारम्भ मांगुर प्रजाति की मछली की बलि से किया जाता है।

जोगी बिठाई 
जोगी बिठाई के दूसरे दिन ही रथ परिक्रमा प्रारंभ होती है, पूर्व में 12 चक्के का एक रथ बनाया जाता था, लेकिन वर्त्तमान में दो रथ क्रमश: 4 एवं 8 चक्के के बनाये जाते है, फूलों से सजे 4 चक्के के रथ को "फूल रथ" कहा जाता है, जिसे दुसरे दिन से लेकर सातवें दिन तक हाथों से खींच कर चलाया जाता है,पूर्व में राजा फूलों की पगड़ी पहन कर इस रथ पर विराजमान होते थे ,वर्तमान में कुलदेवी दन्तेश्वरी का छत्र रथ पर विराजित होता है। निशा जात्रा के रात्रि कालीन उत्सव मे प्रकाश युक्त जुलूस इतवारी बाजार से पूजा मंडप तक निकला जाता है, नवरात्रि के नवमें दिन जोगी उठाई की रस्म निभाई जाती है। आठवें दिन मौली परघाव का कार्यक्रम होता है। महाष्टमी की रात्रि में मौली माता का दन्तेवाडा के दन्तेश्वरी मंदिर से दशहरा उत्सव हेतु विशिष्ट रूप से  आगमन होता है।

दशहरा पर मुख्यरथ भ्रमण 
चन्दन लेपित एवं पुष्प से सज्जित नवीन वस्त्र के रूप में देवी आकर जगदलपुर के महल द्वार में स्थित दन्तेश्वरी मंदिर में विराजित होती है नव रात्रि के नवमे दिन शाम को गड्ढे में बैठाये गए जोगी को परम्परागत पूजन विधि के साथ भेंट देकर धार्मिक उत्साह के साथ उठाया जाता है, विजयादशमी वाले दिन से ८ चक्के का रथ चलने को तैयार होता है, इस रथ पर पहले राजा विराजते थे अब माँ दन्तेश्वरी का छत्र विराजता है तथा यह रथ पूर्व में चले हुए फूल रथ के मार्ग पर ही चलता है, जब यह रथ सीरासार चौक पर पहुचता है तो इसे मुरिया जनजाति के व्यक्ति द्वारा चूरा कर 2 किलोमीटर दूर कुम्भदकोट नामक स्थान पर ले जाया जाता है, इस परम्परा को "भीतर रैनी" कहते हैं। 

जोगी उठाई 
समारोह के 12 वें दिन देवी कंचन की समारोह के सफलता पूर्वक सम्पन्न होने के उपलक्ष्य में कृतज्ञता ज्ञापित की जाती। इसे कंचन जात्रा कहते हैं। इसी दिन मुरिया दरबार सजता है। सीरसार चौक पर मुरिया समुदाय के मुखिया, जन प्रतिनिधि एवं प्रशासक एकत्रित होकर जन कल्याण के विषयों पर चर्चा करते हैं। समारोह के 13 वें दिन मौली माता को शहर के पश्चिमी छोर पर स्थित मौली शिविर में समारोहपूर्वक विदाई दी जाती है, इस अवसर पर अन्य ग्राम एवं स्थान देवताओं को भी परम्परागत रूप से बिदाई दी जाती है, इस प्रकार यह संपूर्ण समारोह सम्पन्न होता है। छत्तीसगढ़ अंचल परम्पराओं एंव संस्कृति सम्पन्न अंचल है। प्रकृति ने इसे अपनी नेमतों से नवाजा है। प्राकृतिक सुंदरता, पुरातात्विक धरोहरें, उपजाऊ भूमि, सांस्कृतिक परम्परा, साम्प्रदायिक सद्भावना, आपसी सामन्जस्य से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ प्रदेश संसार के किसी भी स्थान से कम नहीं है।

पंडवानी मोटल

प्रस्तुतकर्ता Unknown सोमवार, 8 अक्टूबर 2012 3 टिप्पणियाँ

पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है। यहाँ की धरा किसी स्वर्ग से कम नहीं है। वनों से आच्छादित धरती पर रंग बिरंगी तितलियों के साथ शेर की दहाड़ एवं हाथियों की चिंघाड़ भी सुनने मिलती है। मन करता है कि कभी इस पावन भूमि को अपने कदमों से चलकर उसका एक-एक इंच भाग के दर्शन कर लूँ, यहाँ के नजारे अपनी आँखों में संजो लूँ। न जाने फ़िर कभी किसी जन्म में देखना संभव हो भी या नहीं। मेरे जैसे घुमक्कड़ को ऐसे ही स्थान पसंद आते हैं। मैं हमेशा प्रकृति के समीप ही रहना पसंद करता हूँ क्योंकि प्रकृति ही मुझे आगे चलने के लिए उर्जा प्रदान करती है। प्रकृति के नजारों का आनंद ही मेरी यायावरी का ईंधन है।

सुसज्जित शयन कक्ष
छत्तीसगढ नया राज्य है, इसका निर्माण हुए 11 वर्ष ही हुए हैं। इतने कम समय में सरकार के पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से बहुत कार्य किए हैं। इन कार्यों में प्रमुख हैं पर्यटन स्थलों के समीप प्राकृतिक वातावरण में मोटल एवं रिसोर्ट का निर्माण। पूर्व में छत्तीसगढ अंचल में पर्यटन करने पर ठहरने और खाने के लिए ग्रामीण होटलों का सहारा लेना पड़ता था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजों के बनाए विश्राम गृह तो है, पर वे मध्यप्रदेश के जमाने से लोकनिर्माण विभाग के अधीन हैं और पर्यटक जब रात को थका हारा विश्राम करने लिए यहाँ पहुंचता था तो पहले किसी अन्य नाम से यहाँ से कमरे बुक मिलते थे। भले ही कोई वहाँ रहने के लिए रात भर नही आए, परन्तु सरकारी आरक्षण तो आरक्षण होता है। ऐसी दशा से निपटने के लिए पर्यटकों को सुविधा देने की दृष्टि से पर्यटन स्थलों पर मोटलों एवं रिसोर्ट्स का निर्माण पर्यटन विभाग द्वारा किया गया। लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर मोटल या रिसोर्ट हैं। जहाँ ठहरने के साथ भोजन की उत्तम सुविधा भी उपलब्ध है। कुछ विश्राम गृह भी लोकनिर्माण विभाग ने पर्यटन मंडल को हस्तांतरित किए हैं।

सुव्यवस्थित रसोई घर
पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पर्यटन स्थलों पर 21 मोटलो का निर्माण किया है। जहाँ भोजन के साथ ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। ऐसा ही एक मोटल रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर ग्राम केन्द्री (अभनपुर) के समीप निर्मित हुआ है। इस मोटल का नाम छतीसगढ की प्रसिद्ध काव्य लोक गाथा पंडवानी पर रखा गया है। पंडवानी मोटल रायपुर से 22 किलोमीटर अभनपुर से 5 किलोमीटर और नवीन राजधानी से अधिकतम 5 किलोमीटर पर स्थित है। पंडवानी मोटल को केन्द्र में रख कर अगर हम समीपस्थ पर्यटन स्थलों पर गौर करें तो राजिम लोचन मंदिर 23 किलोमीटर, प्रसिद्ध तीर्थ बल्लभाचार्य की जन्म भूमि चम्पारण 23 किलोमीटर, छत्तीसगढ की सांस्कृतिक झलक पुरखौती मुक्तांगन 3 किलोमीटर, एयरपोर्ट 7 किलोमीटर, नवीन क्रिकेट स्टेडियम 10 किलोमीटर, प्रस्तावित टायगर सफ़ारी 3 किलोमीटर एवं नैरोगेज का रेल्वे स्टेशन केन्द्री में आधे किलोमीटर पर स्थित है।

रेस्टोरेंट से बाहर का नजारा
राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप होने से यहाँ से यात्रा के साधन बस, टैक्सियाँ हमेशा उपलब्ध हैं। रात को ही अगर कहीं अचानक जाना पड़े तो आवा-गमन के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। पंडवानी मोटल से 2 किलोमीटर पर छत्तीसगढ की महत्वाकांक्षीं सिंचाई परियोजना "महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना ग्राम झांकी" स्थित है। परियोजना स्थल की ऊँचाई समुद्र तल 324.25 मीटर है। इसका निर्माण 1978 में हुआ था। उस समय यह एशिया की पहली उद्वहन सिंचाई परियोजना थी। मोटल के समीप होने से इस स्थान का भ्रमण किया जा सकता है। महानदी यहाँ से 16 किलोमीटर पर प्रवाहित होती है। इसके तीर पर बसे पद्म क्षेत्र राजिम की मान्यता विश्व भर में है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष यहाँ पर राजिम कुंभ उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश-विदेश के पर्यटक आते हैं। माघ मास की पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक चलने वाले इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

विशाल आगंतुक कक्ष
पंडवानी मोटल में पर्यटकों सुविधाओं की दृष्टि से ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। साफ़-सुथरे एसी और नान एसी रुम हैं। रुम के अलावा एसी डोरमैट्री भी उपलब्ध है। जेब जितना खर्च करना चाहे उतने खर्चे में ही मोटल में ठहरने का लाभ उठाया जा सकता है। लगभग 5 एकड़ में बगीचा लगा हुआ है, जिसमें बच्चों के मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। एक कृत्रिम गुफ़ा के साथ ही स्वीमिंग पूल की व्यवस्था भी है। स्नान के लिए गर्म पानी और खाने के लिए साफ़ सुथरा शाकाहारी रेस्टोरेंट भी है, अन्य होटलों की तरह किचन में मुझे गंदगी नहीं दिखाई दी। साफ़ सुथरा रसोई घर होने से उत्तम भोजन मिलने की संभावना रहती है। पंडवानी मोटल में "बार" की सुविधा नहीं है और न ही यहाँ मांसाहारी भोजन मिलता है। रुम सर्विस के लिए पर्याप्त स्टॉफ़ की व्यवस्था है। घर से दूर शांत वातावरण में रह कर आस-पास के पर्यटन स्थलों की सैर करने की दृष्टि से यह स्थान उत्तम है। पर्यटन विभाग ने मोटल का संचालन निजी हाथों में दे रखा है, इसलिए पर्यटकों को अच्छी सेवा मिलने की उम्मीद की जा सकती है।  

महेशपुर: भग्न मंदिरों का वैभव दर्शन

प्रस्तुतकर्ता Unknown बुधवार, 26 सितंबर 2012 5 टिप्पणियाँ

बड़े देऊर मंदिर, के पी वर्मा,ललित शर्मा, राहुल सिंह
सरगुजा अंचल के महेशपुर जाने के लिए उदयपुर रेस्टहाउस से आगे जाकर दायीं तरफ़ कच्चा रास्ता है। यह रास्ता आगे चलकर एक डब्लु बी एम सड़क से जुड़ता है। थोड़ी दूर चलने पर जंगल प्रारंभ हो गया जहां सरई के वृक्ष गर्व से सीना तान कर खड़े हैं जैसे सरगुजा के वैभव का बखान कर रहे हों। सरगुजा है ही इस लायक रमणीय और मनोहारी, प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं पुरासम्पदा से भरपूर्। जिस पर हर किसी को गर्व हो सकता है। गर्मी के इस भीषण मौसम में भी सदाबहारी वृक्षों से हरियाली छाई हुई है। महुआ के वृक्षों के पत्ते लाल से अब हरे हो गए हैं। फ़ूल झरने के बाद अब फ़ल लगे हुए हैं, जिन्हे कोया, कोवा, टोरी कहते हैं। इनका तेल निकाला जाता है। तेल निकालने के बाद खल भी कई कार्यों में ली जाती है। पेड़ों पर परजीवी लताएं झूल रही हैं। जंगल का जीवन मनुष्य से लेकर वन्यप्राणियों एवं पेड़ पौधों से लेकर पशु पक्षियों तक एक दूसरे पर ही निर्भर है। कह सकते हैं कि सभी एक दूसरे पर ही आश्रित हैं। तभी जीवन गति से आगे बढ रहा है। वरना किसी की क्या बिसात है जो दो पल भी जीवन का सुख या दु:ख झेल ले। शाम होने को है, कच्ची सड़क के 5 किलोमीटर की एक पक्की सड़क आती है जो सीधे महेशपुर के पुरावशेषों तक ले जाती है। कुल मिलाकर उदयपुर से महेशपुर की दूरी 12 किलोमीटर है।

मंदिर की ताराकृति प्रस्तर जगती
महेशपुर रेण नदी के तट पर बसा है, यह क्षेत्र में 8 वीं सदी से लेकर 11 वीं सदी के मध्य कला एवं संस्कृति से अदभुत रुप से समृद्ध हुआ। इस काल के स्थापत्य कला के भग्नावेश महेशपुर में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। उपलब्ध पुरासम्पदा की दृष्टि से महेशपुर महत्वपूर्ण पुरातत्वीय स्थल है। यहाँ शैव, वैष्णव एवं जैन धर्म से संबंधित पुरावशेष मिलते हैं। रियासत कालीन प्रकाशित पुस्तकों में महेशपुर प्राचीन स्थल एवं शैव धर्म के आस्था स्थल के रुप में उल्लेखित है।अभी भी कई बड़े टीलों का उत्खनन होना है। जिससे इस स्थान  के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलेगी तथा इसका इतिहास प्रकाश में आएगा। सड़क मार्ग से जुड़ा यह पुरास्थल अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर है। इस रास्ते से ही भगवान राम का दण्डकारण्य में आगमन हुआ और उन्होन वनवास का महत्वपूर्ण समय यहाँ पर व्यतीत किया। दण्डकारण्य सरगुजा के लेकर भद्राचलम तक के भू-भाग को कहा जाता है। जनश्रुति के अनुसार जमदग्नि ॠषि की पत्नी रेणुका ही इस स्थान पर रेण नदी के रुप में प्रवाहित है। रेण नदी का उद्गम मतरिंगा पहाड़ है और यह अपने आंचल में प्रागैतिहासिक काल से लेकर इतिहास के पुरावशेषों को समेटे हुए है।

विध्वंस कथा:विशाल वृक्ष की जड़ में फ़ंसा मंदिर का आमलक
सबसे पहले हम बड़का देऊर कहे जाने वाले शिव मंदिर पहुंचे। सन 2008 में पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग छत्तीसगढ द्वारा पुराविद जी एल रायकवार के निर्देशन में यहाँ उत्खनन प्रारंभ हुआ। उत्खनन से विभिन मंदिरों की संरचनाओन के साथ दक्षिण कोसल की एतिहासिक शिल्पकला प्रकाश में आई। मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है। पत्थरों से बनी ऊंची जगती पर स्थापित यह मंदिर ताराकृति में बना हुआ है। पुराविद कहते हैं कि ताराकृति मंदिर की बनावट बहुत कम देखने मिलती है। शिल्पकारों के बनाए नाप जोख (मेसन मार्क) के निशान अभी भी पत्थरों पर निर्माण की मूक कहानी कहते हैं। जब हम मंदिर की जगती के चारों तरफ़ घूम कर देखते हैं तो दिखाई देता है कि मंदिर का सिंह द्वार पश्चिम की ओर है अर्थात मंदिर पश्चिमाभिमुख है। आस-पास मंदिरों के प्रस्तर भग्नावेश बिखरे पड़े हैं। मंदिर की पश्चिम दिशा में रेण नदी प्रवाहित होती है। मंदिर के प्रांगण में सैकड़ो वर्ष पुराने वृक्ष इन मंदिरों की तबाही की गाथा स्वयं कहते हैं। किसी कारण वश जब इनकी मंदिरों की देख-रेख नहीं हो रही होगी तब इन वृक्षों की जड़ों ने मंदिरों को तबाह किया। 

वामन और राजा बली
यहाँ से हम आगे चल कर दायीं तरफ़ स्थित टीले की ओर जाते हैं वहाँ सैकड़ो प्रस्तर मूर्तियाँ खुले में रखी हुई हैं। जिन्हे देख कर महेशपुर के वैभवशाली अतीत की एक झलक मिलती है। हमने मूर्तियों के चित्र लिए तथा बायीं तरफ़ स्थित मंदिरों की देखने गए। यहां भी सैकड़ों मुर्तियां एवं मंदिरों के विशाल आमलक पड़े हैं। एक आमलक तो वृक्ष की विशाल जड़ में फ़ंसा हुआ दिखाई दिया। मंदिरों की जगती एवं दीवारों को अपनी जड़ों से जकड़े विशाल वृक्ष खड़े हैं। कुछ टीलों का पुरातत्व विभाग ने उत्खनन कर मूर्तियों को बाहर निकाला है। अभी भी सैकड़ों टीले कई किलोमीटर में जंगल के भीतर फ़ैले हुए हैं जिनका उत्खनन करना बाकी है। इन मंदिरों को त्रिपुरी कलचुरी काल में निर्मित बताया गया है। त्रिपुरी कलचुरी राजाओं की राजधानी जबलपुर में स्थित थी। महेशपुर की विशालता से पता चलता है कि यहां तीर्थयात्री आते थे तथा यह स्थान दंडकारण्य में प्रवेश करने का द्वार रहा होगा। यहीं से होकर यात्री रतनपुर एवं रायपुर ओर बढते होगें।

आदिनाथ
इस स्थल के पास से आदिनाथ की प्रस्तर प्रतिमा प्राप्त हुई है। पुराविद कहते हैं कि आदिनाथ की यह प्रतिमा कहीं अन्य टीले से लाकर यहाँ रखी गयी होगी। इस स्थल पर रखी हुई मूर्तियों में विष्णु, वराह, वामन, सू्र्य, नरसिंह, उमा महेश्वर, नायिकाएं एवं कृष्ण लीला से संबंधित मूर्तियां प्रमुख हैं। इस स्थान से 10 वीं सदी ईसवीं का भग्न शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। उत्खनन से प्रागैतिहासिक काल के कठोर पाषाण से निर्मित धारदार एवं नुकीले उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। उत्खनन से महेशपुर की कला संपदा का कुछ अंश ही प्रकाश में आया है। महेशपुर की प्राचीनता का प्रमाण प्राचीन टीलों, आवसीय भू-भागों, तथा सरोवरों के रुप में वनांचल में 2 किलोमीटर तक फ़ैले हैं। महेशपुर की शिल्पकला को देखकर दृष्टिगोचर होता है कि वह समय शिल्पकला के उत्कर्ष दृष्टि से स्वर्णयुग रहा होगा। महेशपुर से उत्खनन में प्राप्त दुर्लभ शिल्प कलाकृतियाँ हमारी धरोहर हैं। इन्हे संरक्षित करना सिर्फ़ शासन का ही नहीं नागरिकों का कर्तव्य भी है। इस स्थान को देख कर मन रोमांचित होकर कल्पना में डूब गया कि आज से हजारों वर्ष पूर्व यह स्थल भारत के मानचित्र में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता होगा। जो आज खंडहरों में विभक्त हो धराशायी होकर मिट्टी के टीलों में दबा पड़ा है।

नृसिंह  
महेशपुर के विषय में शोध होना अभी बाकी है। यहां के मंदिरों एवं भवनों का निर्माण कराने वालों के नाम उल्लेख अभी प्रकाश में नहीं आया है। निर्माणकर्ताओं का नाम प्रकाश में आने के पश्चात छत्तीसगढ की गौरवमयी विरासत में एक कड़ी और जुड़ जाएगी। मंदिर के समीप ही उत्खनन में प्राप्त प्रतिमाओं एवं सामग्री को रखने के लिए संग्रहालय का निर्माण अपने अंतिम चरण में है। संग्रहालय की छत टीन की चद्दरों की है, चौकीदार ने बताया कि बिजली लगने पर संग्रहालय में प्रतिमाएं रख दी जाएगीं जिससे प्रतिमाओं का क्षरण एवं चोरियाँ न हो। मूर्ति तस्करों निगाह खुले में पड़ी मूर्तियों पर रहती है। जिसे चोरी करके वे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़ी कीमत में बेचते हैं। सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा है, आदिनाथ टीले के पार्श्व में बने एक मकान में फ़लदान (सगाई) का कार्यक्रम चल रहा है। सगे-संबंधी महुआ रस के साथ नए संबंधों के जुड़ने का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे हैं। खंडहर हुए महेशपुर में भी कभी ढोल नगाड़े बजते होगें तीर्थयात्रियों, पर्यटकों, पथिकों की चहल-पहल रहती होगी। दुकाने एवं बाजार सजते होगें। वर्तमान दशा को देखकर लगता है कि संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। चाहे बनाने वाले ने कितना ही मजबुत और विशाल निर्माण क्यों न किया हो? हम समय के साथ अपने आश्रय स्थल अम्बिकापुर पहुचने के लिए चल पड़ते है। ……… आगे पढें … दंतैल हाथी से मुड़भेड़

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